
- बिहार पुलिस की कार्यक्षमता और मारक क्षमता को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में राज्य सरकार ने एक बड़ा कदम उठाते हुए 43.42 करोड़ रुपये के आधुनिक हथियार और गोला-बारूद की खरीद को मंजूरी दी है.
- पुलिस मुख्यालय द्वारा भेजे गए इस प्रस्ताव पर गृह विभाग की मुहर लगने के बाद अब बंगाल और महाराष्ट्र की आयुध फैक्ट्रियों से अत्याधुनिक हथियारों की खेप बिहार पहुँचेगी.
- इस खरीद योजना के तहत विशेष रूप से 4000 नाइन एमएम सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल्स को बेड़े में शामिल किया जाएगा, जिससे पुलिसकर्मियों की व्यक्तिगत सुरक्षा और ऑपरेशनल दक्षता में सुधार होगा.
- हथियारों के साथ-साथ जवानों के कौशल विकास के लिए 1.20 लाख विशेष ‘ब्लैंक गोलियों’ (अभ्यास राउंड्स) की भी खरीद की जा रही है, ताकि प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक परिस्थितियों जैसा अनुभव मिल सके.
- यह निवेश केवल हथियारों की खरीद नहीं, बल्कि बिहार की आंतरिक सुरक्षा को आधुनिक तकनीक के साथ एकीकृत करने और अपराध नियंत्रण की रणनीति को और अधिक आक्रामक बनाने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पटना (द वॉयस ऑफ बिहार)।
सुरक्षा का नया युग: आधुनिक पिस्तौल से लैस होगी बिहार पुलिस
बिहार की सुरक्षा व्यवस्था को तकनीकी और सामरिक रूप से अभेद्य बनाने के लिए बिहार पुलिस मुख्यालय ने एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। राज्य में बढ़ती आपराधिक चुनौतियों और अपराधियों के पास मौजूद आधुनिक हथियारों का मुकाबला करने के लिए अब खाकी भी अपने पुराने तौर-तरीकों और हथियारों को छोड़कर ‘नेक्स्ट जेन’ आर्म्स की ओर बढ़ रही है। गृह विभाग ने पुलिस मुख्यालय के उस प्रस्ताव को अपनी हरी झंडी दे दी है, जिसके तहत 43.42 करोड़ रुपये की लागत से अत्याधुनिक हथियारों और गोला-बारूद का जखीरा खरीदा जाना है। यह फैसला न केवल पुलिस बल के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ी छलांग है, बल्कि यह अपराधियों के मन में खौफ पैदा करने और आम नागरिकों के बीच सुरक्षा का भाव मजबूत करने का एक ठोस प्रयास भी है।
इशापुर राइफल फैक्ट्री का ‘बंगाल कनेक्शन’ और 4000 पिस्तौल का जखीरा
इस पूरी खरीद प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नाइन एमएम (9mm) सेमी-ऑटोमैटिक पिस्टल्स की खरीद है। गृह विभाग के आधिकारिक ब्यौरे के अनुसार, ये हथियार पश्चिम बंगाल स्थित इशापुर की प्रतिष्ठित राइफल फैक्ट्री से खरीदे जाएंगे। इशापुर की फैक्ट्री अपनी उच्च गुणवत्ता वाली पिस्तौल और राइफलों के लिए पूरे देश में जानी जाती है। जानकारी के अनुसार, कुल 4000 सर्विस रिवॉल्वर (पिस्तौल) की खरीद दो चरणों में पूरी की जाएगी।
पहले चरण में 2500 पिस्तौलें बिहार पुलिस के बेड़े में शामिल होंगी, जबकि दूसरे चरण में शेष 1500 पिस्तौलों की आपूर्ति की जाएगी। केवल इन पिस्तौलों की खरीद पर ही सरकार लगभग 42 करोड़ 28 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च करने जा रही है। सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल होने के कारण ये हथियार न केवल वजन में हल्के होंगे, बल्कि इनका ‘मैगजीन लोड’ और ‘फायरिंग रेट’ भी साधारण रिवॉल्वर की तुलना में कहीं अधिक सटीक और तेज होगा। इससे गश्त पर तैनात जवानों और विशेष ऑपरेशनों में शामिल एसटीएफ जैसी इकाइयों को बड़ी बढ़त मिलेगी।
प्रशिक्षण पर जोर: महाराष्ट्र से आएंगी 1.20 लाख ब्लैंक गोलियां
हथियार खरीदना एक पहलू है, लेकिन उन हथियारों को चलाने में जवानों का सटीक और पेशेवर होना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। अक्सर देखा जाता है कि प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक गोलियों का उपयोग महंगा और जोखिम भरा हो सकता है। इसी समस्या के समाधान के लिए बिहार पुलिस ने महाराष्ट्र की दो प्रमुख आयुध फैक्ट्रियों—पुणे की खड़की फैक्ट्री और जलगांव की वरनगांव फैक्ट्री—से संपर्क साधा है।
इन फैक्ट्रियों से विशेष प्रकार की ‘ब्लैंक गोलियां’ (Blank Ammunition) खरीदी जा रही हैं। पुणे की खड़की फैक्ट्री से 7.62 एमएम की 60 हजार ‘ब्लैंड पीकेजी’ गोलियां मंगवाई जा रही हैं, जबकि जलगांव की वरनगांव फैक्ट्री से 5.56 एमएम की 60 हजार ब्लैंक गोलियां आएंगी। इन कुल 1.20 लाख ब्लैंक गोलियों की खरीद पर लगभग एक करोड़ रुपये का बजट खर्च होगा। ब्लैंक गोलियां वे होती हैं जिनमें बारूद तो होता है लेकिन ‘प्रोजेक्टाइल’ या धातु की गोली नहीं होती। इनका उपयोग मुख्य रूप से पुलिसकर्मियों को फायरिंग के दौरान होने वाली आवाज और झटके (Recoil) के अभ्यास के लिए किया जाता है। इससे जवानों में हथियार के प्रति हिचक खत्म होती है और उनकी ‘मसल मेमोरी’ विकसित होती है।
क्यों जरूरी है यह आधुनिकीकरण?
