बिहार में ‘न्याय की रफ्तार’ पर गृह विभाग की पैनी नजर: मार्च में 10 हजार से अधिक समन और 5 हजार गैर-जमानतीय वारंट का तामिला, लंबित कांडों के निपटारे के लिए ‘सुपरफास्ट’ एक्शन प्लान

मुख्य बिंदु:

  • समीक्षा बैठक: अपर मुख्य सचिव, गृह विभाग की अध्यक्षता में पटना और पूर्णियाँ प्रमंडल के जिलों की डिजिटल समीक्षा।
  • सख्त निर्देश: शस्त्र अधिनियम (आर्म्स एक्ट) से संबंधित लंबित मुकदमों का प्राथमिकता के आधार पर होगा त्वरित निष्पादन।
  • बड़ी बरामदगी: मार्च 2026 में 10,303 समन और 5,953 गैर-जमानतीय वारंट (NBW) का कराया गया सफल क्रियान्वयन।
  • न्यायिक सक्रियता: महीने भर में 4,930 साक्षियों की गवाही और 14,058 पुराने कांडों का किया गया अंतिम निपटारा।
  • डिजिटल पुलिसिंग: CCTNS पोर्टल पर 10,011 नई प्राथमिकियां दर्ज, पुलिस की कार्यशैली में पारदर्शिता लाने पर जोर।

पटना। किसी भी सभ्य समाज में कानून का शासन केवल पुलिस की मुस्तैदी से नहीं, बल्कि न्याय की गति से तय होता है। अपराधी को पकड़ना पुलिस का काम है, लेकिन उसे सजा के मुकाम तक पहुँचाना अभियोजन (Prosecution) की जिम्मेदारी होती है। बिहार में इसी न्याय प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और तीव्र बनाने के लिए गृह विभाग ने अपनी कमर कस ली है। शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026 को पटना के प्रशासनिक गलियारों में हलचल तब बढ़ गई जब गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए एक मैराथन समीक्षा बैठक की। इस बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु पटना और पूर्णियाँ प्रमंडल के वे जिले थे, जहाँ मुकदमों का बोझ और अपराधियों की धड़पकड़ के आंकड़े अक्सर चर्चा में रहते हैं। समीक्षा के दौरान जो आंकड़े सामने आए हैं, वे यह बताने के लिए काफी हैं कि मार्च के महीने में बिहार पुलिस और अभियोजन निदेशालय ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी।

न्यायिक तंत्र की सक्रियता: समन और वारंट का ‘महा-तामिला’

​अक्सर अदालती कार्यवाही में देरी का सबसे बड़ा कारण समन और वारंट का समय पर तामिला न होना होता है। यदि गवाह या आरोपी समय पर अदालत नहीं पहुँचते, तो न्याय की पूरी प्रक्रिया थम सी जाती है। समीक्षा बैठक में गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव ने मार्च 2026 की जो प्रगति रिपोर्ट साझा की, वह काफी उत्साहजनक है। अकेले मार्च महीने में पटना और पूर्णियाँ प्रमंडल के जिलों में 10,303 समन का तामिला कराया गया है। यह केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उन दस हजार लोगों तक कानून की पहुँच की कहानी है जिन्हें न्याय प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया।

​इसके अलावा, पुलिस ने उन अपराधियों पर भी नकेल कसी है जो वारंट मिलने के बाद भी कानून से भाग रहे थे। समीक्षा में पाया गया कि:

  • जमानतीय अधिपत्र (Bailable Warrants): 5,314 वारंटों का निष्पादन किया गया।
  • गैर-जमानतीय अधिपत्र (Non-Bailable Warrants): 5,953 शातिर अपराधियों को गिरफ्तार करने या उनके वारंट को तामिला करने में सफलता मिली।
  • इश्तेहार और कुर्की: फरार अपराधियों के मन में खौफ पैदा करने के लिए 1,105 इश्तेहार जारी किए गए और 703 मामलों में कुर्की-जब्ती की कठोर कार्रवाई की गई। कुर्की-जब्ती की यह बढ़ती संख्या अपराधियों के लिए एक सीधा संदेश है कि वे संपत्ति बचाकर न्याय से बच नहीं सकते।

साक्षियों की गवाही: मुकदमों के बोझ को कम करने का महामंत्र

​मुकदमों के लंबित रहने का एक अन्य प्रमुख कारण गवाहों का अदालत में पेश न होना है। अभियोजन निदेशालय ने इस दिशा में विशेष मुस्तैदी दिखाई है। मार्च के महीने में विभिन्न न्यायालयों में कुल 4,930 साक्षियों की गवाही दर्ज कराई गई। साक्षियों की गवाही न्याय की वह नींव है जिस पर सजा का ढांचा खड़ा होता है। अपर मुख्य सचिव ने स्पष्ट किया कि गवाहों की सुरक्षा और समय पर उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करना अभियोजन अधिकारियों की प्राथमिकता होनी चाहिए।

