निर्वासन कानून के दुरुपयोग पर पटना हाईकोर्ट सख्त, सहरसा प्रशासन को फटकार; पीड़ित को 1.10 लाख रुपये मुआवजे का आदेश

पटना उच्च न्यायालय ने बिहार में निर्वासन कानून (Bihar Control of Crimes Act, 1981) के गलत इस्तेमाल पर कड़ी नाराज़गी जताई है। अदालत ने सहरसा जिला प्रशासन के मनमाने आदेश को “गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन” करार देते हुए पीड़ित राकेश कुमार यादव के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है।

खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडे शामिल थे, ने स्पष्ट कहा कि किसी व्यक्ति को बिना ठोस आधार के उसके घर से 60 किलोमीटर दूर प्रतिदिन दो बार हाजिरी देने के लिए बाध्य करना संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

60 किलोमीटर दूर थाने में रोजाना दो बार हाजिरी—हाईकोर्ट ने बताया मानवाधिकार उल्लंघन

सहरसा के जिलाधिकारी ने 20 मई 2025 को राकेश कुमार यादव के खिलाफ निर्वासन आदेश जारी किया था। इस आदेश के अनुसार:

  • उन्हें दो महीने तक प्रतिदिन सुबह–शाम बसनही थाना में हाजिरी देनी थी
  • जबकि यह थाना उनके घर से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित है
  • आदेश का आधार महिसी थाने के दो छोटे–मोटे मामले थे

राकेश पर आरोप थे:

  1. शराब बिक्री का एक मामूली केस
  2. एक सरकारी स्कूल के परिसर में ऑर्केस्ट्रा आयोजन का मामला

कोर्ट ने कहा कि इन बर्तावों में कहीं से भी “राज्य या आम जनता को गंभीर खतरा” नहीं दिखता, इसलिए ऐसे आदेश जारी करना पूर्णतः मनमानी कार्रवाई है।

निर्वासन कानून का उद्देश्य असामाजिक तत्वों पर नियंत्रण, न कि आम नागरिकों का उत्पीड़न — हाईकोर्ट

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि बिहार अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1981 का उद्देश्य केवल खतरनाक और असामाजिक तत्वों पर रोक लगाना है।

लेकिन सहरसा प्रशासन ने इस कानून का उपयोग ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कर दिया जो न तो किसी संगठित अपराध में शामिल था और न ही समाज के लिए खतरा था।

कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा—

“ऐसे आदेश संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन हैं। प्रशासनिक अधिकारियों की ये मनमानी अस्वीकार्य है।”

राज्य सरकार को 1.10 लाख मुआवजा देने का आदेश, डीएम से राशि वसूली जाएगी

अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि—

  • पीड़ित राकेश कुमार यादव को एक महीने के भीतर 1.10 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए
  • यह राशि संबंधित दोषी अधिकारियों, विशेषकर सहरसा के जिला मजिस्ट्रेट, से वसूली जाए

यह निर्देश स्पष्ट रूप से बताता है कि भविष्य में अधिकारी नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करते हुए मनमाना आदेश जारी करने से पहले कई बार सोचेंगे।

गृह विभाग के प्रधान सचिव को भेजी जाएगी फैसले की प्रति

कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि इस महत्वपूर्ण फैसले की प्रति बिहार गृह विभाग के प्रधान सचिव को भेजी जाए।
इसके बाद इसे—

  • सभी जिला मजिस्ट्रेटों
  • संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों

तक पहुंचाना अनिवार्य होगा ताकि भविष्य में इस तरह की गलती दोबारा न हो।

राज्य में निर्वासन कानून के दुरुपयोग पर लगाम लगाने की दिशा में अहम कदम

इस फैसले को विशेषज्ञ और कानूनी जानकार मिसाल बता रहे हैं।
निर्वासन कानून का गलत प्रयोग बिहार में लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। कई मामलों में मामूली आरोपों के आधार पर लोगों को घर से दूर रहने और थाने में बार–बार हाजिरी देने के आदेश दिए जाते रहे हैं।

पटना हाईकोर्ट के इस कड़े हस्तक्षेप से उम्मीद है कि—

  • प्रशासनिक दुरुपयोग पर रोक लगेगी
  • आम नागरिकों की स्वतंत्रता सुरक्षित होगी
  • अधिकारी कानून के दायरे में रहकर ही निर्णय लेंगे
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