पटना में नीति आयोग का ‘महामंथन’ संपन्न! अब ‘बैंक’ नहीं, ‘वन-स्टॉप शॉप’ बनेंगे पैक्स (PACS); 10 राज्यों के सफल मॉडलों से बदलेगी बिहार के गांवों की सूरत

HIGHLIGHTS: पूर्वी भारत के किसानों को सशक्त बनाने का ‘रोडमैप’ तैयार; सरकारी बैसाखी छोड़ ‘आत्मनिर्भर’ बनेगी सहकारिता

  • बड़ा विजन: नीति आयोग की दो दिवसीय कार्यशाला में पैक्स (PACS) को ‘बहुउद्देशीय आर्थिक इकाई’ बनाने पर बनी सहमति।
  • डिजिटल क्रांति: ईआरपी (ERP) सिस्टम और ई-नाम (e-NAM) एकीकरण से पैक्स की कार्यप्रणाली में आएगी पारदर्शिता और मुनाफा।
  • सीख और साझा: छत्तीसगढ़ का ‘धान मॉडल’, सिक्किम का ‘टूरिज्म पैक्स’ और झारखंड का ‘LAMPS’ मॉडल बनेगा प्रेरणा।
  • नीति आयोग की सलाह: प्रो० रमेश चंद बोले— “सहयोग लें, पर निर्भर न रहें; बाजार के हिसाब से बदलें सहकारी संस्थाएं।”

पटना | 21 मार्च, 2026

​बिहार की राजधानी पटना में नीति आयोग के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुक्रवार को भव्य समापन हुआ। “पूर्वी भारत में किसान संगठनों का सशक्तिकरण” विषय पर आयोजित इस समिट ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी पैक्स (PACS) ही होंगे। अब पैक्स केवल खाद-बीज बांटने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे गांवों के ‘बिजनेस हब’ बनेंगे।

पैक्स का ‘नया अवतार’: 10 राज्यों की ‘बेस्ट प्रैक्टिसेज’ का संगम

​कार्यशाला में बिहार समेत 10 राज्यों के अधिकारियों और पैक्स अध्यक्षों ने अपने ‘सक्सेस मंत्र’ साझा किए, जो किसी भी स्टार्टअप आइडिया से कम नहीं हैं:

राज्य

सफल मॉडल (Best Practice)

बिहार के लिए सीख

छत्तीसगढ़

धान अधिप्राप्ति की कुशल प्रणाली

खरीद प्रक्रिया में तेजी और किसानों को समय पर भुगतान।

सिक्किम

पैक्स के जरिए पर्यटन (Tourism)

ग्रामीण पर्यटन से पैक्स की आय में वृद्धि का नया जरिया।

झारखंड

LAMPS (जनजातीय क्षेत्रों में सहकारिता)

हाशिए पर खड़े समुदायों को आर्थिक मुख्यधारा से जोड़ना।

बिहार

स्थानिक विश्लेषण (Spatial Analysis)

गेहूं-धान खरीद में तकनीक का सटीक उपयोग।

“सरकारी मदद पर न टिकें, बाजार से लड़ें”: प्रो० रमेश चंद

​नीति आयोग के सदस्य (कृषि) प्रो० रमेश चंद ने समापन सत्र में कड़ा लेकिन जरूरी संदेश दिया। उन्होंने कहा कि पैक्स को सरकारी अनुदान के भरोसे बैठने के बजाय एक ‘प्रोफेशनल कंपनी’ की तरह काम करना चाहिए। गुणवत्ता आधारित प्रबंधन और ‘डिजिटलीकरण से आय सृजन’ ही वह रास्ता है, जिससे पैक्स आत्मनिर्भर बन सकेंगे।

VOB का नजरिया: क्या ‘वन-स्टॉप संस्थान’ बनने से खत्म होगी पैक्स की सुस्ती?

​नीति आयोग और बिहार सहकारिता विभाग की यह पहल कागजों पर तो क्रांतिकारी दिखती है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि पैक्स को ‘वन-स्टॉप संस्थान’ बनाना समय की मांग है। अगर एक ही जगह पर किसान को लोन, बीज, बाजार और तकनीकी सलाह (AI/IoT आधारित) मिलने लगे, तो उसे शहरों की ओर नहीं भागना पड़ेगा।

​हालांकि, सबसे बड़ी चुनौती ‘पेशेवर प्रबंधन’ (Professional Management) की है। अक्सर पैक्स स्थानीय राजनीति का अखाड़ा बन जाते हैं। सिक्किम की तरह बिहार में भी अगर पैक्स ‘पर्यटन’ या ‘प्रोसेसिंग यूनिट’ जैसे नवाचार (Innovation) अपनाते हैं, तो ग्रामीण बेरोजगारी पर बड़ा प्रहार होगा। निबंधक रजनीश कुमार सिंह का यह कहना सही है कि “विविधता ही हमारी ताकत है,” लेकिन इस ताकत को ‘मुनाफे’ में बदलना असली परीक्षा होगी।

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