
पटना, 7 अप्रैल 2026: बिहार में शराबबंदी को लेकर एक बार फिर राजनीतिक माहौल गरमा गया है। सत्तारूढ़ जनता दल यूनाइटेड (JDU) और विपक्षी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के बीच तीखा टकराव देखने को मिल रहा है। इस बार विवाद का केंद्र शराब कंपनियों से जुड़े कथित चुनावी चंदे को लेकर है, जिसने सियासत को और तेज कर दिया है।
तेजस्वी यादव के बयान से बढ़ा विवाद
दरअसल, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने हाल ही में शराबबंदी कानून को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में शराबबंदी के बावजूद भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और अवैध गतिविधियां फल-फूल रही हैं।
तेजस्वी के इस बयान के बाद JDU ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए पलटवार किया है।
JDU का दावा: RJD को मिला 46 करोड़ से अधिक चंदा
JDU के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने आरोप लगाया कि जुलाई 2023 से जनवरी 2024 के बीच RJD को शराब कंपनियों से करीब 46 करोड़ 64 लाख रुपये का चंदा मिला है।
उन्होंने कहा कि यही वजह है कि RJD शराबबंदी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सवाल उठा रही है। JDU ने इसे राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित बयान करार दिया है और RJD की नीयत पर सवाल खड़े किए हैं।
नीरज कुमार ने भी साधा निशाना
JDU के मुख्य प्रवक्ता और विधान परिषद सदस्य नीरज कुमार ने कहा कि शराबबंदी पर सवाल उठाने से पहले RJD को अपने पार्टी नेताओं और परिवार के भीतर राय लेनी चाहिए कि वे इस कानून को खत्म करना चाहते हैं या नहीं।
उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान मिले चंदे को लेकर RJD को जनता के सामने जवाब देना चाहिए।
शराबबंदी को बताया सामाजिक सुधार का कदम
JDU का कहना है कि बिहार में वर्ष 2016 से लागू पूर्ण शराबबंदी के बाद कई सकारात्मक सामाजिक बदलाव देखने को मिले हैं। पार्टी के मुताबिक, विभिन्न सर्वेक्षणों में भी बड़ी संख्या में लोगों ने इस कानून का समर्थन किया है।
सरकार का दावा है कि शराबबंदी महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा में कमी और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला है।
RJD का पलटवार: कानून पूरी तरह विफल
वहीं RJD लगातार इस कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठा रही है। तेजस्वी यादव का कहना है कि शराबबंदी के बावजूद राज्य में अवैध शराब का कारोबार बढ़ा है और एक समानांतर व्यवस्था खड़ी हो गई है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है।
शराबबंदी को लेकर JDU और RJD के बीच जारी यह सियासी टकराव आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है। एक ओर सरकार इसे सामाजिक सुधार का अहम कदम बता रही है, तो दूसरी ओर विपक्ष इसकी विफलता का मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। बिहार की राजनीति में यह मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है।


