​दाखिल-खारिज में अंचल अधिकारियों की मनमानी पर ‘कानूनी ब्रेक’: विजय सिन्हा ने ‘सक्षम न्यायालय’ और ‘लंबित’ को किया परिभाषित, अब बिना स्टे ऑर्डर नहीं रुकेंगे म्यूटेशन के मामले

पटना। बिहार में जमीन की रजिस्ट्री के बाद सबसे बड़ी जद्दोजहद ‘दाखिल-खारिज’ (म्यूटेशन) को लेकर होती है। अंचल कार्यालयों में महीनों तक फाइलों का धूल फांकना और अधिकारियों द्वारा ‘मामला कोर्ट में है’ या ‘आपत्ति दर्ज है’ जैसे जुमलों का इस्तेमाल कर काम अटकाना अब गुजरे जमाने की बात होने वाली है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए उन कानूनी पेचीदगियों को सुलझा दिया है, जिनकी आड़ लेकर अब तक दाखिल-खारिज के आवेदनों को बेवजह लंबित रखा जाता था। उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने शुक्रवार को स्पष्ट कर दिया कि अब ‘बहानेबाजी’ का दौर खत्म हो चुका है। विभाग ने “सक्षम न्यायालय” और “लंबित” शब्द की ऐसी अचूक परिभाषा तय की है, जिससे न केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी, बल्कि असली खरीदारों को समय पर मालिकाना हक मिल सकेगा। 3 अप्रैल 2026 की यह घोषणा बिहार के राजस्व प्रशासन में पारदर्शिता के एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है।

2011 के अधिनियम की व्याख्या का अंत: जब ‘शब्द’ बने थे बाधा

​बिहार भूमि दाखिल-खारिज अधिनियम, 2011 की धारा 6(12) में एक वाक्यांश का प्रयोग किया गया था—”सक्षम न्यायालय में लंबित”। पिछले डेढ़ दशक से इसी वाक्यांश की अलग-अलग अंचलों में अधिकारियों ने अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या की। किसी ने सामान्य आवेदन को ‘लंबित’ मान लिया, तो किसी ने अंचल अधिकारी (CO) के पास पड़ी एक साधारण सी आपत्ति को ‘न्यायालय की प्रक्रिया’ बताकर म्यूटेशन रोक दिया। विजय सिन्हा ने इस समस्या की जड़ पर प्रहार करते हुए कहा कि शब्दों की इसी अस्पष्टता के कारण राज्य भर में लाखों आवेदन धूल फांक रहे थे।

​विभाग द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब कोई भी राजस्व अधिकारी अपनी मर्जी से किसी मामले को ‘कोर्ट में लंबित’ बताकर ठंडे बस्ते में नहीं डाल सकेगा। इसके लिए बकायदा एक मानक तय कर दिया गया है जिसे हर हाल में मानना अनिवार्य होगा।

किसे माना जाएगा ‘सक्षम न्यायालय’? (पूरी सूची)

​अक्सर अंचल कार्यालयों में यह भ्रम फैलाया जाता था कि किसी भी दफ्तर में दी गई अर्जी ‘सक्षम न्यायालय’ की कार्रवाई है। विजय सिन्हा ने इसे पूरी तरह साफ कर दिया है। अब “सक्षम न्यायालय” की श्रेणी में केवल निम्नलिखित को ही रखा गया है:

  1. न्यायिक संस्थाएं: दिवानी या व्यवहार न्यायालय (Civil Court), पटना उच्च न्यायालय और देश का सर्वोच्च न्यायालय।
  2. राजस्व विभाग के न्यायालय: डीसीएलआर (DCLR), एडीएम (ADM), जिलाधिकारी (DM) और प्रमंडलीय आयुक्त (Commissioner) का कोर्ट।
  3. विशेष अधिकरण: बिहार भूमि न्यायाधिकरण (BLT) और विधि विभाग द्वारा विशेष रूप से अधिकृत किए गए न्यायालय।

​इसके अलावा किसी भी अन्य संस्था या व्यक्ति के पास दिया गया आवेदन ‘सक्षम न्यायालय’ के दायरे में नहीं आएगा। यह स्पष्टीकरण उन बिचौलियों और दबंगों के लिए बड़ा झटका है जो किसी भी दफ्तर में एक शिकायती पत्र भेजकर म्यूटेशन रुकवा देते थे।

‘लंबित’ का मतलब अब केवल ‘स्टे ऑर्डर’ होगा

​इस नीतिगत बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा “लंबित” (Pending) शब्द की परिभाषा है। विजय सिन्हा ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि केवल किसी आवेदन, आपत्ति या अभ्यावेदन (Representation) का दायर होना यह साबित नहीं करता कि मामला “सक्षम न्यायालय में लंबित” है।

​अब “लंबित” केवल उसी वाद को माना जाएगा जिसमें:

  • ​मामला विधिवत दायर होकर न्यायालय की प्रक्रिया में हो।
  • ​न्यायालय द्वारा उस पर संज्ञान (Cognizance) लिया गया हो।
  • ​कोर्ट की ओर से विपक्षी को नोटिस निर्गत किया गया हो।
  • ​सबसे महत्वपूर्ण—न्यायालय द्वारा स्पष्ट रूप से स्थगन आदेश (Stay Order), अंतरिम आदेश, अस्थायी या स्थायी निषेधाज्ञा अथवा ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया गया हो।

