द वॉयस ऑफ बिहार (क्राइम डेस्क)
वह जेल में अपराधियों को सुधारने की नौकरी करता था, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर वह खुद एक ‘दरिंदा’ बन चुका था। समस्तीपुर के शेरपुर गांव में जो हुआ, उसने खाकी वर्दी को शर्मसार कर दिया है। दरभंगा मंडल कारा के डिप्टी जेलर नंदू चौधरी पर आरोप है कि उसने अपनी ही पत्नी श्वेता को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया क्योंकि उसे दहेज में ‘फॉर्च्यूनर’ कार नहीं मिली थी।
3 दिन की भूख और बेइंतहा दर्द
यह महज एक हत्या नहीं, बल्कि रूह कांप देने वाली प्रताड़ना की कहानी है। मृतका के भाई ने पुलिस के सामने जो राज खोले हैं, वे दिल दहला देने वाले हैं। आरोप है कि ‘साहब’ को 10 लाख कैश और फॉर्च्यूनर चाहिए थी। जब यह मांग पूरी नहीं हुई, तो श्वेता को घर में कैद कर दिया गया। उसे पिछले 20 दिनों से पीटा जा रहा था और हद तो तब हो गई जब मौत से पहले उसे लगातार तीन दिनों तक अन्न का एक दाना भी नहीं दिया गया। भूख और प्यास से तड़प रही श्वेता की आखिरकार सांसें थम गईं।
साजिश या इत्तेफाक? छुट्टी, हत्या और फिर फरार
इस पूरी कहानी में एक गहरी साजिश की बू आ रही है। जेल अधीक्षक स्नेहलता के मुताबिक, नंदू चौधरी ने 11 फरवरी को ही अपनी ‘बीमार बेटी’ के नाम पर छुट्टी ली थी। सवाल यह है कि अगर बेटी बीमार थी, तो अब वह 14 महीने की मासूम कहां है? श्वेता की लाश फंदे पर लटकती मिली और पूरा ससुराल—पति, सास, ससुर, देवर—सब गायब हैं। पुलिस अब उस ‘अफसर’ को ढूंढ रही है जो कानून का रखवाला बनकर कानून की ही धज्जियां उड़ा गया।


