मिट्टी, पानी और इंसान को ‘जहर’ से बचाएं किसान: बामेती में बोले कृषि मंत्री राम कृपाल यादव; प्राकृतिक खेती के लिए 400 क्लस्टर तैयार

पटना | 28 फरवरी, 2026: बिहार के खेतों को रसायनों के चंगुल से मुक्त कराने और ‘शुद्ध’ खेती को जन-आंदोलन बनाने के लिए राजधानी पटना के बामेती (BAMETI) सभागार में शुक्रवार को एक राज्यस्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कृषि मंत्री राम कृपाल यादव ने किसानों को संबोधित करते हुए आह्वान किया कि वे अपने पूर्वजों वाली ‘प्राकृतिक खेती’ की ओर लौटें, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कैंसर जैसी बीमारियों से बचाया जा सके।

रसायनों के खिलाफ ‘प्राकृतिक’ शंखनाद

​कृषि मंत्री ने रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में हमने मिट्टी और पानी दोनों को दूषित कर दिया है।

कार्यशाला की 3 बड़ी बातें:

  1. स्वास्थ्य पर चोट: कीटनाशकों के कारण कैंसर और अन्य घातक बीमारियां पैर पसार रही हैं।
  2. लागत में कमी: गोबर, कम्पोस्ट और नीम आधारित खाद के इस्तेमाल से किसानों की जेब पर पड़ने वाला बोझ कम होगा।
  3. सरकारी ढाल: सरकार न केवल प्रोत्साहन राशि दे रही है, बल्कि उत्पादों के लिए बाजार और उचित मूल्य की व्यवस्था भी कर रही है।

मिशन मोड में ‘कृषि सखियां’ और क्लस्टर मॉडल

​राज्य सरकार ने प्राकृतिक खेती को जमीनी स्तर पर उतारने के लिए एक ठोस प्रशासनिक ढांचा तैयार किया है।

विशेष बिंदु

विवरण

कुल क्लस्टर

बिहार के सभी 38 जिलों में 400 क्लस्टर बनाए गए हैं।

कृषि सखियां

जागरूकता फैलाने के लिए 800 कृषि सखियों का चयन किया गया है।

प्रोत्साहन

बेहतर काम करने वाले किसानों को DBT के जरिए सीधे खाते में राशि भेजी गई।

“घरों के गमलों तक पहुँचा खतरा” – प्रधान सचिव

​कृषि विभाग के प्रधान सचिव नर्मदेश्वर लाल ने एक चौंकाने वाला तथ्य साझा किया कि लोग अब कीटनाशकों के डर से अपने घरों के गमलों में सब्जियां उगाने को मजबूर हैं। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे खेती को फिर से ‘टिकाऊ’ बनाएं। वहीं, कृषि निदेशक सौरभ सुमन यादव ने बताया कि 400 क्लस्टर्स के माध्यम से पूरे बिहार में एक साथ प्राकृतिक खेती को गति दी जा रही है।

VOB का नजरिया: क्या ‘ब्रांड बिहार’ बनेगा जैविक?

कृषि मंत्री का यह प्रयास सराहनीय है, लेकिन चुनौती केवल उत्पादन की नहीं, बल्कि ‘सर्टिफिकेशन’ और ‘मार्केटिंग’ की भी है। जब तक किसानों के प्राकृतिक उत्पादों को एक अलग ब्रांड के रूप में पहचान नहीं मिलेगी, तब तक वे पूरी तरह रसायनों को नहीं छोड़ पाएंगे। 800 कृषि सखियों की भूमिका यहाँ गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

ब्यूरो रिपोर्ट, द वॉयस ऑफ बिहार (VOB)।

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