देश के सबसे बड़े निजी बैंकों में शुमार में अचानक बड़ा प्रशासनिक झटका लगा है। बैंक के पार्ट-टाइम चेयरमैन और इंडिपेंडेंट डायरेक्टर ने ‘नैतिकता’ का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।
यह इस्तीफा केवल एक पदत्याग नहीं, बल्कि बैंक की आंतरिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिसने कॉर्पोरेट और वित्तीय जगत में हलचल पैदा कर दी है।
‘मेरे मूल्यों से मेल नहीं खाते हालात’ — चक्रवर्ती का बड़ा बयान
अपने इस्तीफे में अतानु चक्रवर्ती ने साफ कहा कि पिछले दो वर्षों में बैंक के भीतर कुछ ऐसे घटनाक्रम और कार्यशैली सामने आई, जो उनके व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिक मानकों के अनुरूप नहीं थे।
उन्होंने सीधे तौर पर किसी विशेष घटना का उल्लेख नहीं किया, लेकिन उनके शब्दों ने यह संकेत जरूर दिया कि बैंक के अंदरूनी संचालन को लेकर गंभीर मतभेद थे।
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चेयरमैन के अचानक पद छोड़ने के बाद ने स्थिति संभालने के लिए तेजी से कदम उठाया।
आरबीआई ने वरिष्ठ वित्त विशेषज्ञ को 19 मार्च से अगले तीन महीनों के लिए अंतरिम पार्ट-टाइम चेयरमैन नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
मिस्त्री का लंबा बैंकिंग अनुभव इस संक्रमण काल में स्थिरता बनाए रखने में अहम माना जा रहा है।
शेयर बाजार में गिरावट, निवेशकों में चिंता
इस्तीफे की खबर का असर सीधे बाजार पर दिखा।
एचडीएफसी बैंक के शेयरों में कारोबार के दौरान करीब 8% तक की गिरावट दर्ज की गई।
पिछले कारोबारी दिन शेयर 842.95 रुपये पर बंद हुआ था, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ा और मार्केट वैल्यू में तेज गिरावट आई।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह गिरावट केवल खबर की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बैंक की गवर्नेंस को लेकर उठे सवालों का संकेत भी है।
HDFC-HDFC Ltd विलय पर भी उठाए सवाल
अतानु चक्रवर्ती मई 2021 में बोर्ड से जुड़े थे और उन्होंने और HDFC बैंक के ऐतिहासिक विलय की निगरानी की थी।
हालांकि, अपने इस्तीफे में उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस बड़े विलय से अपेक्षित लाभ अभी तक पूरी तरह सामने नहीं आए हैं।
उनका यह बयान बैंक की दीर्घकालिक रणनीति पर भी सवाल खड़ा करता है।
कौन हैं अतानु चक्रवर्ती?
अतानु चक्रवर्ती गुजरात कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं और उन्हें पब्लिक पॉलिसी व वित्तीय प्रशासन का 30 साल से अधिक अनुभव है।
वे केंद्र सरकार में आर्थिक मामलों के विभाग (DEA) के सचिव रह चुके हैं और विनिवेश प्रक्रियाओं में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
सिविल सेवा से रिटायरमेंट के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट सेक्टर में कदम रखा और HDFC बैंक से जुड़े।
क्या आगे बढ़ सकती है जांच?
एक अनुभवी नौकरशाह का इस तरह नैतिकता का हवाला देकर इस्तीफा देना सामान्य घटना नहीं मानी जा रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला अब नियामकों की नजर में आ सकता है और बैंक की आंतरिक कार्यप्रणाली की समीक्षा या जांच की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
HDFC बैंक में यह घटनाक्रम केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस, पारदर्शिता और नैतिकता पर एक बड़ा सवाल है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि बैंक निवेशकों का भरोसा कैसे वापस जीतता है और नियामक संस्थाएं इस पूरे मामले पर क्या रुख अपनाती हैं।


