
नोएडा/पटना। भारत की सीमाओं के भीतर अशांति फैलाने के लिए डिजिटल दुनिया को हथियार बनाने की कोशिशें अब और अधिक संगठित और खतरनाक हो चुकी हैं। उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र नोएडा में बीते 13 अप्रैल को श्रमिकों के प्रदर्शन के दौरान हुए भीषण उपद्रव के पीछे किसी स्थानीय रंजिश या तात्कालिक गुस्से का हाथ नहीं था, बल्कि इसके तार सात समंदर पार नहीं तो कम से कम ‘सीमा पार’ पाकिस्तान से जुड़े हुए थे। नोएडा पुलिस ने गुरुवार को एक प्रेस वार्ता में जो खुलासे किए हैं, उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों और आम जनता की नींद उड़ा दी है। इस पूरी साजिश का सबसे कड़वा सच यह है कि पाकिस्तान से संचालित इस नफरती एजेंडे को जमीन पर उतारने के लिए बिहार के दो युवाओं का इस्तेमाल किया गया। छपरा और गोपालगंज से ताल्लुक रखने वाले इन आरोपितों ने अनजाने में या जानबूझकर पाकिस्तानी हैंडल से फैलाई गई अफवाहों को हवा दी, जिससे शांतिपूर्ण प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया। पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह के खुलासे ने यह साफ कर दिया है कि कैसे सोशल मीडिया के जरिए ‘डिजिटल वारफेयर’ का उपयोग करके भारतीय शहरों को सुलगाने की साजिश रची जा रही है।
13 अप्रैल की वह काली दोपहर: जब अफवाहों ने ली कानून की जगह
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें 13 अप्रैल को नोएडा में हुए श्रमिकों के प्रदर्शन में छिपी हैं। अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से सड़क पर उतरे मजदूरों के बीच अचानक हिंसा भड़क उठी थी। पत्थरबाजी, तोड़फोड़ और आगजनी की तस्वीरों ने पूरे देश को चौंका दिया था। शुरुआत में इसे केवल मांगों को लेकर उपजा आक्रोश माना जा रहा था, लेकिन जब जांच की परतें खुलीं, तो एक बड़ा ‘साइबर सिंडिकेट’ सामने आया।
पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बताया कि जांच के दौरान सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) से संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी साझा करने का अनुरोध किया गया था। वहां से जो डेटा मिला, उसने पूरी जांच की दिशा ही बदल दी। यह पाया गया कि जब नोएडा में श्रमिक प्रदर्शन कर रहे थे, ठीक उसी समय पाकिस्तान से संचालित कुछ फर्जी अकाउंट्स से भ्रामक और भड़काऊ पोस्ट की बौछार कर दी गई। इन पोस्टों में दावा किया गया कि पुलिस की कार्रवाई में कई मजदूरों की मौत हो गई है और नोएडा में भारी हिंसा हो रही है। इन झूठी खबरों ने प्रदर्शनकारियों के बीच आग में घी डालने का काम किया, जिससे भीड़ बेकाबू हो गई।
बिहार कनेक्शन: छपरा का ऑटो चालक और गोपालगंज की युवती
साजिश की इस पटकथा में बिहार के दो नाम मुख्य भूमिका में उभरे हैं। गिरफ्तार किए गए तीन साजिशकर्ताओं में से दो का सीधा संबंध बिहार से है। पहला आरोपी रूपेश रॉय है, जो मूल रूप से छपरा का रहने वाला है और नोएडा में ऑटो चलाकर अपना गुजारा करता था। दूसरा नाम मनीषा चौहान का है, जो गोपालगंज की निवासी है।
इन दोनों की गिरफ्तारी ने यह साबित कर दिया है कि तस्करों और राष्ट्रविरोधी तत्वों की नजर अब उन लोगों पर है जो जीविकोपार्जन के लिए बिहार से बाहर महानगरों में रहते हैं। रूपेश रॉय, जो एक साधारण ऑटो चालक था, उसे डिजिटल माध्यम से कैसे रेडिकलाइज किया गया या वह कैसे इस नेटवर्क का हिस्सा बना, यह जांच का गंभीर विषय है। पुलिस के अनुसार, इन दोनों ने स्थानीय स्तर पर पाकिस्तानी हैंडल से आ रहे संदेशों को प्रसारित किया और प्रदर्शनकारियों के बीच यह नैरेटिव सेट किया कि प्रशासन उनके खिलाफ दमनकारी नीति अपना रहा है। एक ओर जहाँ बिहार अपनी मेधा और परिश्रम के लिए जाना जाता है, वहीं इन दो नामों ने प्रदेश की छवि को एक अनचाही चर्चा में डाल दिया है।
‘अनुषि तिवारी’ और ‘मीर इलियास’: पाकिस्तान से संचालित नफरत की दुकान
पुलिस की तकनीकी जांच में दो विशिष्ट एक्स हैंडल्स की पहचान हुई है—‘अनुषि तिवारी’ और ‘मीर इलियास’। पहली नजर में भारतीय और आम लगने वाले ये नाम दरअसल पाकिस्तानी प्रोपेगेंडा का हिस्सा थे। पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने बताया कि इन हैंडल्स का डिजिटल फुटप्रिंट पाकिस्तान में मिला है।
