
गया, 31 मई 2026। बिहार में आयोजित दारोगा भर्ती मुख्य परीक्षा के दौरान सामने आए एक हाईटेक नकल कांड ने प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गया जिले में पुलिस ने एक ऐसे संगठित गिरोह का खुलासा किया है जो आधुनिक तकनीक की मदद से परीक्षार्थियों तक प्रश्नों के उत्तर पहुंचाने का काम कर रहा था। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस नेटवर्क में कई लोग शामिल थे और परीक्षा केंद्र के भीतर तथा बाहर बैठकर पूरी योजना को संचालित किया जा रहा था।
पुलिस के अनुसार यह कोई सामान्य नकल का मामला नहीं था, बल्कि सुनियोजित तरीके से तैयार किया गया एक तकनीकी नेटवर्क था, जिसमें ब्लूटूथ डिवाइस, वॉकी-टॉकी, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जा रहा था। जांच एजेंसियों का मानना है कि यदि समय रहते इस गिरोह का खुलासा नहीं होता तो कई अभ्यर्थियों को अनुचित लाभ मिल सकता था।
जानकारी के अनुसार बिहार पुलिस अवर सेवा आयोग द्वारा 27 मई को दारोगा भर्ती मुख्य परीक्षा आयोजित की गई थी। गया शहर में परीक्षा के लिए कई केंद्र बनाए गए थे, जहां हजारों अभ्यर्थी परीक्षा देने पहुंचे थे। इसी दौरान पुलिस को कुछ संदिग्ध गतिविधियों की सूचना मिली, जिसके बाद जांच शुरू की गई। जांच के क्रम में रामपुर थाना क्षेत्र से एक संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में लिया गया और पूछताछ के दौरान पूरे नेटवर्क की परतें खुलनी शुरू हो गईं।
गिरफ्तार व्यक्ति की पहचान आशुतोष कुमार पासवान के रूप में हुई है। पुलिस का दावा है कि वह इस पूरे रैकेट का सक्रिय सदस्य था और परीक्षा के दौरान तकनीकी माध्यमों से उत्तर पहुंचाने की प्रक्रिया में शामिल था। उसके पास से कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी बरामद किए गए हैं, जिनकी फोरेंसिक जांच कराई जा रही है।
जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे काफी चौंकाने वाले बताए जा रहे हैं। पुलिस के अनुसार परीक्षा केंद्र के अंदर मौजूद एक अभ्यर्थी प्रश्नपत्र से सवालों की जानकारी बाहर पहुंचा रहा था। इसके बाद परीक्षा केंद्र के बाहर मौजूद गिरोह के सदस्य उन सवालों के उत्तर तैयार करते थे। फिर तकनीकी उपकरणों की मदद से उत्तर वापस अभ्यर्थी तक पहुंचाए जाते थे। इस पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय तरीके से संचालित किया जा रहा था ताकि किसी को इसकी भनक न लग सके।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि गिरोह ने संचार के लिए ब्लूटूथ और वॉकी-टॉकी जैसे उपकरणों का उपयोग किया। इन उपकरणों की मदद से अभ्यर्थी और बाहरी सदस्यों के बीच संपर्क बनाए रखा गया। यही नहीं, गिरोह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का भी उपयोग किया था ताकि प्रश्न और उत्तर तेजी से साझा किए जा सकें।
पूछताछ के दौरान सामने आया कि इस नेटवर्क को संचालित करने के लिए एक विशेष व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया था। इसी ग्रुप के माध्यम से प्रश्नों और उत्तरों का आदान-प्रदान किया जाता था। पुलिस को संदेह है कि इस समूह में शामिल सभी सदस्य परीक्षा में नकल कराने की साजिश का हिस्सा थे। जांच एजेंसियां अब ग्रुप से जुड़े सभी लोगों की पहचान करने में जुटी हैं।
सूत्रों के अनुसार व्हाट्सएप ग्रुप में प्रश्न पहुंचने के बाद एक व्यक्ति उन्हें हल करता था और फिर तैयार उत्तर अन्य सदस्यों तक भेजे जाते थे। इसके बाद तकनीकी डिवाइसों के जरिए परीक्षा केंद्र में मौजूद अभ्यर्थी तक जानकारी पहुंचाई जाती थी। पुलिस का कहना है कि यह पूरा सिस्टम काफी व्यवस्थित तरीके से तैयार किया गया था और इसके पीछे लंबी योजना काम कर रही थी।
जांच में यह भी सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपी की मुलाकात एक परीक्षार्थी से उसके रिश्तेदार के माध्यम से हुई थी। इसके बाद दोनों के बीच संपर्क बढ़ा और धीरे-धीरे नकल कराने की पूरी रणनीति तैयार की गई। पुलिस का मानना है कि यह केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे बड़ा नेटवर्क सक्रिय हो सकता है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अब तकनीकी जांच पर विशेष ध्यान दे रही है। कई मोबाइल नंबरों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) खंगाली जा रही है। इसके साथ ही मोबाइल फोन, चैट रिकॉर्ड, इंटरनेट गतिविधियों और अन्य डिजिटल साक्ष्यों की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों को उम्मीद है कि इन जानकारियों से पूरे रैकेट के संचालन की तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
पुलिस ने इस मामले में कई अन्य संदिग्धों की पहचान भी कर ली है। इनमें परीक्षा देने वाला अभ्यर्थी, कथित सॉल्वर और कुछ अन्य सहयोगी शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि अभी तक सभी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है। पुलिस लगातार संभावित ठिकानों पर छापेमारी कर रही है और जल्द ही अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार करने का दावा कर रही है।
इस घटना ने एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं में तकनीक के दुरुपयोग की चुनौती को सामने ला दिया है। पहले जहां नकल के पारंपरिक तरीके इस्तेमाल होते थे, वहीं अब आधुनिक उपकरणों और डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से संगठित नेटवर्क तैयार किए जा रहे हैं। ऐसे मामलों से परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित होती है और मेहनत करने वाले अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होने की आशंका बढ़ जाती है।
शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच, डिजिटल निगरानी और तकनीकी विशेषज्ञों की सहायता से ऐसे नेटवर्क पर अंकुश लगाया जा सकता है। साथ ही अभ्यर्थियों को भी यह समझना होगा कि अवैध तरीकों से सफलता प्राप्त करने का प्रयास भविष्य में गंभीर कानूनी परिणामों का कारण बन सकता है।
पुलिस अधिकारियों के अनुसार मामले में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर आगे की कार्रवाई जारी है। जांच की जिम्मेदारी एक विशेष अधिकारी को सौंपी गई है, जो तकनीकी और कानूनी दोनों पहलुओं की गहराई से पड़ताल कर रहे हैं। अधिकारियों का दावा है कि उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों और कॉल रिकॉर्ड के विश्लेषण के बाद पूरे नेटवर्क का खुलासा हो जाएगा।
फिलहाल इस मामले में एक आरोपी गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि कई अन्य संदिग्ध पुलिस के रडार पर हैं। जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि जल्द ही पूरे नकल सिंडिकेट का पर्दाफाश कर सभी आरोपियों को कानून के दायरे में लाया जाएगा। बिहार की प्रतियोगी परीक्षाओं में सामने आया यह हाईटेक नकल कांड आने वाले समय में परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई नीतियों और सख्त निगरानी की मांग को और मजबूत कर सकता है।


