पटना/मसौढ़ी, बिहार: लोक आस्था का महापर्व चैती छठ 2026 का चार दिवसीय अनुष्ठान नहाय-खाय के साथ शुरू हो चुका है और आज इसका दूसरा दिन ‘खरना’ मनाया जा रहा है। व्रती सुबह से ही स्नान-ध्यान कर महाप्रसाद बनाने में जुटे हैं। छठ पर्व सूर्य उपासना और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है, जिसमें सूर्य भगवान और छठी मइया की पूजा की जाती है।
छठ में बांस का विशेष महत्व
छठ पूजा को शुद्धता का पर्व माना जाता है, इसलिए इसमें प्रकृति से जुड़ी वस्तुओं का ही उपयोग किया जाता है। बांस से बनी टोकरी, सूप और दउरा इस पर्व का अहम हिस्सा हैं। मसौढ़ी बाजार में इनकी खरीदारी के लिए सुबह से ही भारी भीड़ देखी जा रही है।
वंश वृद्धि और समृद्धि का प्रतीक
मसौढ़ी स्थित श्रीराम जानकी ठाकुरवाड़ी मंदिर के मुख्य पुजारी आचार्य गोपाल पांडे के अनुसार, हिंदू धर्म में बांस को वंश से जोड़ा जाता है। जिस तरह बांस तेजी से बढ़ता है, उसी तरह वंश वृद्धि और समृद्धि की कामना की जाती है। छठ पूजा में सूप और दउरा का उपयोग इसी प्रतीकात्मक महत्व के कारण किया जाता है।
सूप-दउरा से ही अर्घ्य देने की परंपरा
छठ पूजा में बांस से बने सूप में पूजन सामग्री रखकर सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है, जबकि टोकरी (दउरा) में प्रसाद और फल रखकर घाट तक ले जाया जाता है। इस पर्व में प्लास्टिक या धातु के बर्तनों का उपयोग नहीं किया जाता, क्योंकि बांस पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल और शुद्ध माना जाता है।
वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व
आचार्य विश्वरंजन के अनुसार, छठ की हर परंपरा के पीछे एक कारण है। बांस में एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं, जिससे प्रसाद लंबे समय तक सुरक्षित और ताजा रहता है। यही वजह है कि आधुनिक साधनों के बावजूद व्रती बांस के सूप और दउरा का ही उपयोग करते हैं।
बाजारों में रौनक, व्रतियों में उत्साह
खरना के मौके पर मसौढ़ी सहित आसपास के बाजार सूप और टोकरी से सज गए हैं। व्रती पारंपरिक नियमों का पालन करते हुए शुद्धता और सात्विकता के साथ इस कठिन व्रत को निभा रहे हैं।
छठ पर्व न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह प्रकृति, पर्यावरण और पारंपरिक जीवनशैली के महत्व को भी दर्शाता है।