इन हैंडल्स ने नोएडा की घटना को लेकर ऐसी तस्वीरें और वीडियो साझा किए जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने ‘नोएडा बर्निंग’ और ‘लेबर किलिंग इन इंडिया’ जैसे हैशटैग का इस्तेमाल कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि बिगाड़ने और स्थानीय स्तर पर समुदायों को उकसाने का काम किया। रूपेश और मनीषा जैसे लोग इन हैंडल्स के संपर्क में थे या उनके द्वारा फैलाई गई सूचनाओं को बिना सोचे-समझे आगे बढ़ा रहे थे। यह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का एक ऐसा खतरनाक उदाहरण है जहाँ सीमाओं के पार बैठा दुश्मन बिना एक गोली चलाए हमारे समाज के भीतर दरार पैदा कर देता है।
तीसरे आरोपी की तलाश और पुलिस की सक्रियता
इस तिकड़ी का तीसरा मुख्य आरोपी आदित्य अभी भी पुलिस की पकड़ से बाहर है। आदित्य की गिरफ्तारी पुलिस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि माना जा रहा है कि वह ही पाकिस्तान से आने वाले इनपुट और स्थानीय साजिशकर्ताओं के बीच की मुख्य कड़ी (Link) हो सकता है। लक्ष्मी सिंह ने बताया कि आदित्य की तलाश में पुलिस की छह टीमें अलग-अलग ठिकानों पर दबिश दे रही हैं।
जांच का दायरा केवल नोएडा तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार में उनके पैतृक गांवों और अन्य संपर्कों को भी खंगाला जा रहा है। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि क्या इन आरोपितों को इस काम के लिए कोई वित्तीय सहायता (Funding) भी मिली थी। अक्सर ऐसे मामलों में ‘क्रिप्टो करेंसी’ या ‘हवाला’ के जरिए भुगतान की बात सामने आती रही है। नोएडा पुलिस ने स्पष्ट किया है कि यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी एक बड़ी चुनौती है।
डिजिटल साक्षरता और नागरिक जिम्मेदारी का सवाल
नोएडा की यह घटना एक बड़ा सबक है कि कैसे सूचना के इस युग में हम अनजाने में दुश्मन के मोहरे बन सकते हैं। छपरा के रूपेश और गोपालगंज की मनीषा जैसे लोग, जो शायद अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण डिजिटल साक्षरता में पिछड़े हो सकते हैं, उन्हें बड़ी आसानी से नफरत के जाल में फँसाया गया।
यह घटना बिहार के युवाओं के लिए भी एक चेतावनी है जो रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं। सोशल मीडिया पर किसी भी सूचना को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना अब केवल एक नैतिकता नहीं, बल्कि कानूनी जरूरत बन गई है। लक्ष्मी सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में अपील की है कि लोग सोशल मीडिया पर आने वाली ‘सेंसिटिव’ पोस्ट को तब तक आगे न बढ़ाएं जब तक कि आधिकारिक सूत्रों से उसकी पुष्टि न हो जाए। पाकिस्तान स्थित हैंडल हमेशा ऐसी ताक में रहते हैं जहाँ किसी भी छोटे विवाद को बड़ा सांप्रदायिक या हिंसक रूप दिया जा सके।
निष्कर्ष और सुरक्षा एजेंसियों की अगली रणनीति
नोएडा पुलिस ने अब इस मामले में एनआईए (NIA) या एटीएस (ATS) जैसी विशेष एजेंसियों से भी सहयोग लेने के संकेत दिए हैं, क्योंकि विदेशी धरती से भारत के भीतर हिंसा भड़काने का यह सीधा मामला है। रूपेश और मनीषा की गिरफ्तारी के बाद उनके मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स को फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है।
आने वाले दिनों में यह खुलासा हो सकता है कि पाकिस्तान का यह नेटवर्क भारत के अन्य किन शहरों में सक्रिय है। फिलहाल, छपरा और गोपालगंज में इन आरोपितों के घरों पर सन्नाटा है और परिजन इस बात से स्तब्ध हैं कि उनके बच्चे देशविरोधी साजिश का हिस्सा कैसे बन गए। 13 अप्रैल की उस हिंसा ने नोएडा के औद्योगिक पहिये को भले ही कुछ देर के लिए रोका हो, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी ने एक बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश के चेहरे से नकाब हटा दिया है। यह लड़ाई अब केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि डिजिटल स्क्रीन के हर उस पिक्सेल पर लड़ी जानी है जहाँ से झूठ का व्यापार शुरू होता है।


