फुलवारी की मासूम को मिला ‘विज्ञान’ का साथ: तीन वर्षीय बच्ची से दरिंदगी के मामले में आरोपितों की डीएनए प्रोफाइल तैयार, 45 दिनों में सजा दिलाने की तैयारी

पटना/फुलवारी। न्याय की देवी की आँखों पर बंधी पट्टी भले ही निष्पक्षता का प्रतीक हो, लेकिन आधुनिक फॉरेंसिक विज्ञान ने उस पट्टी के पीछे छिपे सत्य को उजागर करने के लिए ‘डीएनए’ जैसे अचूक हथियार पुलिस के हाथों में थमा दिए हैं। राजधानी पटना के फुलवारी शरीफ स्थित परसा बाजार थाना क्षेत्र में एक तीन वर्षीय मासूम बच्ची के साथ हुई रूह कंपा देने वाली दरिंदगी के मामले में अब इंसाफ की रफ़्तार तेज हो गई है। पिछले 12 दिनों से पटना के एम्स (AIIMS) अस्पताल में मौत और जिंदगी के बीच संघर्ष कर रही उस नन्ही सी जान को शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026 को अस्पताल से छुट्टी मिल गई है। बच्ची अब अपने घर लौट चुकी है, लेकिन उसके शरीर और मन पर लगे घावों को भरने के लिए कानून ने अब अपना ‘हंटर’ तैयार कर लिया है। पटना पुलिस ने इस मामले में तकनीकी और वैज्ञानिक जांच को आधार बनाते हुए आरोपितों की डीएनए प्रोफाइल (DNA Profile) तैयार कर ली है। यह उपलब्धि इस केस को अदालत में ‘वाटरटाइट’ (अचूक) बनाने की दिशा में सबसे बड़ा कदम मानी जा रही है, जिससे दरिंदों के लिए कानून के शिकंजे से बच निकलना अब नामुमकिन होगा।

एम्स से घर वापसी: संघर्ष और हौसले की जीत

​परसा बाजार के उस अभागे गांव की वह मासूम, जिसे दरिंदों ने अपनी हवस का शिकार बनाकर मरणासन्न स्थिति में छोड़ दिया था, उसने 12 दिनों तक एम्स पटना के विशेषज्ञों की निगरानी में इलाज कराया। डॉक्टरों की टीम ने बच्ची की शारीरिक स्थिति को स्थिर करने के लिए दिन-रात मेहनत की। शुक्रवार को जब उसे रिलीज किया गया, तो अस्पताल के कर्मचारियों की आँखों में भी एक संतोष का भाव था। हालांकि, शारीरिक रूप से बच्ची अब स्वस्थ है, लेकिन उस पर जो मानसिक आघात हुआ है, उसका उपचार एक लंबी प्रक्रिया होगी।

​परिजनों के लिए यह 12 दिन किसी नरक से कम नहीं थे। एक ओर अपनी बच्ची की जान की चिंता और दूसरी ओर समाज में उपजी असुरक्षा की भावना। बच्ची के घर पहुँचते ही पूरे गांव में एक अजीब सी खामोशी और आक्रोश का मिला-जुला वातावरण देखा गया। पुलिस ने बच्ची की सुरक्षा के लिए सादे लिबास में जवानों की तैनाती की है, ताकि परिवार को किसी भी प्रकार की धमकी या दबाव का सामना न करना पड़े।

वैज्ञानिक साक्ष्यों का जाल: डीएनए और 18 तरह की एफएसएल रिपोर्ट

​इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) की टीम ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट पुलिस को सौंपी। पुलिस ने अपराधियों के विरुद्ध तकनीकी और वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। एफएसएल की ओर से पीड़ित बच्ची की 18 अलग-अलग तरह की जांच की गई थी, जिनमें जैविक साक्ष्य, कपड़ों के अवशेष और घटनास्थल से उठाए गए नमूने शामिल थे।

​इन नमूनों के आधार पर आरोपितों की डीएनए प्रोफाइल तैयार की गई है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि चश्मदीद गवाह भले ही मुकर जाएं या समय के साथ धुंधले पड़ जाएं, लेकिन ‘डीएनए’ कभी झूठ नहीं बोलता। यह प्रोफाइल अदालत में इस बात का अकाट्य प्रमाण बनेगी कि वारदात के समय आरोपित वहां मौजूद थे और उन्होंने ही इस घिनौने कृत्य को अंजाम दिया। पुलिस ने आरोपितों के रक्त के नमूने और अन्य जैविक साक्ष्यों का मिलान पीड़ित के पास से मिले साक्ष्यों से कराया है, जिसकी रिपोर्ट अब पुलिस के पास सुरक्षित है।

स्पीडी ट्रायल की तैयारी: 45 दिनों का ‘अल्टीमेटम’

​पटना पुलिस अब इस केस को किसी भी सामान्य आपराधिक मामले की तरह वर्षों तक लटकने नहीं देना चाहती। परसा बाजार थाने की पुलिस ने संकल्प लिया है कि डेढ़ महीने (45 दिन) के भीतर आरोपितों को सजा के मुकाम तक पहुँचाया जाएगा। इसके लिए पुलिस विभाग ने ‘स्पीडी ट्रायल’ (त्वरित सुनवाई) का खाका तैयार किया है।

