अब स्कूल के बच्चों को भी ‘जीविका दीदी’ की पोशाक, ग्रामीण महिलाओं को मिलेगा बड़ा रोजगार अवसर

पटना। आंगनवाड़ी केंद्रों की तरह अब सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भी जीविका दीदियों द्वारा सिली हुई पोशाक उपलब्ध कराने की तैयारी शुरू हो गई है। ग्रामीण विकास मंत्री श्री श्रवण कुमार ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि कक्षा 1 से 5 तक के बच्चों को दी जाने वाली पोशाक भी अब जीविका समूहों के माध्यम से तैयार कराई जाएगी।

यह घोषणा उन्होंने रविवार को दशरथ मांझी श्रम एवं नियोजन अध्ययन संस्थान के सभागार में आयोजित कार्यक्रम के दौरान की, जहां समाज कल्याण मंत्री श्री मदन साहनी के साथ संयुक्त रूप से आंगनवाड़ी केंद्रों के बच्चों को पोशाक वितरण की शुरुआत की गई।

मार्च तक 50 लाख बच्चों को मिलेगी पोशाक
मंत्री श्रवण कुमार ने बताया कि फिलहाल राज्य के लगभग 50 लाख आंगनवाड़ी बच्चों के लिए पोशाक का निर्माण जीविका दीदियों द्वारा किया जा रहा है और मार्च तक सभी बच्चों को पोशाक उपलब्ध करा दी जाएगी। इसके बाद अगले सत्र की तैयारी भी समय से शुरू की जाएगी।

उन्होंने कहा कि इस मॉडल को स्कूल स्तर तक विस्तार देने के लिए शिक्षा विभाग के साथ शीघ्र उच्चस्तरीय बैठक कर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।

महिलाओं को मिलेगा बड़े पैमाने पर रोजगार
मंत्री ने बताया कि वर्तमान में करीब 1 लाख महिलाएं 1050 सिलाई केंद्रों के माध्यम से पोशाक निर्माण से जुड़ी हुई हैं। आने वाले समय में इससे 5 लाख से अधिक महिलाओं को रोजगार मिलने की संभावना है। इससे मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के 1 करोड़ रोजगार के लक्ष्य को मजबूती मिलेगी।

समाज कल्याण मंत्री का ऐलान – अंडा और दूध अनिवार्य
समाज कल्याण मंत्री श्री मदन साहनी ने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्रों पर सप्ताह में दो दिन अंडा और प्रतिदिन दूध दिया जाएगा। साथ ही बच्चों को मिलने वाली पोशाक से सभी में समानता आएगी और उनकी उपस्थिति भी बढ़ेगी।

‘नकद नहीं, सामग्री’ से मजबूत होगी ग्रामीण अर्थव्यवस्था
ग्रामीण विकास विभाग के प्रधान सचिव श्री पंकज कुमार ने कहा कि पहले बच्चों को दी जाने वाली राशि अक्सर अन्य जरूरतों में खर्च हो जाती थी, लेकिन अब सीधे पोशाक मिलने से गुणवत्ता भी सुधरेगी और पारदर्शिता भी आएगी।

50 लाख पोशाक कम समय में तैयार करना बड़ी उपलब्धि
समाज कल्याण विभाग की सचिव श्रीमती बंदना प्रेयसी ने कहा कि जीविका दीदियों ने कम समय में 50 लाख पोशाक तैयार कर यह साबित कर दिया है कि यह मॉडल प्रभावी और भरोसेमंद है। एक बच्चे को साल में दो पोशाक देने की योजना पर भी काम चल रहा है।

तकनीक से निगरानी और गुणवत्ता सुनिश्चित
कार्यक्रम में स्टिच मॉनिटरिंग सिस्टम ऐप, सॉफ्टवेयर और सिलाई प्रशिक्षण पुस्तिका का विमोचन भी किया गया, ताकि पोशाक निर्माण में गुणवत्ता और समयबद्धता सुनिश्चित हो सके।

बिहार में यह पहल न सिर्फ बच्चों की जरूरत पूरी करेगी, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर राज्य की अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा देगी।

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