
भागलपुर। विश्व मजदूर दिवस, जिसे हर वर्ष 1 मई को मनाया जाता है, श्रमिकों के अधिकारों, उनके योगदान और सम्मान को समर्पित होता है। यह दिन दुनिया भर में कामगार वर्ग की एकता और संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। भारत में भी इस अवसर पर अधिकांश सरकारी कार्यालयों, निजी संस्थानों और कंपनियों में अवकाश रहता है। कर्मचारी इस दिन आराम करते हैं और श्रमिकों के अधिकारों पर चर्चा होती है।
लेकिन इस पूरे परिदृश्य में एक ऐसा वर्ग है, जिसकी भूमिका समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, फिर भी उसे इस दिन भी काम करना पड़ता है—यह वर्ग है आंगनबाड़ी कर्मियों का। भागलपुर सहित पूरे बिहार में आंगनबाड़ी केंद्र मजदूर दिवस के दिन भी खुले रहते हैं, और सेविकाएं तथा सहायिकाएं अपने दैनिक कार्यों में जुटी रहती हैं।
जमीनी स्तर की रीढ़ हैं आंगनबाड़ी कर्मी
आंगनबाड़ी केंद्र समाज के सबसे निचले स्तर तक सरकारी योजनाओं को पहुंचाने का काम करते हैं। बच्चों के पोषण, गर्भवती महिलाओं की देखभाल, टीकाकरण जागरूकता और प्रारंभिक शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां इन्हीं केंद्रों के माध्यम से निभाई जाती हैं।
इन केंद्रों में काम करने वाली सेविकाएं और सहायिकाएं ग्रामीण और शहरी गरीब तबकों तक सेवाएं पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। वे घर-घर जाकर बच्चों और महिलाओं की स्थिति का आकलन करती हैं और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने में मदद करती हैं।
मानदेय कम, जिम्मेदारी अधिक
आंगनबाड़ी सेविकाओं को लगभग 9,000 रुपये प्रतिमाह और सहायिकाओं को करीब 4,500 रुपये मानदेय मिलता है। यह राशि उनके कार्यभार और जिम्मेदारियों के मुकाबले बेहद कम मानी जाती है।
इसके बावजूद उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे पूरी निष्ठा के साथ अपने कार्यों का निर्वहन करें, चाहे वह पोषण वितरण हो, स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता अभियान हो या फिर सरकारी सर्वेक्षण का काम।
मजदूर दिवस पर भी काम, क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि जब मजदूर दिवस पर बड़े वेतन पाने वाले कर्मचारी अवकाश का लाभ उठाते हैं, तो फिर आंगनबाड़ी कर्मियों को यह सुविधा क्यों नहीं मिलती?
विडंबना यह है कि एक ही विभाग—आईसीडीएस (इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज)—के अंतर्गत काम करने वाले अधिकारी, जैसे निदेशक, डीपीओ, सीडीपीओ और पर्यवेक्षिका, इस दिन अवकाश पर रहते हैं। वहीं उन्हीं के अधीन कार्य करने वाली सेविकाएं और सहायिकाएं अपने केंद्रों पर काम करती रहती हैं।
यह स्थिति न केवल विरोधाभासी है, बल्कि यह व्यवस्था की असमानता को भी उजागर करती है।
क्या ये मजदूर नहीं हैं?
यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या आंगनबाड़ी कर्मियों को “मजदूर” की श्रेणी में नहीं माना जाता?
यदि मजदूर की परिभाषा उस व्यक्ति से जुड़ी है जो श्रम करता है, समाज के लिए काम करता है और कम वेतन में अधिक जिम्मेदारी निभाता है, तो आंगनबाड़ी कर्मी इस परिभाषा में पूरी तरह फिट बैठते हैं।
फिर भी उन्हें वह सम्मान और अधिकार नहीं मिल पाता, जो अन्य कर्मचारियों को प्राप्त होता है।
सामाजिक न्याय पर सवाल
मजदूर दिवस का उद्देश्य केवल छुट्टी देना नहीं, बल्कि श्रमिकों के योगदान को पहचानना और उनके अधिकारों की रक्षा करना है।
ऐसे में आंगनबाड़ी कर्मियों के साथ हो रहा यह व्यवहार सामाजिक न्याय के सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यह दर्शाता है कि समाज में श्रम का मूल्यांकन समान रूप से नहीं किया जा रहा है।
मनोबल पर पड़ता है असर
जब किसी वर्ग को लगातार नजरअंदाज किया जाता है, तो उसका मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है। आंगनबाड़ी कर्मियों के साथ भी यही हो रहा है।
कम मानदेय, अधिक कार्यभार और अधिकारों की कमी के कारण उनमें असंतोष बढ़ता है, जो अंततः उनके काम की गुणवत्ता पर भी असर डाल सकता है।
सुधार की जरूरत
इस स्थिति को सुधारने के लिए सरकार और संबंधित विभागों को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
आंगनबाड़ी कर्मियों को उचित मानदेय, सामाजिक सुरक्षा और सम्मान देने के साथ-साथ उन्हें मजदूर दिवस जैसे अवसरों पर अवकाश देने पर भी विचार किया जाना चाहिए।
इसके अलावा, उनके कार्यों को नियमित कर्मचारी के रूप में मान्यता देने की दिशा में भी कदम उठाए जा सकते हैं।
समाज की जिम्मेदारी भी जरूरी
केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज को भी इस मुद्दे को समझने और उठाने की जरूरत है।
आंगनबाड़ी कर्मियों का काम सीधे तौर पर समाज के कमजोर वर्गों से जुड़ा होता है। इसलिए उनके अधिकारों और सम्मान के लिए आवाज उठाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
मजदूर दिवस केवल एक प्रतीकात्मक दिन नहीं, बल्कि यह श्रमिकों के सम्मान और अधिकारों का प्रतीक है।
यदि इस दिन भी आंगनबाड़ी कर्मियों को काम करना पड़ता है और उन्हें मजदूर के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तो यह इस दिन की मूल भावना के साथ अन्याय है।
समय आ गया है कि इस असमानता को खत्म किया जाए और आंगनबाड़ी कर्मियों को भी वह सम्मान और अधिकार दिया जाए, जिसके वे हकदार हैं। तभी मजदूर दिवस की वास्तविक सार्थकता पूरी तरह सिद्ध हो सकेगी।


