
पटना/पुनपुन। राजधानी पटना के ग्रामीण अंचलों में एक बार फिर खाकी की साख और कानून के इकबाल को ‘भीड़तंत्र’ ने खुलेआम चुनौती दी है। बुधवार की काली रात गौरीचक थाना क्षेत्र के अलावपुर गांव के लिए एक सामान्य रात नहीं थी, बल्कि यह गवाह बनी उस दुस्साहस की, जहाँ वर्दी पर पत्थर बरसाए गए और लाठियों के दम पर एक अपराधी को पुलिस की गिरफ्त से छीन लिया गया। रंगदारी के एक पुराने मामले में फरार चल रहे पूर्व मुखिया को गिरफ्तार करने गई पुलिस टीम पर ग्रामीणों के एक गुट ने जिस बर्बरता से हमला किया, उसने प्रशासन की सुरक्षा तैयारियों और ग्रामीण इलाकों में बढ़ते अपराधी-जनता गठजोड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस हिंसक झड़प में चार पुलिसकर्मी गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं, जबकि आक्रोशित भीड़ ने सरकारी वाहनों को तहस-नहस कर डाला। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हालात पर काबू पाने के लिए आधे दर्जन थानों की पुलिस को आधी रात को मोर्चा संभालना पड़ा। 17 अप्रैल की सुबह तक गांव में तनाव का माहौल बना रहा और पुलिस अब उन चेहरों की पहचान करने में जुटी है जिन्होंने कानून को अपने हाथ में लेने की हिमाकत की।
आधी रात का ऑपरेशन: अलावपुर में पुलिस की दस्तक
घटनाक्रम की शुरुआत बुधवार देर रात तब हुई जब गौरीचक पुलिस को एक पुख्ता गुप्त सूचना मिली कि रंगदारी (Extortion) के मामले में वांछित अपराधी और पूर्व मुखिया राकेश कुमार अपने पैतृक गांव अलावपुर में मौजूद है। राकेश कुमार पर रंगदारी मांगने और डराने-धमकाने के कई गंभीर आरोप हैं और लंबे समय से वह पुलिस की आंखों में धूल झोंककर फरार चल रहा था। गौरीचक पुलिस ने इस वारंटी को दबोचने के लिए एक विशेष रणनीति तैयार की और तीन वाहनों में सवार होकर भारी संख्या में जवान अलावपुर पहुँचे।
पुलिस की टीम ने बेहद खामोशी से राकेश कुमार के घर की घेराबंदी की और उसे सोते समय ही दबोच लिया। शुरुआत में सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था। पुलिस ने कानूनी प्रक्रिया पूरी करते हुए जैसे ही राकेश कुमार को हिरासत में लेकर अपनी गाड़ी की ओर बढ़ना शुरू किया, वैसे ही गांव की खामोशी चीख-पुकार और शोर-शराबे में बदल गई। राकेश कुमार के परिजनों और समर्थकों ने शोर मचाकर गांव वालों को इकट्ठा करना शुरू कर दिया।
जब गांव बना रणक्षेत्र: लाठी-डंडे और पत्थरों की बौछार
जैसे ही राकेश कुमार को पुलिस वाहन में बैठाया गया, देखते ही देखते दर्जनों की संख्या में ग्रामीण, जिनमें महिलाएं और युवा भी शामिल थे, लाठी-डंडों से लैस होकर पुलिस टीम पर टूट पड़े। पुलिस ने भीड़ को समझाने और पीछे हटने का आग्रह किया, लेकिन भीड़ पर खून सवार था। ग्रामीणों का एक समूह चिल्ला रहा था कि वे अपने ‘मुखिया’ को ले जाने नहीं देंगे। इसी बीच भीड़ की ओर से भारी पथराव शुरू हो गया।
पत्थरों की बारिश इतनी तेज थी कि पुलिस के पास संभलने का मौका तक नहीं रहा। आक्रोशित लोगों ने पुलिस के वाहनों को निशाना बनाया और उनके शीशे तोड़ डाले। इसी आपाधापी और हिंसक झड़प का फायदा उठाकर ग्रामीणों ने राकेश कुमार को पुलिस की कस्टडी से जबरन छुड़ा लिया। पुलिसकर्मियों ने जब विरोध किया, तो उन्हें लाठियों से पीटा गया। इस हमले में चार जवान लहूलुहान हो गए। वर्दी पर पड़े ये घाव केवल शारीरिक नहीं थे, बल्कि यह उस व्यवस्था पर प्रहार था जो समाज में शांति बनाए रखने का जिम्मा संभालती है।
बैकफुट पर पुलिस: अतिरिक्त बल के बाद संभले हालात
अचानक हुए इस संगठित हमले से पुलिस की टीम रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। एक ओर अपराधी को हाथ से निकलना पड़ा और दूसरी ओर अपने ही जवानों की जान बचाना प्राथमिकता बन गई। घटना की सूचना मिलते ही मुख्यालय में हड़कंप मच गया। गौरीचक थानाध्यक्ष ने तुरंत वायरलेस पर संदेश प्रसारित किया, जिसके बाद पचरुखिया थाना सहित आसपास के कई थानों की पुलिस और अतिरिक्त बल अलावपुर के लिए रवाना किया गया।
