
भागलपुर। अंग प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान मानी जाने वाली मंजूषा कला को नई ऊर्जा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। अब भागलपुर में प्रत्येक माह के पहले रविवार को “मंजूषा कला प्रदर्शनी – मंजूषा हटिया” का आयोजन किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य न केवल इस प्राचीन लोक चित्रकला को संरक्षित और प्रचारित करना है, बल्कि इससे जुड़े कलाकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उनकी कला को व्यापक पहचान दिलाना भी है।
कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार, जिला कला एवं संस्कृति कार्यालय तथा भागलपुर संग्रहालय के संयुक्त प्रयास से शुरू हो रही इस नई सांस्कृतिक श्रृंखला की पहली प्रदर्शनी 7 जून 2026 को भागलपुर संग्रहालय परिसर में आयोजित की जाएगी। सुबह 10:30 बजे से शाम 5 बजे तक चलने वाले इस एक दिवसीय आयोजन में मंजूषा कला से जुड़े कलाकार अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे और आगंतुकों को इस लोक कला की समृद्ध परंपरा से परिचित कराएंगे।
मंजूषा कला को मिलेगा स्थायी मंच
मंजूषा कला लंबे समय से भागलपुर और अंग क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में इस कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने लगी है, लेकिन कलाकारों को नियमित मंच और बाजार उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता रहा है।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए “मंजूषा हटिया” की अवधारणा तैयार की गई है। इस मंच के माध्यम से कलाकारों को अपनी कलाकृतियों को सीधे लोगों के सामने प्रस्तुत करने और उन्हें बेचने का अवसर मिलेगा। इससे न केवल कलाकारों की आय में वृद्धि होगी बल्कि उनकी कला भी अधिक लोगों तक पहुंच सकेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी लोक कला के संरक्षण के लिए कलाकारों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना आवश्यक होता है। यदि कलाकारों को नियमित आय और पहचान मिलेगी, तभी वे अपनी परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचा पाएंगे।
कला प्रेमियों को मिलेगा कलाकारों से सीधे जुड़ने का अवसर
प्रदर्शनी की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी कि यहां आने वाले लोग कलाकारों से सीधे संवाद कर सकेंगे। आमतौर पर कला प्रदर्शनियों में दर्शक केवल तैयार कलाकृतियों को देखते हैं, लेकिन इस आयोजन में उन्हें कलाकारों के अनुभव, उनकी रचनात्मक प्रक्रिया और कला के पीछे छिपी सांस्कृतिक कहानियों को जानने का भी अवसर मिलेगा।
आयोजकों के अनुसार प्रदर्शनी में कलाकार अपनी हस्तनिर्मित पेंटिंग्स, पारंपरिक डिजाइनों, सजावटी वस्तुओं और मंजूषा शैली पर आधारित विभिन्न उत्पादों का प्रदर्शन करेंगे। आगंतुक बिना किसी मध्यस्थ के सीधे कलाकारों से उनकी कलाकृतियां खरीद सकेंगे।
इस व्यवस्था से कलाकारों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी और खरीदारों को भी कला की वास्तविकता और मौलिकता का भरोसा मिलेगा।
अंग प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान है मंजूषा कला
मंजूषा कला केवल एक चित्रकला शैली नहीं, बल्कि अंग प्रदेश की लोक परंपराओं और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत दस्तावेज मानी जाती है। इसका संबंध प्रसिद्ध बिहुला-विषहरी लोकगाथा से है, जो सदियों से इस क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा रही है।
इस लोककथा में प्रेम, संघर्ष, आस्था और समर्पण की अनेक कहानियां समाहित हैं, जिन्हें मंजूषा कला के माध्यम से चित्रों में उकेरा जाता है। यही कारण है कि इस कला को केवल सजावटी कला नहीं, बल्कि लोक इतिहास और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक माना जाता है।
