जहानाबाद में उत्पाद विभाग पर गंभीर आरोप, युवकों से 2.10 लाख रुपये वसूली का मामला फिर चर्चा में

पटना/जहानाबाद: बिहार में शराबबंदी कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने की जिम्मेदारी संभाल रहे उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग पर गंभीर आरोपों का मामला सामने आया है। जहानाबाद जिले में विभाग के कुछ अधिकारियों और कर्मियों पर दो युवकों को पकड़कर कथित रूप से मारपीट करने, घंटों तक हिरासत में रखने और बाद में लाखों रुपये वसूलने का आरोप लगाया गया है। यह मामला अब एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि पीड़ित परिवार का दावा है कि शिकायत के बाद पूरी राशि वापस कर दी गई थी, लेकिन आरोपित अधिकारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

घटना से जुड़े आरोपों ने उत्पाद विभाग की कार्यशैली, जवाबदेही और शराबबंदी कानून के नाम पर की जा रही कार्रवाई को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला मार्च 2026 का बताया जा रहा है, लेकिन अब इसके सामने आने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था और विभागीय निगरानी पर बहस तेज हो गई है।

वाहन जांच के दौरान शुरू हुआ विवाद

पीड़ित पक्ष द्वारा दिए गए आवेदन के अनुसार, नालंदा जिले के इस्लामपुर थाना क्षेत्र के मनीचक गांव निवासी अम्पू कुमार और श्याम सुंदर शर्मा 9 मार्च 2026 को गया से अपने घर लौट रहे थे। इसी दौरान जहानाबाद जिले के हुलासगंज क्षेत्र स्थित चौहरमल चौक के पास उत्पाद विभाग की टीम वाहन जांच अभियान चला रही थी।

आरोप है कि जांच के दौरान उत्पाद विभाग के अधिकारियों ने उनकी गाड़ी रोकी और वाहन की चाबी अपने कब्जे में ले ली। इसके साथ ही दोनों युवकों के मोबाइल फोन भी ले लिए गए। शिकायत में कहा गया है कि इसके बाद दोनों के साथ कथित रूप से दुर्व्यवहार किया गया और मारपीट भी की गई।

पीड़ितों का आरोप है कि अधिकारियों ने उनके पास मौजूद नकदी भी अपने कब्जे में ले ली और बाद में उन्हें अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर दबाव बनाया गया।

एक लाख रुपये की मांग का आरोप

शिकायत में कहा गया है कि उत्पाद विभाग के कुछ कर्मियों ने अम्पू कुमार से एक लाख रुपये की मांग की। आरोप के अनुसार उन्हें साहू बीघा नहर के पास ले जाया गया, जहां उनसे अपने परिवार को फोन कर पैसे मंगाने के लिए कहा गया।

आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि अम्पू कुमार ने अपने पिता से संपर्क कर निर्धारित स्थान पर पैसे पहुंचाने को कहा। आरोप है कि बाद में उनके पिता वहां पहुंचे और संबंधित अधिकारियों को एक लाख रुपये दिए गए।

पीड़ित पक्ष का दावा है कि इस दौरान एक वीडियो भी रिकॉर्ड कराया गया, जिसमें कथित तौर पर यह कहलवाया गया कि उनके साथ न तो मारपीट हुई है और न ही किसी प्रकार का लेन-देन हुआ है। इसके बाद मोबाइल और वाहन की चाबी वापस कर दी गई।

दूसरे युवक को छोड़ने के लिए भी मांगे गए पैसे

मामले में आरोप लगाया गया है कि अम्पू कुमार को छोड़ने के बाद भी श्याम सुंदर शर्मा को हिरासत में रखा गया। शिकायत के अनुसार उन्हें छोड़ने के लिए अतिरिक्त 50 हजार रुपये की मांग की गई।

पीड़ित परिवार का कहना है कि बाद में यह राशि भी उपलब्ध कराई गई, जिसके बाद दूसरे युवक को छोड़ा गया। आवेदन में कुल 2 लाख 10 हजार रुपये की वसूली का आरोप लगाया गया है।

यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल विभागीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

डीएम से शिकायत के बाद बढ़ा मामला

घटना के कुछ दिनों बाद पीड़ित अम्पू कुमार के पिता मिथिलेश सिंह ने जहानाबाद के उत्पाद अधीक्षक से मिलकर लिखित शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे और उसके साथी से जबरन लाखों रुपये वसूले गए हैं।

शिकायत के बाद मामला जिला प्रशासन तक पहुंचा। परिवार का दावा है कि जिलाधिकारी को आवेदन दिए जाने के बाद मामले को गंभीरता से लिया गया और संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा गया।

पीड़ित पक्ष का कहना है कि शिकायत के बाद पहले डेढ़ लाख रुपये लौटाए गए और बाद में पूरी 2 लाख 10 हजार रुपये की राशि वापस कर दी गई। परिवार इसे इस बात का संकेत मानता है कि उनके आरोपों में सच्चाई थी।

हालांकि प्रशासन की ओर से इस दावे की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

राशि वापसी पर उठ रहे सवाल

मामले के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि वास्तव में कोई अवैध वसूली नहीं हुई थी तो फिर राशि वापस क्यों की गई। दूसरी ओर यदि राशि लौटाई गई थी, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय या कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी शिकायत के बाद पैसा वापस कर देना अपने आप में पूरे मामले को समाप्त नहीं कर देता। यदि सरकारी पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग किया गया है, तो उसकी स्वतंत्र जांच और जवाबदेही तय होना आवश्यक है।

इसी वजह से यह मामला अब केवल धन वापसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विभागीय आचरण और प्रशासनिक पारदर्शिता का विषय बन गया है।

उत्पाद अधीक्षक ने क्या कहा?

मामले को लेकर जहानाबाद के उत्पाद अधीक्षक दिलीप कुमार पाठक ने स्वीकार किया कि शिकायत उनके पास पहुंची थी। उन्होंने बताया कि मामले की जानकारी मिलने के बाद वे शिकायतकर्ता के साथ जिलाधिकारी के पास भी गए थे।

अधीक्षक के अनुसार पूरे मामले की जांच कराई गई है, लेकिन जांच रिपोर्ट अभी उनके पास नहीं पहुंची है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए हाल ही में संबंधित अधिकारियों से पत्राचार भी किया गया है।

जब उनसे यह पूछा गया कि क्या कथित रूप से वसूली गई राशि वापस की गई थी, तो उन्होंने कहा कि राशि वापसी की प्रक्रिया उनके सामने नहीं हुई। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट नहीं किया कि शिकायत में लगाए गए आरोपों की वास्तविक स्थिति क्या है।

शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन पर उठे प्रश्न

बिहार में शराबबंदी लागू होने के बाद उत्पाद विभाग की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई है। विभाग को अवैध शराब कारोबार रोकने, तस्करी पर अंकुश लगाने और कानून का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है।

लेकिन समय-समय पर ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं जिनमें विभागीय कार्रवाई की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। जहानाबाद का यह मामला भी उसी कड़ी में देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जरूरी है कि कार्रवाई करने वाले अधिकारी भी पूरी तरह जवाबदेह हों और शिकायतों की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

फिलहाल पूरे मामले में सभी की नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है। यदि जांच में शिकायतकर्ताओं के आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की मांग तेज हो सकती है।

वहीं दूसरी ओर यदि जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं होती है तो प्रशासन को भी पूरे घटनाक्रम पर स्पष्ट स्थिति सार्वजनिक करनी होगी। फिलहाल यह मामला जहानाबाद से निकलकर पूरे बिहार में चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर सच क्या है।

अब देखना होगा कि जांच प्रक्रिया किस निष्कर्ष पर पहुंचती है और प्रशासन इस गंभीर मामले में आगे क्या कदम उठाता है।

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