भागलपुर जिले में 186 और निगम क्षेत्र के 91 मंदिरों में श्रद्धापूर्वक मां विषहरी का पूजन

आज डलिया चढ़ाने उमड़ेगी भीड़, शाम को निकलेगी बाला-लखेन्द्र की बारात

भागलपुर सहित पूरे अंगक्षेत्र में श्रद्धा व आस्था के साथ लोकपर्व विषहरी पूजा की शुरुआत हो चुकी है। शनिवार देर रात चंपानगर स्थित प्राचीन मां विषहरी मंदिर समेत जिले के 186 और नगर निगम क्षेत्र के 91 मंदिरों में प्रतिमा वेदी पर स्थापित की गई। रविवार सुबह से ही मंदिरों में डलिया चढ़ाने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। वहीं शाम को बैंड-बाजे के साथ बाला लखेन्द्र की बारात निकाली जाएगी और विधिवत विवाह संपन्न होगा।

परंपरागत पूजा-अर्चना और मेला

चंपानगर प्राचीन विषहरी मंदिर के पंडित संतोष झा ने बताया कि शनिवार शाम मंडप पूजन के साथ दो दिवसीय मेला शुरू हो गया।

  • 18 अगस्त को सुहागिनें अपने सुहाग की रक्षा के लिए धूप, दीप व डलिया चढ़ाएंगी।
  • प्राचीन मंदिर की प्रतिमा का विसर्जन 18 अगस्त की रात सेमापुर घाट (चंपानदी) में होगा, जबकि अन्य स्थानों की प्रतिमा का विसर्जन 19 अगस्त को शोभायात्रा के साथ किया जाएगा।

पूजा व्यवस्था की निगरानी के लिए केंद्रीय पूजा समिति के पदाधिकारी क्षेत्र का लगातार भ्रमण कर रहे हैं। कार्यकारी अध्यक्ष प्रदीप कुमार के अनुसार शहर में 91 से अधिक स्थानों पर प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं।

पांच बहनों की प्रतिमा और कथा पर आधारित झांकियां

मंदिर परिसर में विषहरी या मनसा देवी समेत उनकी चार बहनें – मैना, बिहुला, पदमा देवी और भवानी देवी की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। साथ ही बाला-बिहुला विवाह प्रसंग, चांदो सौदागर, नाग-मनियार, धनवंतरी वैद्य, टुन्नी राक्षसी आदि पात्रों की प्रतिमाएं भी आकर्षण का केंद्र हैं।

बिहुला महोत्सव स्थगित

17 अगस्त से प्रस्तावित बिहुला महोत्सव फिलहाल स्थगित कर दिया गया है। समिति की अगली बैठक में नई तिथि तय की जाएगी। इस महोत्सव में देश-विदेश से 50 कलाकारों को भाग लेना था।

विषहरी पूजा की ऐतिहासिक कथा

इतिहासकार राजेंद्र सिंह बताते हैं कि विषहरी पूजा की परंपरा सातवीं सदी से जुड़ी है। कथा के अनुसार चंपा निवासी शिवभक्त चांदो सौदागर ने विषहरी की पूजा से इंकार कर दिया था। इससे क्रोधित होकर विषहरी ने उनके छह पुत्रों को समुद्र में डुबा दिया। बाद में सातवें पुत्र बाला लखेन्द्र की शादी धर्मपरायण बिहुला से हुई। विवाह की रात नाग ने बाला को डस लिया, लेकिन बिहुला ने तपस्या कर पति व ससुराल के सभी मृत पुत्रों को पुनर्जीवित कर दिया। इसके बाद चांदो सौदागर ने विषहरी की पूजा स्वीकार की। तभी से यह परंपरा निरंतर जारी है।

प्रशासनिक तैयारी और सुरक्षा व्यवस्था

विषहरी पूजा व मेला को लेकर प्रशासन ने 276 जगहों पर मजिस्ट्रेट की तैनाती की है। विसर्जन यात्रा को पांच रूटों में विभाजित किया गया है। शहरी क्षेत्र में बरारी स्थित मुसहरी घाट और चंपानाला पुल विसर्जन स्थल बनाए गए हैं।

प्रशासन ने आदेश जारी किया है कि वर्ष 1989 की तरह कोई अप्रिय स्थिति न हो, इसके लिए अफवाहों व सोशल मीडिया पर कड़ी नजर रखी जा रही है। विसर्जन यात्रा को पांच सेक्टरों में एस्कॉर्ट किया जाएगा।


 

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