पटना हाईकोर्ट में पुलिस की बड़ी लापरवाही उजागर, जिंदा महिला को रिपोर्ट में बताया मृत

पटना हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पुलिस कार्यप्रणाली और अदालत में पेश की जाने वाली रिपोर्टों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। समस्तीपुर पुलिस की ओर से अदालत में दाखिल एक रिपोर्ट में एक जीवित महिला को मृत घोषित कर दिया गया। जब सच्चाई सामने आई तो हाईकोर्ट ने इस पर कड़ा रुख अपनाते हुए समस्तीपुर के पुलिस अधीक्षक और संबंधित थानाध्यक्ष को तलब कर लिया। अदालत ने पूछा है कि इतनी गंभीर और तथ्यहीन रिपोर्ट अदालत में कैसे दाखिल कर दी गई।

यह मामला केवल एक प्रशासनिक गलती तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में पुलिस की जिम्मेदारी और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बनकर सामने आया है। हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों से जवाब मांगा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।

पूरा मामला समस्तीपुर जिले से जुड़े एक पुराने दुष्कर्म और हत्या मामले से संबंधित है। जानकारी के अनुसार सकली देवी नामक महिला ने अपनी नाबालिग नातिन के साथ दुष्कर्म और हत्या के आरोपी अशोक सिंह को निचली अदालत द्वारा बरी किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की थी।

बताया जा रहा है कि समस्तीपुर की अदालत ने वर्ष 2013 में आरोपी को बरी कर दिया था। इसके बाद पीड़िता पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई। यह मामला लंबे समय से लंबित चल रहा था और इसी दौरान अदालत ने संबंधित पक्षों से कई बार रिपोर्ट मांगी थी।

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता पक्ष के अधिवक्ता विकास कुमार पंकज ने अदालत को बताया कि मामला वर्ष 2015 से लंबित है। उन्होंने कहा कि बार-बार रिमाइंडर भेजे जाने के बावजूद पुलिस की ओर से समय पर रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई।

मामले में सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब समस्तीपुर पुलिस और ताजपुर थाना की ओर से दाखिल रिपोर्ट में यह कहा गया कि अपीलकर्ता सकली देवी की मृत्यु हो चुकी है। इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत को यह बताया गया कि महिला अब जीवित नहीं हैं।

हालांकि बाद में यह जानकारी सामने आई कि सकली देवी जीवित हैं। यह तथ्य सामने आते ही अदालत ने पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर नाराजगी जताई। इसके बाद पुलिस को नई रिपोर्ट दाखिल करनी पड़ी, जिससे पूरी स्थिति स्पष्ट हुई।

मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू की खंडपीठ ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए समस्तीपुर के एसपी अरविंद प्रताप सिंह और ताजपुर थानाध्यक्ष राकेश कुमार शर्मा को नोटिस जारी किया। अदालत ने दोनों अधिकारियों को अगली सुनवाई में वर्चुअल माध्यम से उपस्थित रहने का आदेश भी दिया है।

कोर्ट ने अपने आदेश में पूछा कि आखिर बिना सत्यापन के अदालत में इतनी गंभीर और गलत जानकारी कैसे दाखिल कर दी गई। अदालत ने पुलिस रिपोर्ट की विश्वसनीयता और प्रशासनिक लापरवाही पर तीखी टिप्पणी की।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायालय में दाखिल होने वाली हर रिपोर्ट का अत्यंत महत्व होता है। अदालत अपने कई फैसलों और प्रक्रियाओं में इन रिपोर्टों पर भरोसा करती है। ऐसे में यदि किसी जीवित व्यक्ति को मृत बता दिया जाए तो यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाला गंभीर मामला माना जा सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार इस तरह की गलती कई गंभीर परिणाम पैदा कर सकती थी। यदि अदालत को सही जानकारी समय पर नहीं मिलती तो मामले की सुनवाई और अपील की स्थिति पूरी तरह प्रभावित हो सकती थी। यही वजह है कि हाईकोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया है।

इस घटना ने बिहार पुलिस की जांच प्रक्रिया और रिपोर्टिंग सिस्टम को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कई बार अदालतों में पुलिस द्वारा दाखिल रिपोर्टों की गुणवत्ता और सत्यता को लेकर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन इस मामले में जीवित महिला को मृत बताना बेहद गंभीर चूक मानी जा रही है।

कानूनी जानकारों का कहना है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु की पुष्टि किए बिना अदालत में ऐसी रिपोर्ट देना प्रशासनिक जिम्मेदारी के मानकों के खिलाफ है। ऐसे मामलों में पुलिस को स्थानीय सत्यापन, दस्तावेजी जांच और अन्य प्रक्रियाओं का पालन करना जरूरी होता है।

पटना हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 12 मई को निर्धारित की है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि समस्तीपुर पुलिस अदालत में क्या जवाब पेश करती है और इस लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार ठहराया जाता है।

इस मामले ने न्यायिक व्यवस्था में पुलिस की भूमिका को लेकर भी बहस तेज कर दी है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत में दाखिल की जाने वाली रिपोर्टों के लिए जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है। यदि बिना जांच-पड़ताल के रिपोर्ट पेश की जाएंगी तो इससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अदालतों को भेजी जाने वाली रिपोर्टों के लिए एक मजबूत सत्यापन प्रणाली विकसित की जानी चाहिए। इससे ऐसी गलतियों को रोका जा सकता है। कई मामलों में पुलिस रिपोर्ट ही केस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

इधर इस घटना के बाद प्रशासनिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर एक जीवित महिला को मृत घोषित करने जैसी बड़ी गलती कैसे हो गई। यह भी चर्चा है कि क्या रिपोर्ट तैयार करने में जल्दबाजी या लापरवाही बरती गई थी।

वहीं दूसरी ओर इस मामले ने आम लोगों के बीच भी चिंता पैदा की है। लोगों का कहना है कि यदि अदालत में भी गलत तथ्य पहुंच सकते हैं तो आम नागरिकों को न्याय मिलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

कई कानूनी विशेषज्ञों ने कहा है कि अदालत का सख्त रुख जरूरी था, क्योंकि ऐसी घटनाएं न्यायिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करती हैं। उनका कहना है कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है तो इससे भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने में मदद मिल सकती है।

फिलहाल मामला हाईकोर्ट में लंबित है और पुलिस अधिकारियों को जवाब देना है। आने वाली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि आखिर यह चूक कैसे हुई और इसके पीछे प्रशासनिक लापरवाही थी या कोई अन्य कारण।

पटना हाईकोर्ट में सामने आया यह मामला अब पूरे बिहार में चर्चा का विषय बन चुका है। इस घटना ने न केवल पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में सटीक और सत्य जानकारी की अहमियत को भी एक बार फिर सामने ला दिया है।

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