बिहार में जिस तरह से संगठित अपराध और अंतर-जिला गिरोहों का नेटवर्क फैला है, उसे देखते हुए पुलिस का पारंपरिक हथियारों (जैसे पुरानी .303 राइफलें या भारी एसएलआर) पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं रह गया था। आधुनिक अपराधी न केवल तकनीक का सहारा ले रहे हैं, बल्कि उनके पास परिष्कृत हथियार भी मौजूद होते हैं। ऐसे में बिहार पुलिस को मोबाइल, सक्रिय और प्रभावी बनाने के लिए सेमी-ऑटोमैटिक पिस्तौल सबसे उपयुक्त विकल्प हैं। ये पिस्तौलें पुलिसकर्मियों को ‘क्विक रिस्पॉन्स’ की सुविधा देती हैं। विशेष रूप से भीड़भाड़ वाले इलाकों या तंग गलियों में ऑपरेशन के दौरान भारी राइफलों की तुलना में पिस्तौल अधिक कारगर साबित होती है।
बजट और मंजूरी: गृह विभाग की मुहर
43.42 करोड़ रुपये का यह बजट आवंटन यह दर्शाता है कि राज्य सरकार पुलिस सुधारों को लेकर कितनी गंभीर है। गृह विभाग ने प्रस्ताव की समीक्षा के बाद यह पाया कि पुलिस बल की वर्तमान जरूरतों के हिसाब से ये हथियार अनिवार्य हैं। आयुध फैक्ट्रियों से सीधे खरीद होने के कारण इसमें बिचौलियों की कोई भूमिका नहीं होगी और गुणवत्ता के साथ भी कोई समझौता नहीं होगा। सरकारी तिजोरी से खर्च होने वाली यह राशि भविष्य में राज्य की शांति और सुरक्षा के रूप में ‘रिटर्न’ देगी।
भविष्य की पुलिसिंग: तकनीक और प्रशिक्षण का संगम
केवल हथियार और गोलियां खरीद लेना ही काफी नहीं है, बल्कि इनके रख-रखाव और सही उपयोग के लिए एक कड़ा प्रोटोकॉल भी तैयार किया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो नई पिस्तौलों की आपूर्ति के बाद प्रत्येक जवान को विशेष प्रशिक्षण सत्रों से गुजरना होगा, जहाँ वे महाराष्ट्र से आने वाली ब्लैंक गोलियों के जरिए अपनी फायरिंग क्षमता को सुधारेंगे। यह प्रक्रिया बिहार पुलिस को एक ‘अनुशासित और पेशेवर फोर्स’ के रूप में नई पहचान दिलाएगी। जब जवान आत्मविश्वास से लबरेज होकर सड़कों पर उतरेंगे, तो कानून-व्यवस्था का परिदृश्य अपने आप बदलने लगेगा।
सुरक्षित बिहार की दिशा में एक बड़ा निवेश
बिहार पुलिस द्वारा 43 करोड़ रुपये से अधिक के हथियारों की खरीद केवल एक विभागीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह राज्य की जनता के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का प्रमाण है। इशापुर की मारक पिस्तौल और खड़की-वरनगांव की गोलियां जब बिहार के जवानों के हाथों में होंगी, तो अपराधियों के पास भागने का कोई रास्ता नहीं बचेगा। आधुनिकीकरण का यह पहिया अब थमने वाला नहीं है। प्रशिक्षण, तकनीक और आधुनिक शस्त्रागार का यह त्रिकोण बिहार को अपराध मुक्त बनाने के संकल्प को सिद्ध करेगा।