​यदि किसी मामले में सक्षम न्यायालय का स्पष्ट ‘स्टे ऑर्डर’ नहीं है, तो राजस्व अधिकारी को नियमानुसार दाखिल-खारिज की प्रक्रिया जारी रखनी होगी। वह केवल इस आधार पर मामला नहीं रोक सकता कि किसी पक्ष ने कोर्ट में अर्जी दी है।

वास्तविक खरीदारों को राहत: भ्रष्टाचार की जड़ों पर चोट (विशेष विश्लेषण)

​द वॉयस ऑफ बिहार के विशेष विश्लेषण के अनुसार, बिहार में भूमि विवादों का एक बड़ा कारण म्यूटेशन में होने वाली देरी है। जमीन माफिया अक्सर किसी विवादित दावे के नाम पर म्यूटेशन रुकवा देते हैं और फिर असली खरीदार से मोटी रकम की मांग करते हैं। अंचल अधिकारी भी अक्सर इस ‘लूपहोल’ का फायदा उठाकर फाइलों को दबाए रखते थे।

  1. पारदर्शिता का उदय: नए नियमों के बाद अब अंचल अधिकारियों की विवेकाधीन शक्तियां (Discretionary Powers) कम हो जाएंगी। उन्हें पोर्टल पर यह स्पष्ट करना होगा कि अगर वे मामला लंबित रख रहे हैं, तो क्या उनके पास न्यायालय का अधिकृत ‘स्टे ऑर्डर’ मौजूद है।
  2. अभिप्रमाणित प्रति की अनिवार्यता: विजय सिन्हा ने निर्देश दिया है कि यदि दायर वाद की अभिप्रमाणित प्रति में स्पष्ट रूप से ‘स्वीकारण’ (Admission) अंकित नहीं है, तो उसे ‘लंबित’ नहीं माना जाएगा। यह फर्जी मुकदमों के डर से म्यूटेशन रोकने की परंपरा को खत्म करेगा।
  3. समयबद्ध निष्पादन: सरकार का लक्ष्य अब समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित करना है। जब ‘लंबित’ की परिभाषा संकुचित और स्पष्ट हो गई है, तो म्यूटेशन की रफ्तार स्वतः बढ़ जाएगी।

राजस्व अधिकारियों को सख्त निर्देश: कोताही पर होगी कार्रवाई

​विजय सिन्हा ने राज्य के सभी अंचल अधिकारियों (CO) और राजस्व कर्मचारियों को चेतावनी देते हुए कहा है कि सरकार की प्राथमिकता आम जनता और वास्तविक क्रेताओं को अनावश्यक परेशानी से बचाना है। उन्होंने निर्देश दिया है कि नए दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन हो। यदि कोई अधिकारी बिना किसी ठोस न्यायिक आदेश के दाखिल-खारिज रोकता है, तो इसे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का संकेत माना जाएगा और संबंधित अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई की जाएगी।

​राजस्व प्रशासन में जवाबदेही तय करने के लिए अब म्यूटेशन के अस्वीकृत (Reject) होने वाले मामलों की भी उच्च स्तरीय समीक्षा की जाएगी। अधिकारियों को अब पोर्टल पर ‘लंबित’ दिखाने के लिए संबंधित न्यायालय के आदेश की कॉपी अपलोड करनी पड़ सकती है, जिससे पूरी प्रक्रिया में ‘डिजिटल ऑडिट’ संभव हो सकेगा।

संतुलित नजरिया: चुनौतियां और भविष्य की राह

​निश्चित रूप से, विजय सिन्हा की यह पहल सराहनीय है और इससे लाखों लोगों को राहत मिलेगी। हालांकि, इसके क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियां भी हैं। बिहार में भूमि अभिलेखों का डिजिटलीकरण अभी भी पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं है। कई पुराने मामलों में कागजात गायब हैं। ऐसे में ‘स्टे ऑर्डर’ की अनिवार्यता कभी-कभी उन गरीब पक्षों के लिए भारी पड़ सकती है जो समय पर कोर्ट से आदेश नहीं ला पाते, जबकि उनकी जमीन पर गलत तरीके से म्यूटेशन की कोशिश हो रही हो।

​फिर भी, एक वृहद दृष्टिकोण से देखें तो ‘बहानेबाजी’ को रोकने के लिए यह कड़ाई आवश्यक थी। राजस्व विभाग को चाहिए कि वह अंचल स्तर पर एक ‘कानूनी डेस्क’ बनाए जो यह सत्यापित कर सके कि प्रस्तुत किया गया न्यायिक आदेश असली है या नहीं।

निष्कर्ष: समाधान की दिशा में बड़ा कदम

​विजय कुमार सिन्हा के नेतृत्व में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में अब जमीन का खेल ‘शब्दों की बाजीगरी’ से नहीं, बल्कि ‘कानून की स्पष्टता’ से चलेगा। “सक्षम न्यायालय” और “लंबित” की नई परिभाषा उन लोगों के लिए सुरक्षा कवच है जिन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से जमीन खरीदी है और अब उन्हें म्यूटेशन के लिए बाबुओं के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। 3 अप्रैल की यह प्रेस विज्ञप्ति बिहार के सुशासन के संकल्प को जमीन पर उतारने का एक सशक्त प्रयास है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजस्व अधिकारी इस नई व्यवस्था को कितनी संजीदगी से अपनाते हैं।

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