टोडा जनजाति की भाषा संरक्षण यात्रा: लुप्तप्राय भाषाओं को बचाने की पहल

ऊटी, तमिलनाडु | 12 अगस्त 2025: नीलगिरि पहाड़ियों के शांत वातावरण में बसी 66 वर्षीय कुर्ताज़ वसमल्लि अपने गांव की सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के मिशन पर हैं। टोडा जनजाति की सदस्य वसमल्लि का मानना है कि उनके कुलदेवता की आशीष तभी मिलती है जब लोग प्रकृति की रक्षा करें। उनका गांव एक ऐसे मंदिर का घर है, जहां मूर्ति पूजा नहीं होती, बल्कि दैवी शक्ति को प्रकृति के माध्यम से महसूस किया जाता है।


टोडा जनजाति और उनकी सांस्कृतिक विरासत

  • चाय और कॉफी के बागानों के लिए मशहूर नीलगिरि पहाड़ियों को टोडा जनजाति पवित्र मानती है।
  • यह जनजाति हज़ारों सालों से यहां रह रही है और उनका मानना है कि उनके देवी-देवता कभी उनके बीच ही रहते थे।
  • टोडा भाषा एक लुप्तप्राय प्रोटो-दक्षिण-द्रविड़ भाषा है, जो किसी भी मुख्य लिपि के बिना पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से संरक्षित रही है।

भाषा संरक्षण में एसपीपीईएल की भूमिका

भारत सरकार के केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (सीआईआईएल) की लुप्तप्राय भाषाओं की सुरक्षा एवं संरक्षण योजना (एसपीपीईएल) टोडा जैसी भाषाओं के दस्तावेजीकरण पर काम कर रही है।
मुख्य कार्य:

  • शब्दकोश, व्याकरण और चित्रात्मक शब्दावलियों का निर्माण।
  • ऑडियो-विजुअल रिकॉर्डिंग और डिजिटल पुरालेखन।
  • समुदाय-आधारित प्राइमर पुस्तकों का प्रकाशन।

एसपीपीईएल ने अब तक 117 लुप्तप्राय भाषाओं की पहचान की है और लक्ष्य 500 भाषाओं का दस्तावेजीकरण करना है।


प्रौद्योगिकी और एआई की मदद

  • उच्च-स्तरीय ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग उपकरण
  • भाषाई विश्लेषण सॉफ़्टवेयर
  • डिजिटल रिपॉजिटरी “संचिका” (https://sanchika.ciil.org/home) – जहां शब्दों के ऑडियो नमूने और भाषा दस्तावेज़ उपलब्ध हैं।
  • एआई-आधारित अनुवाद टूल, जो हिंदी/अंग्रेजी और आदिवासी भाषाओं के बीच अनुवाद में मदद करेंगे।

वैश्विक संदर्भ और संयुक्त राष्ट्र की पहल

  • यूनेस्को के अनुसार दुनिया की 7,000 भाषाओं में से आधी लुप्तप्राय हैं।
  • 2022-2032 को अंतर्राष्ट्रीय स्वदेशी भाषा दशक घोषित किया गया है।
  • 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है — इस वर्ष का विषय था “स्वदेशी लोग और एआई”

भारत की भाषाई विविधता

  • 2011 की जनगणना: 2,843 मातृभाषाएँ दर्ज।
  • 10,000 से कम बोलने वालों वाली भाषाएँ “लुप्तप्राय” मानी जाती हैं।
  • भाषा परिवार: इंडो-यूरोपीय (76.89%), द्रविड़ (20.82%), ऑस्ट्रो-एशियाटिक (1.11%), तिब्बती-बर्मी (1%), सेमिटो-हैमिटिक (0.01%)।

चुनौतियाँ और उम्मीदें

टोडा युवाओं में अपनी भाषा और संस्कृति को जानने की रुचि बढ़ रही है, लेकिन प्रमुख भाषाओं का दबदबा चिंता का विषय है।
वासमल्लि का मानना है —

“हमें ऐसे हालात बनाने होंगे, जो युवाओं को अपनी जड़ों की ओर लौटाएँ और साथ ही उन्हें बाहरी दुनिया से जोड़ें।”


टोडा जनजाति की कहानी केवल एक भाषा को बचाने की नहीं, बल्कि संपूर्ण सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने का प्रयास है।

सरकार, तकनीकी संस्थान और समुदाय — सभी मिलकर यदि कदम बढ़ाएँ, तो लुप्तप्राय भाषाएँ भविष्य में भी जीवित रह सकती हैं।


 

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