आखिर क्यों खास रहा इस बार का विश्व आर्द्रभूमि दिवस बिहार के लिए?
पटना, 2 फरवरी।
इस बार का विश्व आर्द्रभूमि दिवस बिहार के लिए सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि पर्यावरण के नक्शे पर नई पहचान लेकर आया। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बिहार को तीन रामसर सर्टिफिकेट सौंपे। यह सम्मान राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के सदस्य सचिव एस. चंद्रशेखर को दिया गया।
इसके साथ ही बिहार में तीन नई रामसर साइट आधिकारिक रूप से घोषित हो गईं। अब भारत में कुल रामसर स्थल 98 हो चुके हैं, जिनमें बिहार के 6 स्थल शामिल हैं।
क्यों खास रहा यह विश्व आर्द्रभूमि दिवस?
हर साल 2 फरवरी को यह दिवस ईरान के रामसर शहर में 1971 में हुए वेटलैंड कन्वेंशन की याद में मनाया जाता है।
2026 की थीम:
“वेटलैंड्स और पारंपरिक ज्ञान: सांस्कृतिक विरासत का जश्न”
इसका संदेश साफ है—आर्द्रभूमि सिर्फ जल क्षेत्र नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और जीवनशैली से जुड़ा विरासत स्थल हैं।
बिहार की नई रामसर साइट कौन-सी हैं?
2025 में जिन तीन आर्द्रभूमियों को रामसर सूची में जोड़ा गया—
- गोकुल जलाशय (बक्सर)
- उदयपुर झील (पश्चिम चंपारण)
- गोगाबिल (कटिहार)
इनके जुड़ने से बिहार की कुल रामसर साइट 6 हो गईं।
पहले से चर्चित रामसर स्थल
- कांवरताल (बेगूसराय) – एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की ऑक्स्बो झील
- नागी-नकटी पक्षी अभ्यारण्य (जमुई) – प्रवासी पक्षियों का बड़ा ठिकाना
ये स्थल न सिर्फ जैव विविधता, बल्कि इको-टूरिज्म के लिए भी पहचान बन चुके हैं।
आर्द्रभूमि क्यों हैं इतनी जरूरी?
आर्द्रभूमि को “धरती की किडनी” कहा जाता है, क्योंकि ये—
- जल को शुद्ध करती हैं
- बाढ़ से बचाव करती हैं
- भूजल स्तर बनाए रखती हैं
- हजारों प्रजातियों का घर हैं
बिहार में अब तक 2.25 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र वाली 4316 आर्द्रभूमियों का सत्यापन किया जा चुका है।
ग्लोबल मैप पर बिहार की पहचान
तीन नए रामसर सर्टिफिकेट सिर्फ कागज नहीं, बल्कि इस बात का संकेत हैं कि बिहार अब वैश्विक संरक्षण मानचित्र पर अपनी मजबूत जगह बना रहा है।
ये ऑक्स्बो झीलें गंगा और गंडक जैसी नदियों के लिए प्राकृतिक बफर का काम करती हैं और जलवायु संतुलन में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
निष्कर्ष:
बिहार की धरती अब सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय धरोहर के रूप में भी विश्व में अपनी पहचान बना रही है।


