मिर्जाचौकी: रामायण एक आदर्श परिवार का प्रतीक: बाबा श्री रामदास ने हाजीपुर दियारा में रामकथा के छठे दिन किया भावपूर्ण प्रवचन

भागलपुर/मिर्जाचौकी: हाजीपुर दियारा स्थित श्री रामकृष्ण शिवालय ठाकुरबारी के प्रवचन पंडाल में बाबा श्री रामदास जी ने रामकथा के छठे दिन श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि रामायण एक आदर्श परिवार का प्रेरणादायक उदाहरण है। इसमें मर्यादा, त्याग, कर्तव्य और धर्म के ऐसे मूल्य मिलते हैं, जो हर युग के लिए प्रासंगिक हैं।

उन्होंने भगवान श्रीराम को एक आदर्श राजा और वीर योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया, जिन्होंने न केवल अपनी प्रजा के हित में शासन किया, बल्कि अपने व्यक्तिगत सुखों को भी धर्म के लिए न्योछावर कर दिया। माता सीता को उन्होंने आदर्श पत्नी, आदर्श बहू और मातृत्व का प्रतीक बताया, जिनका त्याग और सहनशीलता सम्पूर्ण नारी समाज के लिए प्रेरणा है।

भरत और लक्ष्मण को आदर्श भाइयों का प्रतीक बताते हुए उन्होंने कहा कि भरत का त्याग और राम के प्रति प्रेम, तथा लक्ष्मण की सेवा और निष्ठा, भाईचारे की सच्ची मिसाल है। हनुमानजी को उन्होंने सच्चे सेवक और भक्त के रूप में याद किया, जिनकी भक्ति और समर्पण अतुलनीय है।

राजा दशरथ को धर्म और पितृ वचन के पालन का प्रतीक बताते हुए उन्होंने उस प्रसंग को याद किया, जब देवासुर संग्राम में लड़ते हुए राजा दशरथ मूर्छित हो गए थे। उस समय माता केकई ने अपनी उंगली को कील की तरह रथ में लगाकर सारथी बनकर राजा की रक्षा की थी। इस अद्भुत त्याग के बदले राजा दशरथ ने उन्हें दो वरदान देने का वचन दिया था।

लेकिन चतुर मंथरा ने अपनी कूटनीति से माता केकई को भ्रमित कर दिया और उन दो वरों के माध्यम से राजा दशरथ से दो मांगें रखवाने के लिए उकसाया। पहला भरत को अयोध्या का राजा बनाना, और दूसरा राम को 14 वर्षों के लिए वनवास भेजना।

पिता के दिए वचन और माता की आज्ञा का पालन करने के लिए राम, सीता और लक्ष्मण वनगमन को तैयार हो गए। मंत्री सुमंत के साथ वे तमसा नदी के किनारे स्थित श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जहाँ निषादराज गुह ने उनका आत्मीय स्वागत किया और रात्री विश्राम की व्यवस्था की।

अगले दिन केवट ने प्रभु राम, सीता और लक्ष्मण को नाव में बैठाकर गंगा पार कराई। इस भावुक दृश्य की एक अत्यंत मनोरम झांकी कलाकारों द्वारा प्रस्तुत की गई, जिसने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।

आगे चलकर वे भरद्वाज ऋषि के आश्रम पहुँचे और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। कथा मंचन के दौरान भगवान शंकर को जल चढ़ाने के लिए पति-पत्नी द्वारा कांवड़ यात्रा की एक भावपूर्ण भावनृत्य प्रस्तुति भी दी गई, जिसने रामकथा की आध्यात्मिकता को और भी सजीव कर दिया।

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