मंजूषा चित्रों की विशेषता उनकी विशिष्ट रेखांकन शैली, सीमित लेकिन प्रभावशाली रंग संयोजन और प्रतीकात्मक आकृतियां हैं। पारंपरिक रूप से गुलाबी, हरा और पीला जैसे रंगों का प्रयोग इस कला में प्रमुखता से किया जाता रहा है। इसके साथ ही नाग, बिहुला, बाला लखंदर और अन्य लोक पात्रों को विशेष शैली में चित्रित किया जाता है।
नई पीढ़ी को जोड़ने की पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल संस्कृति के प्रभाव के कारण कई पारंपरिक लोक कलाएं धीरे-धीरे युवाओं से दूर होती जा रही हैं। ऐसे में मंजूषा कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की बड़ी आवश्यकता बन गई है।
“मंजूषा हटिया” के माध्यम से युवाओं, विद्यार्थियों और शोधार्थियों को इस कला को करीब से समझने का अवसर मिलेगा। आयोजकों का मानना है कि यदि युवा इस कला से जुड़ते हैं तो इसके संरक्षण और विकास की संभावनाएं और मजबूत होंगी।
विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से जुड़े विद्यार्थियों के लिए भी यह प्रदर्शनी अध्ययन और शोध का महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकती है। यहां उन्हें लोक कला की तकनीक, इतिहास और सांस्कृतिक महत्व को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिलेगा।
कलाकारों के लिए आत्मनिर्भरता का नया रास्ता
कला एवं संस्कृति विभाग का उद्देश्य मंजूषा कला को केवल सांस्कृतिक गतिविधि तक सीमित रखना नहीं है, बल्कि इसे कलाकारों की आजीविका और आत्मनिर्भरता से भी जोड़ना है।
आयोजकों का मानना है कि यदि कलाकारों को नियमित रूप से अपनी कलाकृतियां बेचने का अवसर मिलेगा तो वे आर्थिक रूप से अधिक मजबूत होंगे। इससे युवा कलाकार भी इस क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित होंगे।
वर्तमान समय में हस्तनिर्मित और पारंपरिक उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में मंजूषा कला पर आधारित उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने की भी संभावनाएं हैं। “मंजूषा हटिया” इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सांस्कृतिक बाजार के रूप में विकसित करने की योजना
आयोजकों ने बताया कि भविष्य में इस आयोजन को केवल एक प्रदर्शनी तक सीमित नहीं रखा जाएगा। इसे धीरे-धीरे एक सांस्कृतिक बाजार और लोक कला संवाद मंच के रूप में विकसित करने की योजना है।
इस मंच पर कलाकारों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और कला प्रेमियों के बीच नियमित संवाद स्थापित किया जाएगा। साथ ही विभिन्न कार्यशालाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सांस्कृतिक चर्चाओं का भी आयोजन किया जा सकता है।
इससे भागलपुर को एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने में मदद मिलेगी और स्थानीय लोक कलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सकेगी।
सभी नागरिकों से भागीदारी की अपील
जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने कहा कि विभाग का लक्ष्य मंजूषा कला को समाज, बाजार और युवा पीढ़ी से जोड़ना है ताकि यह कला आने वाले वर्षों में और अधिक मजबूत हो सके। उन्होंने कहा कि इस प्रदर्शनी के माध्यम से कलाकारों को सम्मानजनक पहचान और बेहतर अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
पहली प्रदर्शनी के संयोजक डॉ. उलूपी कुमारी झा और मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित होंगे। आगामी महीनों में अलग-अलग कलाकारों को संयोजक की जिम्मेदारी दी जाएगी ताकि अधिक से अधिक कलाकार इस अभियान का हिस्सा बन सकें।
जिला प्रशासन और कला एवं संस्कृति विभाग ने भागलपुर, आसपास के जिलों, शिक्षण संस्थानों, शोधकर्ताओं, पर्यटकों और कला प्रेमियों से इस आयोजन में भाग लेने की अपील की है। माना जा रहा है कि “मंजूषा हटिया” न केवल कलाकारों को नई पहचान देगी, बल्कि भागलपुर की सांस्कृतिक विरासत को भी देश-दुनिया तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।


