खबर के मुख्य बिंदु:
- बड़ी कार्रवाई: किशनगंज के पूर्व डीपीओ राजेश कुमार सिन्हा पर भ्रष्टाचार की गाज गिरी।
- घोटाले का आकार: जांच में 40 करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय अनियमितता साबित हुई।
- कड़ा दंड: राज्य सरकार ने रिटायरमेंट के बाद उनकी पेंशन में ताउम्र 25% कटौती का दिया आदेश।
- विभागीय मुहर: शिक्षा विभाग ने जांच रिपोर्ट के आधार पर आधिकारिक संकल्प जारी किया।
किशनगंज: बिहार के शिक्षा विभाग में भ्रष्टाचार के एक बड़े खेल का पर्दाफाश हुआ है। किशनगंज जिले के पूर्व जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (DPO) राजेश कुमार सिन्हा द्वारा सरकारी राशि के दुरुपयोग का मामला अब पूरी तरह प्रमाणित हो गया है। विभागीय जांच में यह साफ हो गया है कि साहब ने पद पर रहते हुए जनता की गाढ़ी कमाई के 40 करोड़ रुपये से अधिक का वारा-न्यारा कर दिया था। अब सरकार ने उनके रिटायरमेंट के सुकून पर ‘पेन’ चला दिया है।
40 करोड़ का ‘खेल’ और लंबी जांच
शिक्षा विभाग में करोड़ों की बंदरबांट की खबरें अक्सर आती रही हैं, लेकिन राजेश कुमार सिन्हा का मामला आंकड़ों के लिहाज से काफी बड़ा था।
- वित्तीय अनियमितता: उन पर आरोप था कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर करीब 40 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का दुरुपयोग किया।
- प्रमाणित हुए आरोप: लंबे समय तक चली विभागीय जांच में उनके खिलाफ लगे सभी आरोप सही पाए गए। साक्ष्यों और दस्तावेजों ने यह साबित कर दिया कि राशि का आवंटन और खर्च संदिग्ध था।
- सरकार का कड़ा रुख: नीतीश सरकार की भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत, रिटायर हो चुके सिन्हा की पेंशन पर स्थायी रूप से कैंची चला दी गई है।
त्वरित अवलोकन (Quick Facts)
- दोषी पदाधिकारी: राजेश कुमार सिन्हा (पूर्व डीपीओ, किशनगंज)।
- घोटाले की राशि: ₹40 करोड़ से अधिक।
- विभाग: शिक्षा विभाग, बिहार सरकार।
- सजा: आजीवन पेंशन में 25 प्रतिशत की कटौती।
- वर्तमान स्थिति: विभागीय संकल्प (Resolution) जारी कर कार्रवाई प्रभावी कर दी गई है।
VOB का नजरिया: क्या पेंशन काटना काफी है?
शिक्षा विभाग, जहाँ से प्रदेश का भविष्य गढ़ा जाता है, वहाँ 40 करोड़ का घोटाला होना व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। हालांकि, पेंशन में 25% की कटौती एक कड़ा प्रशासनिक कदम है, लेकिन जनता के मन में यह सवाल जरूर है कि क्या इतने बड़े गबन के लिए केवल पेंशन की आंशिक कटौती काफी है? क्या डूबी हुई रकम की वसूली की जाएगी? भ्रष्टाचार के ऐसे मामलों में ‘आर्थिक दंड’ के साथ-साथ ‘आपराधिक जिम्मेदारी’ तय होना भी जरूरी है ताकि अन्य अधिकारियों के लिए यह एक बड़ी चेतावनी बन सके।


