आपातकाल : संविधान पर सबसे बड़ा प्रहार

“25 जून 1975—भारतीय लोकतंत्र का काला दिन।”

पचास वर्ष पूर्व, इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने सत्ता में बने रहने के लिए संविधान की आत्मा को कुचलते हुए भारत पर आपातकाल थोप दिया। यह निर्णय न केवल असंवैधानिक था, बल्कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभों—कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका—की स्वतंत्रता पर भी क्रूर हमला था।

न्याय का गला घोंटने वाला निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा चुनाव गड़बड़ी पर दोषी ठहराए जाने के बाद इंदिरा गांधी ने सत्ता छोड़ने के बजाय, आंतरिक अशांति का बहाना बनाकर अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लागू करवा दिया। न तो कैबिनेट की सहमति थी, न ही संवैधानिक प्रक्रिया—एक सादे कागज पर राष्ट्रपति से हस्ताक्षर लेकर लोकतंत्र की नींव हिला दी गई।

मौलिक अधिकारों का हनन

आवाज उठाने वाले हजारों लोग मीसा और डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के तहत जेल में ठूंस दिए गए। नागरिकों के मौलिक अधिकार—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का अधिकार—एक झटके में छीन लिए गए।

मेरी व्यक्तिगत स्मृति: नसबंदी के भयावह दिन

मेरे 90 वर्षीय दादा जी उस दौर में बीकानेर के पीबीएम अस्पताल में इलाज के लिए गए थे, जहां डॉक्टरों ने उन्हें जबरन नसबंदी के लिए बाध्य करने की कोशिश की। यह अनुभव केवल उनके लिए नहीं, पूरे समाज के लिए भय और असुरक्षा की गहरी छाया लेकर आया। इस तरह की घटनाएं आज भी जनमानस में पीड़ा और घृणा के प्रतीक हैं।

संजय गांधी और सत्ता का दुरुपयोग

संजय गांधी के बीकानेर दौरे में सरकारी संसाधनों की बेतहाशा बर्बादी हुई। उनके स्वागत में मंच के नीचे टेलीफोन कनेक्शन बिछाया गया—यह सुविधा आमतौर पर प्रधानमंत्री को ही दी जाती है। ऐसा अनुशासनहीन और अपारदर्शी प्रशासन आजाद भारत के इतिहास में एक काला धब्बा है।

लोकतंत्र के स्तंभों पर हमला

  • न्यायपालिका को कमजोर करने हेतु 39वां संशोधन लाया गया, जिससे प्रधानमंत्री के चुनाव की न्यायिक समीक्षा रोक दी गई।
  • 42वें संशोधन द्वारा लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया गया, संसद को कठपुतली बना दिया गया।
  • नवजीवन जैसे स्वतंत्र प्रेस को जब्त कर और समाचार एजेंसियों का एकीकरण कर प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त की गई।

लोकतंत्र के रक्षक

सिर्फ विपक्ष ही नहीं, कई समाजसेवियों और युवाओं ने इस तानाशाही शासन का विरोध किया। तब मात्र 25 वर्षीय नरेंद्र मोदी जी ने भूमिगत रहते हुए लोकतंत्र की रक्षा के लिए जन-जागरण और साहित्य वितरण का कार्य किया। यह साहस, प्रतिबद्धता और लोकतंत्र के प्रति समर्पण का एक आदर्श उदाहरण था।

‘संविधान हत्या दिवस’—एक प्रतीकात्मक चेतावनी

आज जब 50 वर्ष बाद मोदी सरकार ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया है, तो यह सिर्फ स्मृति नहीं, लोकतंत्र के प्रति सतत् जागरूकता का आह्वान है।


आपातकाल का कालखंड केवल अतीत की त्रासदी नहीं, बल्कि वर्तमान की चेतावनी है। यह स्मरण दिलाता है कि लोकतंत्र केवल एक व्यवस्था नहीं, एक संवेदनशील उत्तरदायित्व है जिसे हर नागरिक को निभाना है। आज जब भारत विकसित भारत @2047 के पथ पर अग्रसर है, तो यह आवश्यक है कि हम अपनी लोकतांत्रिक विरासत की रक्षा करें और संविधान के मूल मूल्यों को अक्षुण्ण रखें।

अर्जुन राम मेघवाल

केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), भारत सरकार

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