बिहार की पंचायतों में अब पंचायत सरकार भवन और आधार केंद्रों से मिलेगी राहत: सचिव मनोज कुमार ने दिए 2000 नए केंद्रों को शुरू करने के निर्देश; सोलर लाइट की निगरानी होगी ऑनलाइन

पटना। बिहार की ग्रामीण व्यवस्था को डिजिटल युग की मुख्यधारा से जोड़ने और पंचायती राज संस्थानों को अधिक जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से राजधानी पटना में एक महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। पंचायती राज विभाग के सचिव मनोज कुमार ने बुधवार को राज्य के प्रशासनिक ढांचे को स्पष्ट संदेश दिया कि अब फाइलों की कछुआ चाल नहीं, बल्कि धरातल पर काम की रफ़्तार देखनी चाहिए। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित इस मैराथन बैठक में राज्य के सभी जिलों के उप विकास आयुक्त (DDC), जिला पंचायत राज पदाधिकारी (DPRO) और जिला परिषदों के अपर मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी शामिल हुए। सचिव ने स्पष्ट किया कि ग्रामीण स्तर पर बन रहे ‘पंचायत सरकार भवन’ केवल कंक्रीट के ढांचे नहीं, बल्कि ग्रामीणों के लिए सत्ता के विकेंद्रीकरण का केंद्र हैं। उन्होंने इन भवनों के हस्तांतरण की प्रक्रिया को तेज करने और उन्हें तत्काल प्रभाव से क्रियाशील बनाने का सख्त निर्देश दिया है ताकि ग्रामीणों को छोटे-छोटे सरकारी कार्यों के लिए प्रखंड या जिला मुख्यालयों की दौड़ न लगानी पड़े।

पंचायत सरकार भवन: ग्रामीण प्रशासन की नई धुरी

​बिहार के गांवों में सुशासन के सपने को साकार करने के लिए पंचायत सरकार भवनों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। मनोज कुमार ने समीक्षा के दौरान पाया कि कई जिलों में भवन बनकर तैयार हैं, लेकिन तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं के कारण उनका हस्तांतरण एजेंसियों द्वारा नहीं किया जा सका है। उन्होंने निर्देश दिया कि हस्तांतरण की प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और जहां निर्माण कार्य चल रहा है, वहां गुणवत्ता के साथ कोई समझौता न किया जाए।

​सचिव ने स्थानीय क्षेत्र अभियंत्रण संगठन (LAEO) के माध्यम से प्राक्कलन की स्वीकृति प्राप्त कर नए भवनों का निर्माण जल्द शुरू कराने की बात कही। उन्होंने पदाधिकारियों को यह जिम्मेदारी सौंपी कि वे नियमित रूप से निर्माण स्थलों का भौतिक निरीक्षण करें। यदि निर्माण सामग्री या तकनीक में कोई खामी पाई जाती है, तो संबंधित एजेंसी और जवाबदेह अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई की जाएगी। पंचायतों के पास अपनी छत होने से वहां न केवल ग्राम कचहरी और पंचायत कार्यालय का संचालन सुगम होगा, बल्कि ग्रामीणों के लिए एक व्यवस्थित सार्वजनिक स्थान भी उपलब्ध हो सकेगा।

आधार सेवा केंद्रों का विस्तार: 21 मई तक की समय सीमा

​ग्रामीणों के लिए एक और बड़ी राहत की खबर यह है कि अब उन्हें आधार कार्ड बनवाने या उसमें सुधार कराने के लिए शहरों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। मनोज कुमार ने इस बैठक में एक बड़ी घोषणा करते हुए कहा कि आगामी 21 मई 2026 तक राज्य की 2000 पंचायतों में आधार सेवा केंद्र हर हाल में शुरू कर दिए जाएं। इसके लिए उन्होंने सभी आवश्यक तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को युद्ध स्तर पर पूरा करने का आदेश दिया है।

​अक्सर देखा जाता है कि आधार संबंधी त्रुटियों के कारण ग्रामीणों को राशन कार्ड, पेंशन और अन्य डीबीटी (DBT) योजनाओं का लाभ लेने में भारी कठिनाई होती है। पंचायतों में ही आधार केंद्र खुलने से यह बाधा दूर होगी। सचिव ने निर्देश दिया कि इन केंद्रों के लिए आवश्यक मानव बल और उपकरणों का प्रबंधन समय पर कर लिया जाए ताकि निर्धारित तिथि के बाद किसी भी प्रकार की देरी न हो। यह पहल डिजिटल बिहार के विजन को गांव-गांव तक पहुँचाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकती है।

