
मुख्य बिंदु:
- बड़ी कार्रवाई: राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने शाहकुंड की सीओ डॉ. हर्षा कोमल को तत्काल प्रभाव से किया निलंबित।
- गंभीर आरोप: मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ में व्यवधान डालने और विभागीय मंत्री के कार्यक्रमों का अनादर करने का दोष।
- वित्तीय विफलता: ₹226.38 लाख के राजस्व लक्ष्य के मुकाबले मात्र ₹53.36 लाख की वसूली, सरकारी खजाने को नुकसान।
- न्यायिक अवहेलना: पटना उच्च न्यायालय के अतिक्रमण हटाने के आदेशों का अनुपालन न करना पड़ा भारी।
- नया ठिकाना: निलंबन अवधि के दौरान पूर्णिया प्रमंडलीय आयुक्त कार्यालय होगा मुख्यालय; केवल जीवन निर्वाह भत्ता होगा देय।
भागलपुर। बिहार के प्रशासनिक गलियारों में सुशासन की हनक और जवाबदेही का डंडा एक बार फिर पूरी मजबूती से चला है। भ्रष्टाचार और कार्य के प्रति लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ राज्य सरकार के ‘जीरो टॉलरेंस’ अभियान के तहत शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को भागलपुर जिले के शाहकुंड अंचल की अंचलाधिकारी (सीओ) डॉ. हर्षा कोमल पर बड़ी गाज गिरी है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबन का यह आदेश केवल एक आधिकारिक पत्र नहीं है, बल्कि उन तमाम अधिकारियों के लिए चेतावनी है जो जनहित के कार्यों और सरकार के प्राथमिकता वाले कार्यक्रमों को अपनी व्यक्तिगत सनक या सुस्ती की भेंट चढ़ा देते हैं। डॉ. हर्षा पर लगे आरोप इतने संगीन और विविध हैं कि इसने न केवल जिले की प्रशासनिक छवि को धूमिल किया, बल्कि राज्य के वित्तीय प्रबंधन और न्यायिक व्यवस्था को भी चुनौती दी।
मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ और प्रोटोकॉल का उल्लंघन
किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री का जिला दौरा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि विकास कार्यों की समीक्षा और जनता से जुड़ाव का सबसे बड़ा प्रशासनिक उपक्रम होता है। डॉ. हर्षा कोमल पर सबसे गंभीर आरोप मुख्यमंत्री की ‘समृद्धि यात्रा’ के दौरान व्यवधान पैदा करने का लगा है। अंचलाधिकारी के रूप में उनके क्षेत्र में मुख्यमंत्री का आगमन होना था, जहाँ प्रोटोकॉल के तहत बुनियादी व्यवस्थाएं और भूमि संबंधी डेटा तैयार रखना उनकी जिम्मेदारी थी।
विभागीय जांच में पाया गया कि उन्होंने न केवल तैयारियों में कोताही बरती, बल्कि जानबूझकर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कीं जिससे सरकार के इस महत्वपूर्ण विजन में अवरोध पैदा हुआ। किसी राजपत्रित अधिकारी द्वारा राज्य के मुखिया के कार्यक्रम के प्रति ऐसी संवेदनहीनता को प्रशासनिक शब्दावली में ‘घोर अनुशासनहीनता’ माना गया है।
विभागीय मंत्री का अनादर और ‘जनसंवाद’ से दूरी
बिहार के उप-मुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री इन दिनों राज्यभर में ‘भूमि सुधार जनकल्याण संवाद’ के माध्यम से जनता की समस्याओं का ऑन-द-स्पॉट समाधान कर रहे हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य अंचल कार्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार और लेटलतीफी को खत्म करना है। शाहकुंड की सीओ डॉ. हर्षा कोमल न केवल इस विशेष कार्यक्रम से अनुपस्थित रहीं, बल्कि उन्होंने विभागीय मंत्री के निर्देशों का अनादर भी किया।
विभाग के अनुसार, उन्होंने मंत्री के कार्यक्रमों में व्यवधान डालने की कोशिश की और उनके विशेष निर्देशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। जब विभाग के शीर्ष नेतृत्व के आदेशों की ही अवहेलना होने लगे, तो निचले स्तर पर जनता की सुनवाई की उम्मीद करना बेमानी हो जाता है। यही कारण है कि विभाग ने उनके इस व्यवहार को ‘अमर्यादित’ और ‘अवरोधक’ करार दिया है।
राजस्व संग्रहण में ‘फिसड्डी’ प्रदर्शन: राज्य के खजाने पर प्रहार
एक अंचलाधिकारी की सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में से एक होता है राजस्व का संग्रहण। बिहार जैसे राज्य के लिए, जहाँ विकास योजनाएं राजस्व पर निर्भर हैं, वहां वित्तीय लक्ष्यों की प्राप्ति अनिवार्य है। शाहकुंड अंचल के लिए राजस्व संग्रहण का लक्ष्य ₹226.38 लाख निर्धारित किया गया था। यह आंकड़ा अंचल की भौगोलिक स्थिति और संसाधनों के आधार पर तय किया गया था।