​आरोपितों के खिलाफ पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) के तहत मामला दर्ज है, जो बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों में बेहद सख्त प्रावधान रखता है। पुलिस अब पूरे ठोस सबूतों और एफएसएल की रिपोर्ट के साथ न्यायालय में अपनी चार्जशीट (आरोप पत्र) दाखिल करने की तैयारी में है। पुलिस का मानना है कि साक्ष्यों की मजबूती के कारण बचाव पक्ष के पास दलीलों के लिए बहुत कम जगह बचेगी। इस मामले में पटना के वरीय पुलिस अधीक्षक (SSP) से भी मंतव्य (Legal Opinion) लिया जाएगा, ताकि कानूनी प्रक्रिया में कोई तकनीकी खामी न रह जाए। वरीय पुलिस अधीक्षक कार्तिकेय के० शर्मा इस केस की व्यक्तिगत रूप से निगरानी कर रहे हैं और उन्होंने स्पष्ट किया है कि जांच में कोई कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

पॉक्सो एक्ट की सख्ती और न्यायिक प्रक्रिया

​बिहार में हाल के वर्षों में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में सजा की दर बढ़ाने के लिए विशेष अदालतों का गठन किया गया है। पॉक्सो एक्ट के तहत इस मामले में आरोपितों को आजीवन कारावास या फांसी तक की सजा हो सकती है। चूंकि पीड़ित की उम्र महज तीन वर्ष है, इसलिए यह अपराध ‘जघन्यतम’ श्रेणी में आता है।

​पुलिस ने न्यायालय से अनुरोध किया है कि इस मामले की सुनवाई रोजाना (Day-to-day hearing) के आधार पर की जाए। स्पीडी ट्रायल का उद्देश्य समाज में एक कड़ा संदेश देना है कि मासूमों की अस्मत से खिलवाड़ करने वालों का अंजाम बहुत बुरा और बहुत जल्द होगा। पुलिस की टीम ने गवाहों के बयान पहले ही दर्ज कर लिए हैं और अब डीएनए प्रोफाइल के जुड़ने से अभियोजन पक्ष का पक्ष अत्यंत मजबूत हो गया है।

सामाजिक आक्रोश और सुरक्षा के सवाल

​फुलवारी और परसा बाजार के इस इलाके में इस घटना के बाद से ही आक्रोश का माहौल है। स्थानीय लोगों ने कई बार प्रदर्शन कर अपराधियों को कड़ी सजा देने की मांग की है। 17 अप्रैल की इस कार्रवाई ने जनता के बीच पुलिस के प्रति विश्वास को थोड़ा मजबूत किया है। लोगों का कहना है कि अगर 45 दिनों में सजा होती है, तो यह वास्तव में न्याय की जीत होगी।

​समाजशास्त्रियों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल पुलिसिया कार्रवाई काफी नहीं है, बल्कि समाज को भी अपने भीतर छिपे ऐसे मानसिक रूप से बीमार तत्वों की पहचान करनी होगी। तीन साल की बच्ची, जिसे अभी दुनिया की समझ भी नहीं थी, वह इस बर्बरता का शिकार हुई—यह पूरे समाज के लिए शर्म का विषय है। पुलिस ने स्कूलों और ग्रामीण अंचलों में भी ‘गुड टच-बैड टच’ और बच्चों की सुरक्षा को लेकर जागरूकता अभियान तेज करने का निर्णय लिया है।

वरीय पुलिस अधीक्षक की निगरानी और ‘जीरो टॉलरेंस’

​पटना के वरीय पुलिस अधीक्षक ने इस मामले को अपनी ‘प्रायोरिटी लिस्ट’ (प्राथमिकता सूची) में रखा है। उन्होंने परसा बाजार थाना प्रभारी को निर्देश दिया है कि चार्जशीट दाखिल करने से पहले एक बार फिर से सभी कड़ियों को जोड़ लिया जाए ताकि कहीं भी ‘बेनिफिट ऑफ डाउट’ (संदेह का लाभ) आरोपितों को न मिल सके।

​प्रशासन का ‘जीरो टॉलरेंस’ वाला रवैया इस केस में साफ दिख रहा है। 18 तरह की एफएसएल रिपोर्ट और डीएनए प्रोफाइलिंग पर इतना जोर देना यह बताता है कि अब बिहार पुलिस परंपरागत जांच से निकलकर आधुनिक फॉरेंसिक जांच की ओर बढ़ चुकी है। पुलिस के उच्चाधिकारियों का मानना है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर दी गई सजा न केवल लंबी होती है, बल्कि उसे उच्च अदालतों में चुनौती देना भी कठिन होता है।

न्याय की प्रतीक्षा में एक गांव

​17 अप्रैल 2026 की यह दोपहर परसा बाजार के उस गांव के लिए थोड़ी राहत भरी है, क्योंकि उनकी बेटी घर लौट आई है। लेकिन असली राहत उस दिन मिलेगी जब अदालत का हथौड़ा आरोपितों के भाग्य का फैसला करेगा। 45 दिनों का समय अब शुरू हो चुका है। पुलिस की सक्रियता, डीएनए रिपोर्ट की सटीकता और न्यायपालिका की संवेदनशीलता—ये तीन स्तंभ मिलकर इस तीन वर्षीय मासूम के जीवन में फिर से मुस्कान तो नहीं लौटा सकते, लेकिन उसे यह भरोसा जरूर दिला सकते हैं कि उसका देश और उसका कानून उसे अकेला नहीं छोड़ेगा। पटना पुलिस अब पूरी ताकत के साथ इस ‘कानूनी जंग’ को जीतने के लिए तैयार है।

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