सोलर स्ट्रीट लाइट योजना: अब हर शुक्रवार होगी ‘ऑनलाइन’ और ‘ऑनग्राउंड’ जांच

​मुख्यमंत्री ग्रामीण सोलर स्ट्रीट लाइट योजना को लेकर सचिव के तेवर काफी कड़े नजर आए। योजना की पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने ‘केंद्रीकृत अनुश्रवण प्रणाली’ (CMS) डैशबोर्ड को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि आगामी सोमवार तक सभी जिला समाहरणालयों (कलेक्ट्रेट) में अनिवार्य रूप से एलईडी टीवी लगाए जाएं, जिन पर सीएमएस डैशबोर्ड का प्रदर्शन हो। इससे आम जनता और जनप्रतिनिधि यह देख सकेंगे कि उनकी पंचायत में कितनी लाइट्स लगी हैं और उनमें से कितनी सक्रिय हैं।

​पारदर्शिता को एक कदम और आगे ले जाते हुए मनोज कुमार ने आदेश दिया कि अब प्रत्येक शुक्रवार को जिला पंचायती राज पदाधिकारियों द्वारा सोलर लाइट्स का अनिवार्य रूप से स्थल निरीक्षण किया जाएगा। यह निरीक्षण केवल कागजी नहीं होगा, बल्कि अधिकारियों को लाइट्स की अद्यतन स्थिति और सर्विस स्टेशनों का जीपीएस लोकेशन विभाग को उपलब्ध कराना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि शुक्रवार को निरीक्षण नहीं किया गया या सीएमएस प्रणाली से लाइट्स नहीं जुड़ी पाई गईं, तो संबंधित पदाधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगते हुए उनकी जवाबदेही तय की जाएगी। रख-रखाव के लिए जिम्मेदार एजेंसियों को भी सख्त हिदायत दी गई है कि वे अपने सर्विस स्टेशनों को पूरी तरह सक्रिय रखें।

वित्तीय अनुशासन और लंबित योजनाओं पर प्रहार

​बैठक के एक बड़े हिस्से में पंद्रहवीं और षष्ठम राज्य वित्त आयोग के तहत संचालित योजनाओं की वित्तीय प्रगति की समीक्षा की गई। मनोज कुमार ने लंबित उपयोगिता प्रमाण पत्रों (UC) और न्यायिक वादों (Legal Cases) के निष्पादन में हो रही देरी पर असंतोष व्यक्त किया। उन्होंने पदाधिकारियों को निर्देशित किया कि इन आयोगों द्वारा संपोषित योजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त कर राशि को तेजी से खर्च किया जाए। विकास की राशि का बैंक खातों में पड़ा रहना प्रशासनिक विफलता माना जाएगा।

​सचिव ने जन शिकायतों के निष्पादन को लेकर भी संवेदनशीलता दिखाने को कहा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के ‘जनता दरबार’ या अन्य माध्यमों से प्राप्त शिकायतों का समाधान समय सीमा के भीतर होना चाहिए। बैठक में विभाग के निदेशक नवीन कुमार सिंह, अपर सचिव डॉ. आदित्य प्रकाश और नजर हुसैन सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे। इन अधिकारियों ने भी अपनी-अपनी विंग से संबंधित योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट पेश की।

सुशासन का संदेश और अधिकारियों की जवाबदेही

​मनोज कुमार का यह रुख स्पष्ट करता है कि बिहार का पंचायती राज विभाग अब ‘रिजल्ट ओरिएंटेड’ कार्यशैली पर ध्यान दे रहा है। पंचायत सरकार भवनों के निर्माण से लेकर आधार केंद्रों की शुरुआत और सोलर लाइट्स की ऑनलाइन मॉनिटरिंग तक, हर योजना में तकनीक और जवाबदेही को जोड़ा गया है। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित करें ताकि योजनाओं के क्रियान्वयन में कोई सामाजिक या राजनैतिक बाधा न आए।

​इस समीक्षा बैठक का निचोड़ यही है कि ग्रामीण विकास की योजनाओं में अब लापरवाही के लिए कोई जगह नहीं है। 21 मई की समय सीमा और हर शुक्रवार का निरीक्षण यह सुनिश्चित करेगा कि पंचायतों में चल रहे काम समय पर पूरे हों। बिहार की पंचायतों को आत्मनिर्भर और सुविधायुक्त बनाने का जो खाका इस बैठक में खींचा गया है, उसके सफल होने पर ग्रामीण जीवन की तस्वीर काफी हद तक बदल सकती है। अब राज्य की नजरें जिला स्तर के अधिकारियों पर हैं कि वे सचिव द्वारा दिए गए इन कड़े निर्देशों का पालन कितनी मुस्तैदी से करते हैं।

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