पटना। बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने 243 में से 202 सीटों पर जीत हासिल कर एक बार फिर सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया। नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह जीत एक बार फिर साबित करती है कि 2005 से अब तक बिहार की बड़ी आबादी नीतीश कुमार पर भरोसा करती आई है।
इस भरोसे की बुनियाद उस दौर से शुरू होती है जब उन्होंने 2005 में बिहार को “जंगलराज” की छवि से छुटकारा दिलाने का वादा किया था।
1990–2005: आखिर क्यों कहा जाता था इसे ‘जंगलराज’?
साल 1990 से 2005 तक बिहार में लालू प्रसाद यादव और बाद में राबड़ी देवी की सरकार रही। इस 15 साल के दौर को राजनीतिक विरोधियों से लेकर सामाजिक विश्लेषकों तक ने “जंगलराज” करार दिया।
कारण साफ थे —
- जातीय सेनाओं का खौफ,
- नरसंहारों की लंबी सूची,
- प्रशासनिक विफलता,
- औद्योगिक गिरावट,
- और अपराध की बेलगाम रफ्तार।
बारा नरसंहार (1992) और लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार (1997) आज भी बिहार की यादों में दहशत के रूप में दर्ज हैं।
वाजपेयी का तंज – “बिहार में सरकार नहीं, जंगलराज है”
तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में पटना की एक सभा में कहा था कि “बिहार में चल रहा जंगलराज सिर्फ राज्य का मुद्दा नहीं, पूरे देश की चिंता है।”
वाजपेयी ने राबड़ी सरकार पर अपराधियों को संरक्षण देने और संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप लगाया था।
2005: नीतीश कुमार आए और शुरू हुआ बदलाव का दौर
2005 में सत्ता संभालते ही नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी— कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाना।
उन्होंने ‘जंगलराज’ की छवि तोड़ने के लिए कई बड़े फैसले लिए।
1. कानून-व्यवस्था में सुधार: फास्ट-ट्रैक कोर्ट, पुलिस भर्ती और कठोर कार्रवाई
फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन
नीतीश ने आते ही राज्य में सैकड़ों फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए। इसका असर चौंकाने वाला था—
- 2005–2010 के बीच 1 लाख से अधिक अपराधियों को सजा
- पहले के 15 वर्षों में सिर्फ 20 हजार को सजा
ये आंकड़े बताते हैं कि पहली बार अपराधियों में कानून का डर पैदा हुआ।
पुलिस व्यवस्था की सबसे बड़ी ओवरहॉलिंग
- करीब 70 हजार पुलिसकर्मियों की नई भर्ती
- आधुनिक हथियार और बेहतर प्रशिक्षण
- पुलिस की सैलरी में बढ़ोतरी
- 1000+ नए थाने और चौकियां
बिहार की पुलिस फोर्स को पहली बार एक आधुनिक आकार मिला।
2. सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर: बिहार का सबसे बड़ा परिवर्तन
2005 से पहले बिहार का नाम खराब सड़कों के लिए मशहूर था।
नीतीश सरकार ने इसे मिशन मोड में बदल दिया।
2005–2015
- 50,000 किमी से अधिक पक्की सड़कें निर्माण
- 500+ आबादी वाले हर गांव को सड़क से जोड़ना
- NH, राज्य मार्ग और ग्रामीण सड़कों का नेटवर्क तैयार
पहली बार बिहार में सड़कें चुनावी मुद्दा न होकर विकास का प्रतीक बनीं।
3. बिजली – अंधेरे से उजाले तक का सफर
2005 से पहले गांवों में बिजली का मतलब था रोज 3–4 घंटे की सप्लाई।
2005 के बाद सरकार ने बड़े पैमाने पर बिजली सुधार योजनाएं शुरू कीं।
- 2005: 70 KWh प्रति व्यक्ति खपत
- 2015: 300 KWh+ (चार गुना वृद्धि)
- हर गांव, हर घर तक बिजली कनेक्शन का लक्ष्य लगभग पूरा
बिहार, जो कभी अंधेरे का प्रतीक था, आज ग्रामीण बिजली उपलब्धता में कई राज्यों से आगे खड़ा है।
4. शिक्षा – चरवाहा विद्यालय से स्मार्ट क्लास तक
नीतीश ने शिक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई क्रांतिकारी कदम उठाए:
मुख्य सुधार
- हजारों स्कूल भवनों का निर्माण
- बड़ी संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति
- साइकिल योजना की शुरुआत, जिससे लाखों लड़कियों की ड्रॉपआउट दर घटी
- स्कूल यूनिफॉर्म, पोशाक योजना, राशन और छात्रवृत्ति
चरवाहा विद्यालयों के दौर में जो शिक्षा बदहाल थी, वह धीरे-धीरे मुख्यधारा में लौटी।
5. महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक सुधार
- पंचायती राज में 50% आरक्षण
- महिला स्वयं सहायता समूहों को मजबूत करना
- कन्या उत्थान, विवाह सहायता और सुरक्षा योजनाएं
इसने बिहार में सामाजिक संतुलन बनाने में बड़ी भूमिका निभाई।
क्या 2025 में ‘जंगलराज’ की छाया खत्म हो चुकी है?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार 2005 वाला राज्य अब नहीं रहा।
अपराध पर अंकुश, सड़कों का नेटवर्क, बिजली-शिक्षा में सुधार और सुशासन की छवि ने नीतीश कुमार को लगातार एक प्रभावशाली नेता बनाए रखा है।
हालांकि बेरोजगारी, उद्योगों की कमी और प्रवास जैसे मुद्दे अब भी चुनौती हैं—
लेकिन ‘जंगलराज’ से ‘सुशासन’ तक का सफर बिहार के इतिहास में दर्ज हो चुका है।


