मुस्लिम महिलाएं छठ करती हैं, क्योंकि किसी को मन्नत से बेटा हुआ तो किसी को बीमारी से मिला छुटकारा

 

आस्था जाति और धर्म जैसे दायरों में नहीं बंधती है। यह देखने को मिलता है, बिहार के सबसे बड़े पर्व छठ के मौके पर। यहां कई इलाकों में मुस्लिम परिवार भी छठ को पूरी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। यह परंपरा नई नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही है। आज बात भागलपुर और समस्तीपुर के कुछ मुस्लिम परिवारों की, जिन्होंने मन्नतें पूरी होने की उम्मीद में छठ का व्रत शुरू किया।

बेटे के लिए शुरू किया छठ, पति की आमदनी भी बढ़ी

भागलपुर के रंगड़ा गांव की 42 वर्षीय सितारा खातून की चार बेटियां हैं। चाहती थीं एक बेटा हो जाए। 2018 के आखिरी महीनों में वो गर्भवती हुईं। जब एक महीना बीत गया तो किसी के कहने पर छठ मइया से बेटे की मन्नत मांगी। बेटा हुआ, उसका नाम रखा मासूम रजा। अब वो डेढ़ साल का है। सितारा खातून बताती हैं कि छठ मइया ने चार बेटियों पर एक बेटा दिया है, अब जिंदगी भर छठ रखूंगी। बेटे के जन्म के साथ ही पति की आमदनी भी बढ़ गई। पहले टैम्पो चलाते थे, अब साथ-साथ दुकान भी चल रही हैं।

नातिन का टाइफाइड ठीक हुआ, इसलिए सलीमा खातून छठ करती हैं

इसी गांव की सलीमा खातून की 18 वर्षीय नातिन रोहिना खातून को टाइफाइड हो गया था। काफी इलाज करवाने के बाद भी स्वस्थ नहीं हुई तो किसी ने छठ का सूप उठाने की मन्नत मांगने को कहा। उन्होंने ऐसा ही किया। 65 वर्षीय सलीमा खातून कहती हैं कि मन्नत मांगने के बाद रोहिना स्वस्थ हो गई। तब से छठ पर्व मना रही हैं। अब वे पड़ोस के एक परिवार से भी छठ करवा रही हैं। सलीमा खातून के नाती मोहम्मद शाहबाज कहते हैं कि हम चाहे हाथ जोड़ कर मांगें या हाथ खोलकर, मांगना तो एक ही से है, क्योंकि सबका मालिक एक है।

पहले सास करती थी छठ, अब पतोहू निभा रही परंपरा

रुखसाना खातून की सास छठ रखती थीं, अब रुखसाना भी वही परंपरा निभा रही हैं। रुखसाना कहती हैं, ‘मेरे पति बचपन में बीमार रहते थे। किसी के कहने पर सास ने बेटे के स्वस्थ होने के लिए छठ मैया से मन्नत मांगी। बेटे के स्वस्थ होने के बाद से ही वो छठ करती आ रही थीं। अब उम्र काफी हो चुकी है, इसलिए उनकी जगह मैं छठ करती हूं।’

फौजिया खातून 15 सालों तक करती रहीं छठ

समस्तीपुर के सराय रंजन के बथुआ बुजुर्ग में रहने वाली फौजिया खातून ने भी अपनी नातिन के लिए छठ किया था। वह जब ठीक हो गई, तब भी 15 साल तक छठ करती रहीं। फौजिया कहती हैं कि नातिन के बीमार होने पर मन्नत मांगी थी। पड़ोस के हिंदू परिवार में रुपये दे देती थी और वही लोग प्रसाद बनाकर घाट पर ले जाते थे। उनकी पूजा में हमलोग भी शामिल होते थे। कोई रोक-टोक नहीं थी। किसी को इससे दिक्कत नहीं थी कि हम लोग मुस्लिम हैं।

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