HIGHLIGHTS: सबौर मेला बना जनआंदोलन; छोटे किसानों की बढ़ेगी आय
- रिकॉर्ड भागीदारी: 3 दिनों में लगभग 50 से 55 हजार लोगों ने मेले में शिरकत की; 163 संस्थानों ने दिखाया दम।
- सम्मान: मुंगेर की पूनम देवी और भागलपुर की बबीता कुमारी समेत कई नवाचारी किसानों को किया गया पुरस्कृत।
- मंदिर का द्वार: कुलपति डॉ. डी. आर. सिंह बोले— “बिहार कृषि विश्वविद्यालय किसानों का मंदिर है, जिसके द्वार हमेशा खुले हैं।”
- अव्वल स्टॉल: सस्य विज्ञान विभाग और वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय, बक्सर ने मारी बाजी।
सबौर (भागलपुर) | 19 मार्च, 2026
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर के प्रांगण में चल रहा तीन दिवसीय राष्ट्रीय किसान मेला-सह-प्रदर्शनी 2026 आज सुनहरी यादों और नए संकल्पों के साथ संपन्न हो गया। अंतिम दिन उमड़ी भारी भीड़ ने साबित कर दिया कि बिहार का किसान अब ‘परंपरा’ के साथ-साथ ‘प्रौद्योगिकी’ (Technology) अपनाने को भी बेताब है। समापन समारोह में भागलपुर कमिश्नर अवनीश कुमार सिंह और डीएम डॉ. नवल किशोर चौधरी ने किसानों का उत्साहवर्धन किया।
🏆 सम्मान की ‘फाइल’ रिपोर्ट: नवाचार को मिली नई पहचान
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श्रेणी |
विजेता / सम्मानित संस्थान |
जिला/स्थान |
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सर्वश्रेष्ठ स्टॉल (विभाग) |
सस्य विज्ञान विभाग (प्रथम) |
BAU, सबौर |
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सर्वश्रेष्ठ महाविद्यालय |
वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय |
बक्सर |
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नवाचारी किसान (महिला) |
श्रीमती पूनम देवी, बबीता कुमारी, बंदना कुमारी |
मुंगेर/भागलपुर |
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नवाचारी किसान (पुरुष) |
श्री विजय कुमार सिंह |
मुंगेर |
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विशेष शोध सम्मान |
पान अनुसंधान केंद्र, ICAR-RCR, NABARD |
बिहार |
“अगली हरित क्रांति का केंद्र बनेगा बिहार”
समारोह के दौरान मुख्य अतिथियों और विश्वविद्यालय प्रबंधन ने भविष्य की खेती का रोडमैप साझा किया:
- सीमांत किसानों पर फोकस: कमिश्नर अवनीश कुमार सिंह ने विश्वविद्यालय से आग्रह किया कि ऐसी सरल तकनीकें विकसित की जाएं जिससे छोटे और सीमांत किसानों की आय में सीधा इजाफा हो।
- युवा और उद्यमिता: कुलपति प्रो. (डॉ.) डी. आर. सिंह ने युवाओं को ‘खेती से कमाई’ यानी एग्री-एंटरप्रेन्योरशिप की ओर बढ़ने का आह्वान किया। उन्होंने मखाना और अन्य क्षेत्रीय फसलों के महत्व पर जोर दिया।
- निरंतरता की मांग: डीएम डॉ. नवल किशोर चौधरी ने कहा कि ऐसे मेले बार-बार होने चाहिए ताकि अनुसंधान (Research) का लाभ खेतों तक पहुंच सके।
VOB का नजरिया: क्या ‘सबौर मॉडल’ से बदलेगी किसान की तकदीर?
सबौर मेला केवल खाद-बीज की प्रदर्शनी नहीं, बल्कि बिहार के कृषि क्षेत्र के ‘बौद्धिक जागरण’ का मंच बन गया है। जब 55 हजार किसान एक जगह जुटते हैं, तो वह ‘जनआंदोलन’ ही है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ का मानना है कि “शोध से समाधान” और “मखाना गीत” जैसे सांस्कृतिक जुड़ाव बताते हैं कि विश्वविद्यालय अब केवल किताबी रिसर्च नहीं, बल्कि किसानों की ‘इमोशनल और इकोनॉमिक’ जरूरतों को समझ रहा है। चुनौती बस इतनी है कि मेले में दिखी ये ‘हाई-टेक’ मशीनें और तकनीकें गरीब किसान की पहुंच और जेब के दायरे में कितनी जल्दी आती हैं।


