भारतीय रेल के लिए सर्दियों का कुहासा सबसे बड़ी चुनौती माना जाता है। चारों तरफ घनी धुंध, बेहद कम विजिबिलिटी और कुछ ही मीटर आगे तक दिखाई न देना—ऐसे हालात में ट्रेन चलाना किसी परीक्षा से कम नहीं होता। इसी वक्त असली जिम्मेदारी लोको पायलट और सहायक लोको पायलट पर होती है, जिनके कौशल और विवेक पर यात्रियों की सुरक्षा निर्भर करती है।
कुहासे में कैसे होता है ट्रेन का संचालन
सर्दियों में जब कोहरे की मार तेज होती है, तब ट्रेनों की रफ्तार पर ब्रेक लगाना मजबूरी बन जाती है। सुरक्षित परिचालन सुनिश्चित करना रेलवे की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। ईटीवी भारत से बातचीत में लोको पायलट दिलीप सिंह ने बताया कि घने कोहरे के दौरान फॉग सेफ डिवाइस (FSD) की मदद ली जाती है।
उनके अनुसार, फॉग सेफ डिवाइस आगे आने वाले सिग्नलों की जानकारी पहले ही दे देता है। हालांकि यह डिवाइस सिर्फ सिग्नल का नाम बताता है, सिग्नल लाल है या हरा—इसकी जानकारी इसमें नहीं मिलती। ऐसे में लोको पायलट को अतिरिक्त सतर्कता बरतनी पड़ती है। यदि फॉग डिवाइस खराब हो जाए और कोहरा अत्यधिक घना हो, तो लोको पायलट अपने अनुभव और विवेक के आधार पर ट्रेन का संचालन करते हैं।
महाप्रबंधक स्तर से मिलते हैं विशेष निर्देश
रेलवे की ओर से सर्दियों के मौसम में लोको पायलटों को विशेष दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं। महाप्रबंधक स्तर से यह साफ निर्देश होता है कि किसी भी स्थिति में ट्रेनों का सुरक्षित परिचालन सर्वोपरि रहेगा। अधिक कोहरा होने पर लोको पायलट और सहायक लोको पायलट को अपने विवेक से गति और संचालन का निर्णय लेने की छूट दी जाती है।
ट्रैक पर पैदल चलकर आगे बढ़ती है ट्रेन
जब फॉग सेफ डिवाइस काम नहीं करता और विजिबिलिटी लगभग शून्य होती है, तब असिस्टेंट लोको पायलट जरूरत पड़ने पर ट्रैक पर आगे पैदल चलता है। इस दौरान लोको पायलट ट्रेन को बेहद धीमी गति से आगे बढ़ाते हैं। रेलवे की ओर से ट्रैक पर विशेष पटाखे भी लगाए जाते हैं, जिनकी आवाज से यह संकेत मिलता है कि आगे का सिग्नल सुरक्षित है। इन सभी उपायों का उद्देश्य केवल एक होता है—यात्रियों की सुरक्षा।
गति तय करती है विजिबिलिटी
लोको पायलट विनोद कुमार राय बताते हैं कि कोहरे में ट्रेन की गति पूरी तरह विजिबिलिटी पर निर्भर करती है। दृश्यता कम होने पर स्पीड स्वतः घटा दी जाती है। फॉग सेफ डिवाइस से सिग्नल की दूरी का अंदाजा लगाया जाता है, जिससे ट्रेन को सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।
सुरक्षा, संरक्षा और समय पालन पर फोकस
भारतीय रेल देश को उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम जोड़ने वाला सबसे बड़ा नेटवर्क है। यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क है, जिसमें करीब 12 से 13 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं। प्रतिदिन करोड़ों यात्री भारतीय रेल पर भरोसा कर सफर करते हैं।
रेल मंत्रालय का मूल मंत्र है—संरक्षा, सुरक्षा और समय पालन। इसी सिद्धांत पर भारतीय रेल 24 घंटे, साल के 365 दिन लगातार काम करती है। देशभर में फैले 19 रेलवे जोन और 73 मंडल कार्यालय इस विशाल नेटवर्क के संचालन की जिम्मेदारी संभालते हैं।
हर हाल में सुरक्षित सफर का संकल्प
ट्रेन को समय पर और सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाना भारतीय रेल की प्राथमिक जिम्मेदारी है। चाहे घना कोहरा हो या मौसम की कोई और चुनौती, लोको पायलट और रेलवे कर्मचारी अपने अनुभव, तकनीक और सतर्कता से इस जिम्मेदारी को निभाते हैं। यही कारण है कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद भारतीय रेल यात्रियों को सुरक्षित सफर का भरोसा देती है।


