
भागलपुर। विदेश में रोजगार की तलाश में गए एक प्रवासी भारतीय की अचानक हुई मौत ने बिहार के भागलपुर जिले के एक गांव को गहरे शोक में डुबो दिया। ओमान में कार्यरत 50 वर्षीय रामानंद यादव का पार्थिव शरीर जब कई दिनों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनके पैतृक गांव पहुंचा तो वहां का माहौल पूरी तरह गमगीन हो गया। परिवार के सदस्यों की चीख-पुकार और आंसुओं ने हर किसी की आंखें नम कर दीं। गांव के लोगों ने भी बड़ी संख्या में पहुंचकर दिवंगत को श्रद्धांजलि अर्पित की और शोक संतप्त परिवार को सांत्वना दी।
भागलपुर जिले के बिहपुर प्रखंड अंतर्गत अरसंडी गांव के रहने वाले रामानंद यादव बीते कई वर्षों से ओमान में रहकर काम कर रहे थे। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उन्होंने विदेश का रुख किया था। लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि रोजगार की तलाश में घर से हजारों किलोमीटर दूर गए रामानंद एक दिन इस तरह ताबूत में बंद होकर वापस लौटेंगे।
अचानक आई मौत की खबर से टूट गया परिवार
परिजनों के अनुसार छह जून को ओमान की राजधानी मस्कट में रामानंद यादव को अचानक हृदयाघात हुआ। उन्हें बचाने की कोशिश की गई, लेकिन चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। मौत की सूचना जैसे ही बिहार स्थित उनके परिवार तक पहुंची, पूरे घर में मातम छा गया।
रामानंद यादव की पत्नी, बेटे और बेटी इस खबर को सुनकर पूरी तरह टूट गए। परिवार को सबसे बड़ी चिंता यह थी कि आखिर उनके पार्थिव शरीर को भारत कैसे लाया जाएगा। विदेश में हुई मौत के बाद शव को स्वदेश लाने की प्रक्रिया काफी जटिल और समय लेने वाली होती है। ऐसे में परिवार लगातार अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और संबंधित एजेंसियों से संपर्क साधने में जुट गया।
गांव पहुंचते ही मचा कोहराम
कई दिनों की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बाद रामानंद यादव का शव भारत लाया जा सका। शनिवार सुबह जब उनका पार्थिव शरीर अरसंडी गांव पहुंचा तो पूरा गांव शोक में डूब गया। घर के बाहर लोगों की भीड़ जमा हो गई। अंतिम दर्शन के लिए आसपास के गांवों से भी लोग पहुंचे।
जैसे ही शव वाहन गांव में दाखिल हुआ, परिवार के सदस्यों का दर्द फूट पड़ा। पत्नी और बच्चों की हालत देखकर वहां मौजूद लोग भी भावुक हो उठे। गांव की महिलाओं और बुजुर्गों ने परिजनों को संभालने की कोशिश की, लेकिन अपने प्रियजन को खोने का दर्द हर किसी के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।
ग्रामीणों का कहना था कि रामानंद यादव बेहद मिलनसार और मेहनती व्यक्ति थे। उन्होंने हमेशा अपने परिवार और गांव के लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे। यही वजह थी कि उनके निधन की खबर से पूरे क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई।
दस वर्षों से विदेश में कर रहे थे काम
परिवार के लोगों ने बताया कि रामानंद यादव पिछले करीब दस वर्षों से ओमान में प्लंबर के रूप में कार्यरत थे। विदेश में काम कर वे अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। उनकी कमाई से ही घर की आर्थिक जरूरतें पूरी होती थीं और बच्चों की पढ़ाई भी चल रही थी।
कुछ समय पहले वे छुट्टी पर अपने गांव आए थे और परिवार के साथ समय बिताया था। बाद में रोजगार के सिलसिले में दोबारा ओमान लौट गए थे। पिछले वर्ष सितंबर में वह पुनः मस्कट पहुंचे थे और वहीं कार्य कर रहे थे। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह उनकी अंतिम विदेश यात्रा साबित होगी।
शव को भारत लाने के लिए चला प्रयासों का लंबा दौर
रामानंद यादव की मौत के बाद परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उनका पार्थिव शरीर भारत लाना था। विदेश में मृत्यु होने की स्थिति में कई सरकारी और राजनयिक प्रक्रियाओं को पूरा करना पड़ता है। इस दौरान परिवार लगातार मदद की गुहार लगाता रहा।
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया। गांव के लोगों के अनुसार परिजनों ने विभिन्न स्तरों पर संपर्क स्थापित कर मदद की अपील की। इसके बाद संबंधित विभागों और जनप्रतिनिधियों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
भारतीय दूतावास और सरकार के सहयोग से पूरी हुई प्रक्रिया
जानकारी के अनुसार ओमान स्थित भारतीय दूतावास, भारत सरकार और कई जनप्रतिनिधियों के समन्वित प्रयासों से शव को स्वदेश लाने की प्रक्रिया पूरी की गई। आवश्यक दस्तावेजी कार्रवाई, अनुमति और परिवहन व्यवस्था सुनिश्चित होने के बाद पार्थिव शरीर भारत भेजा गया।
शुक्रवार को शव भारत पहुंचा और इसके बाद सड़क मार्ग से बिहार लाया गया। शनिवार सुबह जैसे ही पार्थिव शरीर गांव पहुंचा, परिवार को अपने प्रियजन के अंतिम दर्शन का अवसर मिला। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर सरकारी और प्रशासनिक सहयोग नहीं मिलता तो यह प्रक्रिया और अधिक लंबी हो सकती थी।
अंतिम संस्कार की तैयारी में जुटे परिजन
गांव पहुंचने के बाद परिजनों ने अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू कर दी। बड़ी संख्या में लोग रामानंद यादव को श्रद्धांजलि देने पहुंचे। ग्रामीणों ने उनके जीवन संघर्ष और परिवार के प्रति समर्पण को याद किया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि रामानंद यादव उन हजारों प्रवासी मजदूरों में शामिल थे जो अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए विदेशों में कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं। उनकी मौत ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विदेशों में काम करने वाले भारतीय श्रमिकों के सामने कितनी चुनौतियां होती हैं।
प्रवासी मजदूरों के जीवन की कठिन सच्चाई
रामानंद यादव की कहानी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि उन लाखों भारतीय कामगारों की कहानी भी है जो रोजी-रोटी के लिए अपने घर और परिवार से दूर रहते हैं। बेहतर आय की उम्मीद में विदेश जाने वाले श्रमिक अक्सर कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं और कई बार स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना भी करते हैं।
उनकी असामयिक मौत ने पूरे गांव को झकझोर दिया है। परिवार के लिए यह क्षति अपूरणीय है। हालांकि शव के स्वदेश पहुंचने से परिजनों को अंतिम दर्शन और सम्मानजनक अंतिम संस्कार का अवसर मिल सका, लेकिन परिवार के जीवन में जो खालीपन आया है, उसे भर पाना संभव नहीं होगा।
अरसंडी गांव में शनिवार का दिन शोक और संवेदना के बीच बीता। हर व्यक्ति की जुबान पर केवल एक ही चर्चा थी—विदेश में परिवार के लिए संघर्ष करने वाले रामानंद यादव अब कभी वापस नहीं लौटेंगे। उनकी यादें, उनका संघर्ष और परिवार के प्रति उनका समर्पण गांव के लोगों के बीच लंबे समय तक जीवित रहेगा।


