पटना: बिहार में 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी कानून पर सियासी बहस लगातार जारी है। विपक्ष के नेता और सत्ता पक्ष के कुछ मंत्री इस कानून की समीक्षा की मांग करते रहे हैं। हाल ही में कांग्रेस के विधायक अभिषेक रंजन ने कहा कि यदि विधानसभा के विधायकों का ब्लड टेस्ट कराया जाए तो शराबबंदी की हकीकत सामने आ जाएगी।
कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन का बयान
अभिषेक रंजन ने विधानसभा में कहा:
“विधायकों के साथ ही सरकारी कर्मचारी और पुलिस विभाग का ब्लड टेस्ट कराएंगे तो शराबबंदी की पोल खुल जाएगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार जिस सोच के साथ शराबबंदी लागू की थी, उसमें विफल हुई है। अपनी गलती को मानते हुए सरकार को समीक्षा करनी चाहिए।”
उनका आरोप है कि बिहार में शराब की होम डिलीवरी हो रही है और डिमांड पर विधानसभा में भी शराब पहुँचाई जा सकती है। उनके इस बयान से विधानसभा का सियासी माहौल गरमा गया।
सत्ता पक्ष का पलटवार
बिहार सरकार के एससी/एसटी मंत्री लखींद्र पासवान ने कहा कि वह ब्लड टेस्ट के लिए तैयार हैं, लेकिन पहले नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का परीक्षण होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि शराबबंदी पर समय-समय पर समीक्षा जरूरी है।
“हम जांच के लिए तैयार हैं। पहले तेजस्वी यादव का कराइए। बिहार में सूखा नशा का मामला सदन में आया था, इसमें प्रतिबंध हो और शराबबंदी की समीक्षा उस रूप में हो।” – लखींद्र पासवान
RLM विधायक माधव आनंद ने उठाया मुद्दा
राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के विधायक माधव आनंद ने मंगलवार और बुधवार को विधानसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सामने शराबबंदी की समीक्षा की मांग दोहराई।
“शराबबंदी से बिहार को आर्थिक नुकसान हो रहा है। पूर्ण शराबबंदी पूरी तरह से फेल है। होम डिलीवरी हो रही है और हम लोग जांच के लिए हमेशा तैयार हैं।” – माधव आनंद
मंत्री विजय चौधरी का रुख
मंत्री विजय चौधरी का कहना है कि बिहार में शराबबंदी कानून लागू है और इस पर समीक्षा करने की जरूरत नहीं है। हालांकि, उनके सहकर्मी लखींद्र पासवान ने हाल ही में शराबबंदी की समीक्षा की वकालत की।
बिहार में शराबबंदी का इतिहास
- वर्ष 2016 से बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू है।
- कानून में कई बार संशोधन किया गया है।
- इसके बावजूद राज्य में शराब तस्करी और जहरीली शराब से मौत का सिलसिला जारी है।
- यही वजह है कि सरकार और विपक्ष लगातार शराबबंदी पर सवाल उठाते रहे हैं।
इस विवाद ने साफ़ कर दिया है कि शराबबंदी कानून लागू होने के बावजूद उसके प्रभाव और पालन को लेकर राजनीतिक दबाव और बहस जारी है।


