विदेश में फंसे पटना के प्रोफेसर, 14 साल से ‘जिंदा होने’ का सबूत देने की लड़ाई

पटना, 10 अप्रैल 2026: बिहार की राजधानी पटना से जुड़ा एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां एक प्रोफेसर पिछले 14 वर्षों से विदेश में रहकर अपने ही अस्तित्व को साबित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की परेशानी नहीं, बल्कि प्रशासनिक जटिलताओं और सिस्टम की खामियों को भी उजागर करता है।

‘जिंदा हूं’ यह साबित करना ही बन गया संघर्ष

पटना निवासी का दावा है कि उनके पास पासपोर्ट, बैंक स्टेटमेंट, दूतावास के पत्र और कई सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं, जो उनकी पहचान और सेवा को प्रमाणित करते हैं।

इसके बावजूद उन्हें बार-बार प्रशासनिक स्तर पर ‘लापता’ या ‘अवैध’ बताने की कोशिश की गई, जिससे उनकी स्थिति और जटिल हो गई।

वेतन का भी नहीं मिला पूरा भुगतान

प्रोफेसर सिन्हा के अनुसार, उनके 39 महीनों के बकाया वेतन में से केवल 21 महीनों का ही भुगतान किया गया है। बाकी राशि अब तक अटकी हुई है।

उनका कहना है कि 2014 से 2021 के बीच कई सरकारी आदेश और समितियों की रिपोर्ट उनके पक्ष में हैं, लेकिन बावजूद इसके उनकी फाइलें आगे नहीं बढ़ पाईं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पेश किए सबूत

प्रोफेसर ने अपनी मौजूदगी और वैधता साबित करने के लिए भारतीय दूतावास, एनओसी और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़े दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।

उन्होंने बताया कि वे विदेश में रहते हुए लगातार शोध, लेखन और शैक्षणिक गतिविधियों में सक्रिय रहे हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर उनकी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।

धमकियों का भी आरोप

प्रोफेसर सिन्हा ने यह भी आरोप लगाया है कि उन्हें दबाव में लाने के लिए बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं काटने की धमकियां दी गईं।

उनके अनुसार, यह मामला सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि उनके अधिकारों का उल्लंघन है।

पीएमओ और मंत्रालय तक पहुंचा मामला

न्याय की मांग को लेकर उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, अटॉर्नी जनरल और न्याय मंत्रालय तक अपनी बात पहुंचाई है।

उनका सवाल है कि जब सभी दस्तावेज उनके पक्ष में हैं, तो फिर उन्हें न्याय पाने के लिए वर्षों तक संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर की चेतावनी

प्रोफेसर ने चेतावनी दी है कि अगर उनके मामले का समाधान जल्द नहीं हुआ, तो इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी असर पड़ सकता है।

न्याय की उम्मीद बाकी

फिलहाल, प्रोफेसर संजीवधारी सिन्हा की नजरें दिल्ली और पटना के प्रशासनिक गलियारों पर टिकी हैं। उनका कहना है कि उन्हें ‘गुमशुदा’ नहीं, बल्कि एक सक्रिय और संघर्षशील नागरिक के रूप में देखा जाए और जल्द न्याय दिया जाए।

यह मामला एक बार फिर सरकारी प्रक्रियाओं की धीमी गति और जटिलताओं पर सवाल खड़ा करता है।

  • ये भी पढ़े..

    खान सर-ज्ञान बिंदु विवाद पर बोले पप्पू यादव: “दोनों मेरे दिल के टुकड़े, शिक्षा को मत बनाइए जंग का मैदान”

    Share Add as a preferred…

    मुख्यमंत्री चिकित्सा सहायता कोष का दायरा बढ़ा, अब ₹4 लाख तक आय वाले परिवारों को मिलेगा इलाज में आर्थिक सहारा

    Share Add as a preferred…