​वहीं, कांडों के निष्पादन की दर भी इस बार प्रभावी रही। समीक्षा के दौरान बताया गया कि माह भर में कुल 14,058 पुराने कांडों का निष्पादन किया गया। गौर करने वाली बात यह है कि इस दौरान 10,011 नई प्राथमिकियां (FIR) दर्ज हुई थीं, यानी दर्ज होने वाले नए मामलों की तुलना में निपटाए गए मामलों की संख्या लगभग 40 प्रतिशत अधिक रही। यह आंकड़ा बिहार के प्रशासनिक तंत्र की कार्यकुशलता की ओर संकेत करता है, जो लंबित फाइलों के ढेर को कम करने में जुटा है।

शस्त्र अधिनियम (Arms Act) पर विशेष प्रहार और डिजिटल निगरानी

​बैठक में अपर मुख्य सचिव ने शस्त्र अधिनियम (Arms Act) से संबंधित लंबित वादों पर विशेष चिंता जताई। बिहार में संगठित अपराध की जड़ अक्सर अवैध हथियार होते हैं। जब तक अवैध हथियारों के साथ पकड़े गए अपराधियों को ससमय सजा नहीं मिलेगी, तब तक अपराध पर पूर्ण लगाम लगाना मुश्किल है। अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया गया कि आर्म्स एक्ट के मामलों को ‘फास्ट ट्रैक’ मोड में डाला जाए और उनका त्वरित निष्पादन सुनिश्चित किया जाए।

​आधुनिक पुलिसिंग के दौर में CCTNS (Crime and Criminal Tracking Network & Systems) की भूमिका को भी रेखांकित किया गया। मार्च में 10,011 प्राथमिकियों का डिजिटल रूप से दर्ज होना यह बताता है कि बिहार पुलिस अब पूरी तरह से तकनीक-युक्त कार्यशैली की ओर अग्रसर है। CCTNS के जरिए अपराधी का पूरा कच्चा-चिट्ठा एक क्लिक पर उपलब्ध होने से जाँच अधिकारियों को सुविधा हो रही है और अदालती आदेशिकाओं का डिजिटल ट्रैक रखना भी आसान हुआ है।

प्रशासनिक तालमेल: अधिकारियों का साझा संकल्प

​यह समीक्षा बैठक केवल आंकड़ों की बाजीगरी नहीं थी, बल्कि पुलिस और अभियोजन के बीच की दूरी को पाटने का एक साझा मंच था। बैठक में सुधांशु कुमार चौबे (विशेष सचिव-सह-प्रभारी निदेशक अभियोजन), कृष्ण कुमार (अपर आयुक्त, मद्य निषेध एवं निबंधन विभाग), अमलेन्दु कुमार (संयुक्त सचिव, गृह विभाग) सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

​इसके अलावा, पुलिस मुख्यालय से पुलिस उपाधीक्षक (विधि व्यवस्था) सुरेन्द्र प्रसाद और विधि विभाग के परामर्शियों ने भी हिस्सा लिया। क्षेत्रीय स्तर पर पटना और पूर्णियाँ प्रमंडल के सभी जिलों के वरीय पुलिस अधीक्षक (SSP), पुलिस अधीक्षक (SP), लोक अभियोजक (PP) और उत्पाद अधीक्षक भी इस वर्चुअल बैठक के माध्यम से जुड़े थे। अधिकारियों को हिदायत दी गई कि वे जिले के न्यायालयों में लंबित आदेशिकाओं के निष्पादन की दर को बढ़ाएं और यह सुनिश्चित करें कि किसी भी तकनीकी खामी के कारण कोई अपराधी कानून की पकड़ से बाहर न रहे।

सुशासन की दिशा में एक नया अध्याय

​गृह विभाग की इस सघन समीक्षा से यह स्पष्ट होता है कि बिहार सरकार अब अभियोजन की प्रक्रिया को भी उतनी ही गंभीरता से ले रही है जितनी की अपराध की रोकथाम को। पुलिस द्वारा अपराधी को पकड़ना आधी जंग है, उसे अदालत के जरिए सलाखों के पीछे पहुँचाना ही असली न्याय है। मार्च 2026 की यह प्रगति रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि पटना और पूर्णियाँ प्रमंडल के जिलों में न्याय की रफ्तार बढ़ने वाली है।

​समन, वारंट और कुर्की जैसे हथियारों का प्रभावी उपयोग अपराधियों को यह संदेश दे रहा है कि वे न्याय से भाग नहीं सकते। अपर मुख्य सचिव का शस्त्र अधिनियम पर कड़ा रुख और कांडों के निष्पादन की गति बढ़ाना, आने वाले समय में बिहार की कानून व्यवस्था को और सुदृढ़ करेगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि गृह विभाग की यह मुस्तैदी आने वाले महीनों में लंबित कांडों के ग्राफ को कितना नीचे ला पाती है। फिलहाल, प्रशासनिक गलियारों में इस समीक्षा को एक सफल और परिणामोन्मुखी कदम के रूप में देखा जा रहा है।

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