कचरे से कंचन: कटिहार के मनसाही में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन से बदली पर्यावरण और रोजगार की सूरत; लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान का बढ़ा प्रभाव

कटिहार/पटना। बिहार का सीमांचल क्षेत्र, जो अपनी भौगोलिक चुनौतियों और हर साल आने वाली बाढ़ की विभीषिका के लिए जाना जाता है, अब विकास और स्वच्छता के एक नए प्रतिमान के रूप में उभर रहा है। कटिहार जिले का मनसाही प्रखंड आज पूरे प्रदेश के लिए ‘अपशिष्ट से आय’ (वेस्ट-टू-वेल्थ) का एक जीवंत उदाहरण बन गया है। लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान और स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के संयुक्त प्रयासों से यहाँ स्थापित प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई ने न केवल पर्यावरण की सुरक्षा की दिशा में बड़े कदम उठाए हैं, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं। शनिवार, 25 अप्रैल 2026 को प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह इकाई अब एक ऐसे केंद्र के रूप में कार्य कर रही है जहाँ हानिकारक प्लास्टिक कचरे को उपयोगी कच्चे माल में बदलकर विकास की नई इबारत लिखी जा रही है। मनसाही का यह सफल प्रयोग यह सिद्ध करता है कि यदि प्रशासनिक तत्परता और सामुदायिक भागीदारी का सही मेल हो, तो पर्यावरण के लिए संकट बना कचरा भी आर्थिक समृद्धि का आधार बन सकता है।

बाढ़ प्रभावित क्षेत्र की गंभीर चुनौती: जब प्लास्टिक बना मिट्टी और जल का शत्रु

​कटिहार का मनसाही प्रखंड अपनी विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण बाढ़ और जल-जमाव के प्रति बेहद संवेदनशील रहा है। यहाँ जलाशयों, प्राकृतिक जल स्रोतों और निचले इलाकों की अधिकता है, जहाँ वर्ष के कई महीनों तक पानी भरा रहता है। पारंपरिक रूप से इन जल निकायों और खाली जमीनों पर फेंका जाने वाला प्लास्टिक कचरा एक गंभीर पर्यावरणीय संकट खड़ा कर रहा था। विशेष रूप से बाढ़ग्रस्त इलाका होने के कारण, खेतों में पानी के साथ बहकर आया प्लास्टिक मिट्टी की परतों में दब जाता था, जिससे जमीन की प्राकृतिक सोखने की क्षमता और उर्वरता पर सीधा प्रहार हो रहा था।

​इस कचरे के कारण मुख्य रूप से दो बड़ी समस्याएं उत्पन्न हो रही थीं। पहली, प्लास्टिक की थैलियों और बोतलों के जमाव के कारण गांवों की जल निकासी प्रणाली (नालियां) पूरी तरह अवरुद्ध हो जाती थीं, जिससे मामूली बारिश में भी सड़कों पर गंदा पानी जमा हो जाता था। दूसरी समस्या यह थी कि प्लास्टिक कचरा खेतों की मिट्टी के लिए ‘धीमे जहर’ की तरह काम कर रहा था। मिट्टी के भीतर प्लास्टिक की मौजूदगी के कारण वायु और जल का संचार रुक गया था, जिसका नकारात्मक प्रभाव फसलों की पैदावार पर पड़ रहा था। इन्हीं जटिल पर्यावरणीय समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने के लिए ग्रामीण विकास विभाग ने मनसाही में इस अत्याधुनिक प्रबंधन इकाई की स्थापना की।

संग्रहण से सृजन तक की प्रक्रिया: मशीनों और मानवीय श्रम का अनूठा मेल

​मनसाही की यह इकाई केवल कचरा डंप करने की जगह नहीं है, बल्कि यह एक व्यवस्थित औद्योगिक इकाई की तरह कार्य करती है। यहाँ कचरे को मूल्यवान उत्पाद में बदलने के लिए एक वैज्ञानिक कार्यप्रणाली अपनाई गई है, जिसे लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत पूरी मुस्तैदी से संचालित किया जा रहा है।

