
कटिहार में आयोजित जनसभा के दौरान जन सुराज अभियान के सूत्रधार ने बिहार की मौजूदा राजनीति और मुख्यमंत्री को लेकर तीखा हमला बोला। अपने संबोधन में उन्होंने न सिर्फ मुख्यमंत्री के चयन की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए, बल्कि उनकी शैक्षणिक योग्यता और सार्वजनिक जीवन से जुड़े तथ्यों को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए। इस दौरान उन्होंने कहा कि वे पहले भी जो बातें कह चुके हैं, आज भी उसी पर कायम हैं और आगे भी अपनी बात पर अडिग रहेंगे।
प्रशांत किशोर ने कहा कि यदि राज्य में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाना ही था, तो यह बात चुनाव से पहले ही स्पष्ट कर दी जानी चाहिए थी। उनका तर्क था कि लोकतंत्र में जनता को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह पहले से जान सके कि किसे नेतृत्व सौंपा जाने वाला है। उन्होंने कहा कि यदि चुनाव से पहले यह घोषणा होती, तो बिहार की जनता को यह तय करने का अवसर मिलता कि उन्हें किस प्रकार का नेतृत्व चाहिए। उन्होंने इसे जनादेश के साथ पारदर्शिता का सवाल बताया और कहा कि चुनाव के बाद नेतृत्व परिवर्तन करना जनता के विश्वास के साथ न्याय नहीं है।
उन्होंने अपने भाषण में “चाल, चरित्र और चेहरा” जैसे राजनीतिक मुहावरों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनता को यह समझने का पूरा अधिकार है कि जिस व्यक्ति को राज्य की बागडोर सौंपी जा रही है, उसकी पृष्ठभूमि और व्यक्तित्व कैसा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले में जनता को अंधेरे में रखा गया और चुनाव के बाद अचानक फैसले लेकर राजनीतिक समीकरण बदले गए।
प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बिहार जैसे राज्य, जिसे ज्ञान और शिक्षा की ऐतिहासिक भूमि माना जाता है, वहां मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे व्यक्ति का चयन होना चिंता का विषय है, जिसके शैक्षणिक रिकॉर्ड को लेकर स्पष्टता नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पढ़ाई न करना कोई अपराध नहीं है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर आगे बढ़ता है, तो यह गंभीर मुद्दा बन जाता है।
अपने संबोधन में उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विभिन्न शपथ पत्रों में सम्राट चौधरी की शैक्षणिक योग्यता को लेकर अलग-अलग जानकारियां सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि कभी सातवीं पास बताया गया, तो कभी उच्च शिक्षा से जुड़े दावे किए गए, लेकिन इन दावों की समयरेखा और सत्यता स्पष्ट नहीं है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि कोई आम नागरिक सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करते समय एक भी गलत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करता है, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई होती है, लेकिन राजनीतिक पदों पर बैठे लोगों के मामले में ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखाई जाती।
प्रशांत किशोर ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर शासन और प्रशासन की गुणवत्ता से जोड़ते हुए कहा कि यदि नेतृत्व की योग्यता पर ही सवाल खड़े होंगे, तो राज्य की नीतियों और निर्णयों पर भी असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का पद सिर्फ एक राजनीतिक पद नहीं है, बल्कि यह राज्य के भविष्य को दिशा देने वाला पद है। ऐसे में उस पद पर बैठे व्यक्ति की विश्वसनीयता और पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने अपने भाषण में यह भी कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली को दर्शाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए ऐसे फैसले लेते हैं, जिनका जनता के हितों से सीधा संबंध नहीं होता। उन्होंने कहा कि बिहार की जनता अब पहले जैसी नहीं रही और वह हर मुद्दे पर सवाल पूछने लगी है।
कटिहार की इस सभा में प्रशांत किशोर ने युवाओं और आम जनता से अपील की कि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी भी प्रकार की जानकारी को बिना जांचे-परखे स्वीकार न करें। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब जनता जागरूक होगी और अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगेगी।
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि जब राज्य का शीर्ष नेतृत्व ही सवालों के घेरे में होगा, तो यह संदेश नीचे तक जाएगा। उन्होंने चिंता जताई कि इससे युवाओं में गलत संदेश जा सकता है और वे भी शॉर्टकट अपनाने की सोच सकते हैं। उन्होंने कहा कि बिहार को आगे बढ़ाने के लिए पारदर्शिता, ईमानदारी और स्पष्ट नेतृत्व की जरूरत है।
सभा के दौरान मौजूद लोगों ने उनके बयान को गंभीरता से सुना और कई स्थानों पर समर्थन भी जताया। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के आरोपों का असर आने वाले समय में राज्य की राजनीति पर पड़ सकता है। यह भी माना जा रहा है कि इस बयान के बाद राजनीतिक दलों के बीच बयानबाजी और तेज हो सकती है।
वहीं दूसरी ओर, इस पूरे मामले पर मुख्यमंत्री या उनके दल की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और भी बयान सामने आ सकते हैं और यह विवाद बड़ा रूप ले सकता है।
कुल मिलाकर, कटिहार की यह सभा केवल एक राजनीतिक भाषण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने बिहार की राजनीति में पारदर्शिता, नेतृत्व की योग्यता और जनता के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि इस बयान का राजनीतिक परिदृश्य पर क्या प्रभाव पड़ता है और क्या यह मुद्दा आगे भी चर्चा का विषय बना रहता है।


