HIGHLIGHTS: आत्मनिर्भर बिहार की नई ‘सहकारी’ पटकथा
- गाँव में ही रोजगार: पैक्स (PACS) और FPO के माध्यम से अब ग्रामीणों को काम के लिए शहर नहीं जाना पड़ेगा।
- बिचौलियों की छुट्टी: रिलायंस मार्ट, बिग बास्केट और मदर डेयरी जैसे कॉर्पोरेट दिग्गज अब सीधे खेतों से उठाएंगे माल।
- प्रेरणा: महाराष्ट्र और तमिलनाडु के सफल मॉडल्स को वीडियो कॉल से लाइव देख बिहार के प्रतिनिधियों ने सीखे बिजनेस के गुर।
- मंत्री का ‘लंच’ डिप्लोमेसी: सहकारिता मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार ने प्रतिभागियों के साथ जमीन पर बैठकर किया भोजन, बढ़ाया हौसला।
📊 कार्यशाला का ‘बिज़नेस प्लान’: एक नजर में
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मुख्य बिंदु |
विवरण |
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आयोजन स्थल |
दीप नारायण सिंह क्षेत्रीय सहकारी प्रबंध संस्थान, शास्त्रीनगर, पटना। |
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प्रमुख क्षेत्र |
जैविक खेती, वर्मी कम्पोस्ट, खाद्य प्रसंस्करण, मिलेट (Millet) उत्पादन। |
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औद्योगिक इकाईयां |
तेल मिल, दाल मिल, मसालों का प्रसंस्करण और मक्का आधारित उत्पाद। |
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सहयोगी संस्थान |
नाबार्ड (NABARD), जीविका, इफ्को (IFFCO), SBI, NITI आयोग। |
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कॉर्पोरेट पार्टनर्स |
मदर डेयरी, रिलायंस मार्ट, बिग बास्केट, देहात, नाफेड (NAFED)। |
पटना | 19 मार्च, 2026
बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब केवल खेती-किसानी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ‘एग्रो-बिजनेस’ का बड़ा केंद्र बनने जा रही है। पटना के शास्त्रीनगर में आयोजित तीन दिवसीय विशेष कार्यशाला के समापन पर निबंधक (सहयोग समितियां) श्री रजनीश कुमार सिंह ने बड़ा दावा किया कि पैक्स और FPO के माध्यम से बिहार जल्द ही देश का बड़ा ‘रोजगार बाजार’ बनेगा।
खेत से ‘शॉपिंग मॉल’ तक का सफर
इस कार्यशाला की सबसे बड़ी उपलब्धि रही—गाँव के पैक्सों का सीधा जुड़ाव कॉर्पोरेट खरीदारों से कराना।
- डायरेक्ट लिंकिंग: मदर डेयरी और बिग बास्केट जैसे खरीदारों ने भरोसा दिलाया है कि यदि पैक्स बड़े पैमाने पर उत्पादन करते हैं, तो वे सीधे गाँव से ही सामग्री उठाएंगे।
- इनोवेशन: प्रतिभागियों को केवल अनाज उगाना नहीं, बल्कि उसकी पैकेजिंग, तेल मिल और दाल मिल चलाने जैसे ग्रामीण उद्योगों की ट्रेनिंग दी गई।
- तकनीकी ज्ञान: ‘पॉली हाउस’ और ‘खाद्य प्रसंस्करण’ के जरिए किसान अब अपनी उपज का मूल्यवर्धन (Value Addition) कर दोगुना मुनाफा कमा सकेंगे।
नीति आयोग और विशेषज्ञों की ‘मुहर’
कार्यशाला के समापन सत्र (18 मार्च) में नई दिल्ली से आईं नीति आयोग की वरीय सलाहकार श्रीमती बबिता सिंह और अन्य शिक्षाविदों ने अपने अनुभव साझा किए। विशेषज्ञों ने जोर दिया कि बिहार के पैक्सों में वह क्षमता है कि वे झारखंड और ओडिशा के सफल सहकारी मॉडल्स को पीछे छोड़ सकें। सरकार की ओर से कार्यशील पूंजी (Working Capital) और विपणन (Marketing) की व्यवस्था करने का भी आश्वासन दिया गया है।
VOB का नजरिया: क्या ‘पैक्स’ बनेगा बिहार का ‘अमूल’?
बिहार में पैक्स को अक्सर केवल ‘धान-गेहूं खरीद’ का जरिया माना जाता रहा है, लेकिन यह कार्यशाला इस सोच को बदलने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है। जब रिलायंस और बिग बास्केट जैसे दिग्गज गाँव पहुंचेंगे, तो बिचौलियों का ‘कमीशन राज’ खत्म होगा। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि यदि Bihar Skill Development Mission और कृषि विभाग का यह समन्वय धरातल पर उतरा, तो ‘आत्मनिर्भर गाँव’ केवल नारा नहीं, हकीकत बन जाएगा। चुनौती बस इतनी है कि गाँव के छोटे किसानों को इन बड़े कॉर्पोरेट मानकों (Standardization) के लिए तैयार करना होगा।