  1. पंचायत स्तरीय संग्रहण तंत्र: प्रखंड की सभी पंचायतों में घर-घर से कचरा अलग-अलग (सूखा और गीला) एकत्र करने की व्यवस्था सुदृढ़ की गई है। स्वच्छता कर्मियों की टीम यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी प्लास्टिक कचरा सड़कों, खेतों या जलाशयों में न फेंका जाए। ग्रामीण विकास विभाग ने इस दिशा में लोगों को जागरूक किया कि प्लास्टिक को जलाना या फेंकना कितना आत्मघाती हो सकता है।
  2. सफाई और छंटनी: जब विभिन्न पंचायतों से प्लास्टिक कचरा इस इकाई में पहुँचता है, तो यहाँ तैनात कर्मचारी सबसे पहले इसकी बारीकी से सफाई करते हैं। प्लास्टिक से धूल, मिट्टी और अन्य अशुद्धियों को पूरी तरह हटाया जाता है ताकि अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता बनी रहे।
  3. बेलर और श्रेडर मशीन का उपयोग: सफाई के बाद बेलर मशीन के जरिए प्लास्टिक कचरे को अत्यधिक दबाव के साथ दबाकर ठोस बंडल बनाए जाते हैं। इससे कचरे का आयतन कम हो जाता है और उसे सुरक्षित रखना व ले जाना आसान होता है। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण भूमिका श्रेडर मशीन की होती है। यह मशीन प्लास्टिक के बड़े टुकड़ों और बोतलों को बहुत छोटे और बारीक दानों (कतरन) में तब्दील कर देती है। यही बारीक कतरन वह अंतिम उत्पाद है जिसकी बाजार में और उद्योगों में भारी मांग है।

पर्यावरण संरक्षण के साथ रोजगार का नया अवसर

​मनसाही की इस इकाई ने पर्यावरण की रक्षा के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई गति दी है। वर्तमान में यहाँ स्थायी रूप से कर्मचारियों की तैनाती की गई है जो मशीनों का संचालन करते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रखंड के विभिन्न गांवों में कचरा संग्रहण और इसके परिवहन के कार्य में दर्जनों स्वच्छता मित्रों और पर्यवेक्षकों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है। यह इकाई इस बात का प्रमाण है कि स्वच्छता अभियान केवल सफाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता का एक सशक्त माध्यम भी है।

​विभागीय अधिकारियों का मानना है कि इस इकाई के संचालन से ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ को बढ़ावा मिल रहा है। प्लास्टिक कचरा हटने से खेतों की मिट्टी फिर से सांस ले पा रही है, जिससे किसानों को उपजाऊ भूमि वापस मिल रही है। वहीं, श्रेडर मशीन से तैयार प्लास्टिक की कतरन का उपयोग अब सड़क निर्माण में (बिटुमेन के साथ मिलाकर) और प्लास्टिक की अन्य वस्तुओं के निर्माण में कच्चे माल के रूप में किया जा रहा है। इससे प्राप्त होने वाली आय से इस केंद्र के रखरखाव और कर्मियों के मानदेय की व्यवस्था की जा रही है, जिससे यह इकाई स्वयं में आत्मनिर्भर बनती जा रही है।

प्रशासनिक दूरदर्शिता और भविष्य की कार्ययोजना

​मनसाही प्रखंड में मिली इस सफलता के बाद अब जिला प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग इसे पूरे जिले में विस्तार देने की योजना बना रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, इस परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धि लोगों के व्यवहार में आया परिवर्तन है। अब ग्रामीण क्षेत्रों में लोग प्लास्टिक को कचरा समझकर यहाँ-वहाँ फेंकने के बजाय उसे संसाधन के रूप में देख रहे हैं।

​बाढ़ प्रभावित इस क्षेत्र में अब नालियों के जाम होने की समस्या में भी उल्लेखनीय कमी आई है। जल-जमाव वाले क्षेत्रों में अब पानी की निकासी पहले की तुलना में अधिक सुगम हुई है। विभाग का लक्ष्य है कि आने वाले समय में हर प्रखंड में इसी प्रकार की ‘प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई’ स्थापित की जाए ताकि पूरे कटिहार जिले को प्लास्टिक मुक्त और प्रदूषण मुक्त बनाया जा सके। लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान के तहत किए जा रहे ये प्रयास न केवल गांवों की सूरत बदल रहे हैं, बल्कि तरक्की की राह को भी साफ कर रहे हैं।

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