पीरपैंती के सहयोग शिविर में अधिकारी की अनुपस्थिति पर उठे सवाल, ग्रामीणों ने जताई नाराजगी; जनसमस्याओं के समाधान पर पड़ा असर

भागलपुर जिले के पीरपैंती प्रखंड स्थित परशुरामपुर पंचायत में आयोजित सहयोग शिविर के दौरान एक विभागीय अधिकारी की कथित अनुपस्थिति को लेकर स्थानीय स्तर पर सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि आम लोगों की समस्याओं के त्वरित समाधान के उद्देश्य से आयोजित इस शिविर में संबंधित अधिकारी के उपस्थित नहीं रहने से कई लोगों को निराशा का सामना करना पड़ा। हालांकि, इस मामले में संबंधित अधिकारी की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

सहयोग शिविरों का उद्देश्य विभिन्न विभागों के अधिकारियों को एक ही स्थान पर उपलब्ध कराकर ग्रामीणों की समस्याओं का मौके पर समाधान करना और सरकारी योजनाओं की जानकारी देना होता है। ऐसे में किसी अधिकारी की अनुपस्थिति को लेकर स्थानीय लोगों ने प्रशासन से जवाबदेही तय करने की मांग की है।

समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचे थे ग्रामीण

सोमवार को आयोजित सहयोग शिविर में पंचायत क्षेत्र के बड़ी संख्या में ग्रामीण अपनी शिकायतों और समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचे थे। कई लोगों ने राजस्व, पंचायत, मनरेगा, कृषि, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सरकारी योजनाओं से जुड़े मामलों को लेकर आवेदन तैयार कर रखे थे।

ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि संबंधित विभागों के अधिकारी मौके पर मौजूद रहेंगे और उनकी समस्याओं का समाधान या आवश्यक दिशा-निर्देश तुरंत मिल जाएंगे। लेकिन एक विभागीय अधिकारी के कथित रूप से शिविर में नहीं पहुंचने के कारण कई मामलों पर अपेक्षित सुनवाई नहीं हो सकी।

तीन अधिकारियों की थी प्रतिनियुक्ति

स्थानीय प्रशासन की ओर से शिविर के लिए पंचायती राज पदाधिकारी, कृषि पदाधिकारी और कार्यक्रम पदाधिकारी की प्रतिनियुक्ति की गई थी। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पंचायती राज पदाधिकारी कामेश्वर नारायण स्वास्थ्य कारणों से अवकाश पर थे।

वहीं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि कार्यक्रम पदाधिकारी मुरलीधर मोदी भी शिविर में उपस्थित नहीं हुए। हालांकि, कृषि पदाधिकारी सुमन कुमार पूरे समय शिविर में मौजूद रहे और उन्होंने अपने विभाग से जुड़े मामलों में लोगों की शिकायतें सुनीं तथा आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई।

जनप्रतिनिधियों ने जताई नाराजगी

पंचायत के मुखिया आशुतोष कुमार उर्फ पवन यादव ने कहा कि सहयोग शिविर का उद्देश्य प्रशासन और जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित करना है। उनका कहना है कि यदि निर्धारित अधिकारी उपस्थित नहीं होंगे तो लोगों की समस्याओं का समाधान प्रभावित होगा और सरकार की ऐसी पहल का अपेक्षित लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पाएगा।

उन्होंने कहा कि दूर-दराज के गांवों से लोग समय निकालकर शिविर में पहुंचते हैं। ऐसे में यदि संबंधित अधिकारी उपलब्ध नहीं रहते हैं तो लोगों का समय और श्रम दोनों प्रभावित होते हैं।

ग्रामीणों को हुई असुविधा

शिविर में पहुंचे कई ग्रामीणों ने बताया कि वे विभिन्न विभागों से संबंधित समस्याओं को लेकर आवेदन देने आए थे। कुछ लोगों को उम्मीद थी कि मौके पर ही उनकी शिकायतों का प्रारंभिक समाधान या आवश्यक मार्गदर्शन मिल जाएगा।

ग्रामीणों का कहना है कि जिन विभागों के अधिकारी उपलब्ध थे, वहां कार्य सामान्य रूप से चलता रहा, लेकिन जिन मामलों में संबंधित अधिकारी की आवश्यकता थी, वहां लोगों को निराश होकर लौटना पड़ा या बाद में कार्यालय आने की सलाह दी गई।

सहयोग शिविरों का उद्देश्य क्या है?

सहयोग शिविरों का आयोजन आम नागरिकों को सरकारी सेवाएं उनके पंचायत स्तर पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया जाता है। इन शिविरों में विभिन्न विभागों के अधिकारी एक ही स्थान पर उपस्थित रहकर लोगों की शिकायतें सुनते हैं, आवेदन प्राप्त करते हैं और योजनाओं की जानकारी देते हैं।

इस व्यवस्था से ग्रामीणों को अलग-अलग सरकारी कार्यालयों के बार-बार चक्कर लगाने की आवश्यकता कम होती है। साथ ही प्रशासन को भी स्थानीय स्तर पर समस्याओं की वास्तविक स्थिति समझने का अवसर मिलता है।

जवाबदेही को लेकर उठे सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी अधिकारी को किसी कारणवश शिविर में शामिल होना संभव नहीं था, तो उसकी पूर्व सूचना या वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए थी ताकि आम लोगों को असुविधा का सामना न करना पड़े।

हालांकि, यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि संबंधित अधिकारी की अनुपस्थिति का कारण क्या था। प्रशासन की ओर से भी इस विषय पर कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी नहीं किया गया है।

संपर्क का प्रयास, नहीं मिला जवाब

रिपोर्ट के अनुसार, कार्यक्रम पदाधिकारी मुरलीधर मोदी से उनका पक्ष जानने के लिए फोन के माध्यम से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन कॉल का जवाब नहीं मिल सका। इसलिए इस संबंध में उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हो पाई है।

पत्रकारिता के सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी विवाद या आरोप के मामले में सभी पक्षों का पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण होता है। यदि भविष्य में संबंधित अधिकारी की प्रतिक्रिया प्राप्त होती है, तो उससे मामले की स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बनाने की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि सहयोग शिविर जैसी पहल तभी प्रभावी साबित होती है जब सभी संबंधित विभागों के अधिकारी निर्धारित समय पर मौजूद रहें और लोगों की समस्याओं का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करें।

यदि किसी कारणवश कोई अधिकारी उपस्थित नहीं हो पाता है, तो उसकी जगह वैकल्पिक अधिकारी की प्रतिनियुक्ति जैसी व्यवस्था की जा सकती है, ताकि जनता को असुविधा न हो और शिविर का उद्देश्य प्रभावित न हो।

ग्रामीणों ने नियमित और प्रभावी आयोजन की मांग की

स्थानीय लोगों ने प्रशासन से आग्रह किया है कि भविष्य में आयोजित होने वाले सहयोग शिविरों में सभी विभागों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि ऐसे शिविर ग्रामीणों के लिए बेहद उपयोगी हैं, क्योंकि यहां एक ही स्थान पर कई विभागों से जुड़ी समस्याओं का समाधान संभव होता है।

ग्रामीणों का मानना है कि यदि इन शिविरों की निगरानी और समन्वय को और मजबूत किया जाए, तो सरकारी योजनाओं का लाभ अधिक प्रभावी ढंग से अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकेगा। फिलहाल परशुरामपुर पंचायत में आयोजित सहयोग शिविर में अधिकारी की कथित अनुपस्थिति को लेकर उठे सवालों पर प्रशासन की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। यदि इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण या जांच होती है, तो उसके आधार पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

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