
HIGHLIGHTS: बाईपास इलाके में ‘जुए’ की बड़ी फैक्ट्री बेनकाब
- ज्वाइंट ऑपरेशन: बिहार STF और पटना पुलिस ने पैजावा में गुप्त सूचना पर की बड़ी छापेमारी।
- बड़ी बरामदगी: ₹80 लाख की अवैध लॉटरी और कूपन बरामद; अत्याधुनिक मशीनों से हो रही थी छपाई।
- हड़कंप: पुलिस की दबिश से बिल्डिंग में मची अफरा-तफरी; भागने की कोशिश कर रहे 18 लोग गिरफ्तार।
- मास्टरमाइंड की तलाश: गिरोह के तार अन्य जिलों और राज्यों से जुड़े होने की आशंका; पूछताछ जारी।
पटना | 18 मार्च, 2026
राजधानी पटना के बाईपास थाना क्षेत्र स्थित पैजावा इलाका मंगलवार को उस वक्त ‘एक्शन फिल्म’ के सीन में तब्दील हो गया, जब बिहार एसटीएफ (STF) और स्थानीय पुलिस ने एक सामान्य दिखने वाली बिल्डिंग पर धावा बोल दिया। जिसे बाहर से लोग एक साधारण मकान समझते थे, उसके भीतर ‘करोड़पति’ बनने के फर्जी सपने छापे जा रहे थे। इस छापेमारी ने पटना में चल रहे अवैध लॉटरी के एक बड़े सिंडिकेट की कमर तोड़ दी है।
छापेमारी का ‘फाइल’ रिकॉर्ड: एक नजर में
विवरण | जानकारी |
|---|---|
दिनांक | 17 मार्च 2026 (मंगलवार)। |
स्थान | पैजावा, बाईपास थाना क्षेत्र, पटना सिटी। |
बरामद सामग्री की कीमत | लगभग ₹80,00,000 (अस्सी लाख रुपये)। |
गिरफ्तारी | 18 संदिग्ध (मौके से हिरासत में)। |
जब्त उपकरण | अत्याधुनिक प्रिंटिंग मशीनें, रंगीन स्याही, कागज के बंडल। |
जांच अधिकारी | डॉ. गौरव कुमार, एसडीपीओ-2 पटना सिटी। |
प्रिंटिंग प्रेस की आड़ में ‘धोखाधड़ी’ का खेल
एसडीपीओ-2 डॉ. गौरव कुमार के अनुसार, यह गिरोह काफी संगठित तरीके से काम कर रहा था:
- सीक्रेसी: बिल्डिंग बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखती थी ताकि किसी को शक न हो, लेकिन अंदर बड़े स्तर पर गैरकानूनी गतिविधियां चल रही थीं।
- अत्याधुनिक तकनीक: पुलिस को मौके से ऐसी मशीनें मिली हैं जो पलक झपकते ही हजारों की संख्या में रंगीन लॉटरी और कूपन छाप सकती थीं।
- भागने की नाकाम कोशिश: जैसे ही पुलिस ने घेराबंदी की, गिरोह के गुर्गों ने पीछे के रास्तों से भागने की कोशिश की, लेकिन मुस्तैद जवानों ने 18 लोगों को धर दबोचा।
VOB का नजरिया: क्या ‘सस्ता लालच’ बिहार के युवाओं को बर्बाद कर रहा है?
पटना में ₹80 लाख की लॉटरी पकड़ा जाना यह साबित करता है कि यह कारोबार केवल एक मोहल्ले तक सीमित नहीं है। यह एक ‘जहर’ है जो मेहनत की कमाई को ‘रातों-रात अमीर’ बनने के चक्कर में सोख लेता है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि इस गिरोह के सरगना तक पहुंचना अनिवार्य है, क्योंकि ये कूपन अक्सर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को निशाना बनाकर बाजार में खपाए जाते हैं। पुलिस की यह तत्परता सराहनीय है, लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी प्रिंटिंग मशीनें और शोर स्थानीय निवासियों की नजरों से इतने समय तक कैसे बचा रहा?