जब कई थानों की पुलिस एक साथ गांव में दाखिल हुई, तब जाकर उपद्रवी तत्व वहां से भाग खड़े हुए। पुलिस ने पूरे गांव की घेराबंदी कर तलाशी अभियान चलाया, लेकिन तब तक पूर्व मुखिया राकेश कुमार और हमला करने वाले मुख्य साजिशकर्ता फरार हो चुके थे। घायल जवानों को तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उनका प्राथमिक उपचार किया गया। डॉक्टरों के अनुसार, जवानों को सिर और पीठ पर गंभीर चोटें आई हैं, हालांकि उनकी स्थिति अब खतरे से बाहर है।
राकेश कुमार का ‘रंगदारी’ कनेक्शन और रसूख का खेल
यह हमला केवल एक वारंटी को बचाने की कोशिश नहीं थी, बल्कि यह उस रसूख का प्रदर्शन था जिसे अपराधी अक्सर गांव के भोले-भाले लोगों की आड़ में छिपाते हैं। पूर्व मुखिया राकेश कुमार पर रंगदारी मांगने का संगीन आरोप है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, वह इलाके में ठेकेदारों और स्थानीय व्यवसायियों से अवैध वसूली के लिए जाना जाता है। उसके खिलाफ पहले से ही कई प्राथमिकी दर्ज हैं।
अक्सर देखा जाता है कि ग्रामीण इलाकों में रसूखदार अपराधी अपने आसपास एक सुरक्षा कवच तैयार कर लेते हैं, जहाँ वे खुद को समाज का ‘रक्षक’ या ‘मसीहा’ साबित करने की कोशिश करते हैं। इसी का नतीजा है कि जब पुलिस अपना कर्तव्य निभाने पहुँचती है, तो आम लोग भी अपराधियों के ढाल बन जाते हैं। अलावपुर की घटना ने इसी कड़वे सच को उजागर किया है कि कैसे एक रंगदार के लिए लोग अपनी ही सुरक्षा करने वाली पुलिस के खून के प्यासे हो गए।
कठोर कार्रवाई की तैयारी: पांच नामजद और 25 अज्ञात पर प्राथमिकी
गौरीचक पुलिस ने इस दुस्साहस को बहुत ही गंभीरता से लिया है। थानाध्यक्ष ने बताया कि पुलिस टीम पर हमला करने, सरकारी कार्य में बाधा डालने, पुलिस वाहनों को क्षतिग्रस्त करने और गिरफ्तार आरोपी को छुड़ाने के आरोप में पांच नामजद और 25 अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। पुलिस ने साफ कर दिया है कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
पुलिस अब उन वीडियो फुटेज और तकनीकी साक्ष्यों को खंगाल रही है जिनसे उन उपद्रवियों की पहचान की जा सके जिन्होंने लाठी-डंडे चलाए थे। गांव के कुछ लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ भी की जा रही है। थानाध्यक्ष ने कड़े लहजे में कहा कि वर्दी पर हाथ उठाना राज्य की सत्ता को चुनौती देना है और इसके परिणाम भुगतने होंगे। राकेश कुमार की गिरफ्तारी के लिए अब एसटीएफ (STF) की मदद लेने पर भी विचार किया जा रहा है, क्योंकि वह अब एक ‘फरार कैदी’ की श्रेणी में आ चुका है।
पुलिस की साख और ग्रामीण सुरक्षा का सवाल
अलावपुर की यह घटना पहली बार नहीं है जब बिहार में पुलिस को ग्रामीणों के आक्रोश का सामना करना पड़ा है। लेकिन जिस तरह से एक वारंटी को छुड़ाने के लिए सुनियोजित हमला किया गया, वह चिंताजनक है। यह घटना दर्शाती है कि अपराधियों के मन से कानून का खौफ कम हो रहा है और वे जनता को उकसाकर अपने निजी फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि पुलिस और जनता के बीच बढ़ती दूरी का फायदा ये अपराधी उठाते हैं। पुलिस को अपनी मुखबिर तंत्र को और अधिक मजबूत करने और ऐसी गिरफ्तारियों के समय ‘क्विक रिस्पॉन्स टीम’ (QRT) को साथ रखने की आवश्यकता है। अगर पुलिस इसी तरह बैकफुट पर रही, तो ग्रामीण अंचलों में संगठित अपराध को रोकना नामुमकिन हो जाएगा।
निष्कर्ष: सुशासन के लिए बड़ी चुनौती
17 अप्रैल की दोपहर तक अलावपुर गांव में सन्नाटा पसरा हुआ है, लेकिन यह सन्नाटा किसी बड़ी कार्रवाई की आहट दे रहा है। पुलिस की गाड़ियां लगातार गश्त कर रही हैं। यह मामला अब केवल एक गिरफ्तारी का नहीं रह गया है, बल्कि यह पटना पुलिस की प्रतिष्ठा का विषय बन चुका है। जो जवान घायल हुए हैं, उनके प्रति विभाग में भारी संवेदना है, लेकिन साथ ही अपराधियों को धूल चटाने का संकल्प भी।
पूर्व मुखिया राकेश कुमार का फरार होना पुलिस की एक बड़ी चूक मानी जा रही है, लेकिन प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि वह जल्द ही सलाखों के पीछे होगा। अलावपुर के उन 25 अज्ञात हमलावरों को भी यह समझना होगा कि कानून की चक्की धीरे जरूर चलती है, लेकिन पिसती बहुत महीन है। ‘वॉइस ऑफ बिहार’ की टीम इस मामले पर पैनी नजर बनाए हुए है और हम यह सुनिश्चित करेंगे कि न्याय की हर छोटी-बड़ी खबर आप तक पहुँचती रहे। सुशासन का असली पैमाना यही है कि अपराधी जेल में हों और पुलिस निडर होकर अपना काम कर सके।


