मनीष वर्मा ने फणीश्वरनाथ रेणु के गांव औराही में बिताए पल, कहा – “यह कोई घर नहीं, मेरे लिए तीर्थ है”

पूर्णिया/सिमराहा:

जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय महासचिव मनीष कुमार वर्मा का दिल उस वक्त भावनाओं से भर उठा, जब उन्होंने आंचलिकता के महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के गांव औराही, सिमराहा में उनके परिजनों से मुलाकात की और उस ऐतिहासिक कुटिया में समय बिताया, जहां कभी रेणु जी ने अपनी कालजयी कृतियों की रचना की थी।

मनीष वर्मा ने कहा –

“मैंने रेणु जी को किताबों में पढ़ा था, आज उनकी मिट्टी में सांस लेकर ऐसा लग रहा है जैसे एक तीर्थस्थल पर आ गया हूं। यह घर नहीं, एक जीवंत स्मृति है, एक इतिहास है।”

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रेणुजी के आंगन-दालान में बसी साहित्यिक आत्मा, मनीष वर्मा ने महसूस की जीवंत उपस्थिति

रेणु जी के घर पहुंचने पर उनके ज्येष्ठ पुत्र एवं पूर्व विधायक पदम पराग राय वेणु, अपराजित राय अप्पू, और दक्षिणेश्वर राय पप्पू ने पारंपरिक स्वागत किया। परिजनों ने रेणु जी की कालजयी रचना ‘मैला आंचल’ और दक्षिणेश्वर राय की लिखी ‘रफ्फू वाली साड़ी’ पुस्तक भेंट की।

मनीष वर्मा उस दालान में भी बैठे, जहां बैठकर रेणु जी ने ग्राम्य जीवन, लोक भाषा और मानवीय संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में जगह दी थी। उन्होंने कहा:

“इस आंगन में खड़ा होकर ऐसा लगा जैसे रेणु जी अभी गांव की किसी पगडंडी से लौटकर आने वाले हैं। यहां की हवा, मिट्टी, आकाश – सब कुछ उनके साहित्य की गवाही दे रहा है।”

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“सिर्फ साहित्यकार नहीं, स्वतंत्रता सेनानी भी थे रेणु” – मनीष वर्मा

अपने वक्तव्य में मनीष वर्मा ने कहा कि फणीश्वरनाथ रेणु सिर्फ लेखक नहीं, बल्कि आजादी की लड़ाई के एक मजबूत स्तंभ भी थे। उन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया, नेपाल के लोकतांत्रिक आंदोलन का समर्थन किया और आपातकाल के दौरान पद्मश्री पुरस्कार लौटा कर विरोध का साहसिक उदाहरण पेश किया।

“जब पूरे देश में डर का माहौल था, तब रेणु जी ने साहित्य और लोकतंत्र दोनों की गरिमा बचाने के लिए अपनी सबसे बड़ी पहचान – पद्मश्री – त्याग दी। यह सिर्फ विरोध नहीं, एक युगबोध था।”

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रेणु गांव से मिला आत्मीय सुकून, नीतीश कुमार का जिक्र

मनीष वर्मा ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी जिक्र करते हुए कहा कि:

“युवावस्था में जब नीतीश जी पहली बार रेणु जी से मिले थे, तब उन्होंने अपने सादगी और मूल्यों से उन्हें प्रभावित किया था। नीतीश जी आज भी रेणुजी के विचारों को प्रेरणा मानते हैं।”

उन्होंने कहा कि रेणु का साहित्य सीमांचल की मिट्टी, बोली और जनजीवन का ऐसा चित्रण है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

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रेणु ग्राम – जहां साहित्य, स्वाधीनता और लोक जीवन का इतिहास बसता है

मनीष वर्मा ने कहा:

“रेणु ग्राम का हर कोना – आंगन, दालान, डाकघर, शयन कक्ष – सब कुछ उनके जीवन के अध्यायों को समेटे हुए है। यहीं से उनकी चिट्ठियां निकलती थीं, यहीं कहानियां जन्म लेती थीं और यहीं से एक लेखक, एक सेनानी, एक लोकचिंतक ने देश को नई दिशा दी।”

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