हालांकि, डॉ. हर्षा कोमल की कार्यशैली का नतीजा यह रहा कि अंचल केवल ₹53.36 लाख ही वसूल पाया। लक्ष्य के मुकाबले मात्र 23.5% की यह उपलब्धि किसी भी मानक पर ‘शून्य’ मानी जाएगी। विभाग ने स्पष्ट कहा है कि इस लापरवाही के कारण राज्य के वित्तीय प्रबंधन में अवरोध उत्पन्न हुआ। जब एक अधिकारी अपने प्राथमिक कर्तव्य (राजस्व वसूली) में इतनी बुरी तरह विफल होता है, तो वह पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार खो देता है। मार्च 2026 में महालेखाकार (AG) बिहार और विभाग द्वारा जारी स्पष्ट आदेशों की भी उन्होंने परवाह नहीं की, जो उनकी स्वेच्छाचारिता को दर्शाता है।
न्यायालय की अवहेलना: अतिक्रमण हटाने में बरती ढिलाई
डॉ. हर्षा कोमल के निलंबन का एक और बड़ा कारण पटना उच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी है। बिहार में भूमि विवाद और सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण एक बड़ी समस्या है। उच्च न्यायालय ने शाहकुंड क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण स्थलों से अतिक्रमण हटाने का न्यायादेश जारी किया था। अंचलाधिकारी के रूप में डॉ. हर्षा को यह सुनिश्चित करना था कि तय समय सीमा के भीतर अतिक्रमण मुक्त कराया जाए और न्यायालय को रिपोर्ट सौंपी जाए।
परंतु, उन्होंने न्यायालय के आदेशों का अनुपालन नहीं किया। न्यायिक आदेशों की इस अवहेलना ने न केवल प्रशासन को ‘कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट’ (न्यायालय की अवमानना) के मुहाने पर खड़ा कर दिया, बल्कि इससे आम जनता का कानून पर से भरोसा भी कम हुआ। प्रशासन में ऐसी छवि बन गई थी कि वे न्यायिक और प्रशासनिक, दोनों ही आदेशों को चुनौती देने की आदि हो चुकी थीं।
निलंबन के बाद का भविष्य: पूर्णिया में ‘निर्वासन’
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने डॉ. हर्षा कोमल को निलंबित करते हुए उनका मुख्यालय प्रमंडलीय आयुक्त कार्यालय, पूर्णिया निर्धारित किया है। निलंबन की अवधि के दौरान वे भागलपुर या शाहकुंड में नहीं रह सकेंगी। साथ ही, उन्हें इस दौरान कोई वेतन नहीं मिलेगा, बल्कि वे केवल जीवन निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) की हकदार होंगी।
विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनके विरुद्ध एक अलग से विभागीय कार्यवाही (Departmental Inquiry) शुरू करने का आदेश निर्गत किया जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि उनकी मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुई हैं। यदि जांच में आरोप पूरी तरह सिद्ध हो जाते हैं, तो उन्हें अनिवार्य सेवानिवृत्ति या सेवा से बर्खास्तगी जैसी कड़ी सजा का भी सामना करना पड़ सकता है।
प्रशासनिक संदेश: सुशासन बाबू के राज में लापरवाही की जगह नहीं
शाहकुंड सीओ का निलंबन भागलपुर के अन्य अधिकारियों के लिए एक बड़ा सबक है। यह कार्रवाई बताती है कि सरकार अब केवल फाइलों पर काम नहीं देख रही, बल्कि ‘रिजल्ट’ चाहती है। मुख्यमंत्री की यात्रा और उप-मुख्यमंत्री के जनसंवाद कार्यक्रमों को प्राथमिकता न देना किसी भी अधिकारी के करिअर के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।
अक्सर देखा गया है कि अंचल कार्यालयों में सीओ की तानाशाही के कारण आम जनता परेशान रहती है। दाखिल-खारिज से लेकर भूमि मापी तक के कार्यों के लिए लोगों को महीनों चक्कर काटने पड़ते हैं। डॉ. हर्षा कोमल पर लगे आरोपों की फेहरिस्त यह संकेत देती है कि शाहकुंड में प्रशासनिक मशीनरी लगभग ठप पड़ चुकी थी। अब उनके निलंबन के बाद शाहकुंड अंचल में नए अधिकारी की तैनाती की जाएगी, जिससे उम्मीद है कि लंबित राजस्व वसूली और अतिक्रमण हटाने के कार्यों में तेजी आएगी।
जवाबदेही की नई कसौटी
डॉ. हर्षा कोमल का निलंबन सुशासन के उस संकल्प की पुष्टि करता है जहाँ पद के साथ जवाबदेही भी जुड़ी होती है। वित्तीय कुप्रबंधन, न्यायिक अवमानना और सरकारी प्रोटोकॉल का उल्लंघन—ये तीन ऐसे स्तंभ हैं जिन पर किसी भी अधिकारी का निलंबन अनिवार्य हो जाता है।


