एकलव्य मॉडल स्कूलों में अब सीबीएसई पाठ्यक्रम से होगी पढ़ाई, आदिवासी छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा देने की तैयारी

बिहार में आदिवासी समुदाय के बच्चों को बेहतर और प्रतिस्पर्धात्मक शिक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। राज्य सरकार ने अनुसूचित जनजाति बहुल क्षेत्रों में संचालित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक और राष्ट्रीय स्तर के अनुरूप बनाने का निर्णय लिया है। इसी क्रम में अब इन विद्यालयों में कक्षा 6 से लेकर कक्षा 12 तक की पढ़ाई केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के पाठ्यक्रम के अनुसार कराई जाएगी।

सरकार का मानना है कि सीबीएसई आधारित शिक्षा व्यवस्था लागू होने से आदिवासी क्षेत्रों के छात्र-छात्राओं को देश के अन्य हिस्सों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के समान अवसर प्राप्त होंगे। इससे वे मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे।

राज्य के अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग द्वारा संचालित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों को आदिवासी बच्चों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इन विद्यालयों की स्थापना का उद्देश्य दूरदराज और सामाजिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के बच्चों को आवासीय सुविधा के साथ आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना है।

वर्तमान में बिहार में तीन एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय संचालित हैं। ये विद्यालय पश्चिम चंपारण जिले के बेलासड़ी, जमुई जिले के आस्था तथा कैमूर जिले के अधौरा क्षेत्र में स्थित हैं। इन तीनों संस्थानों में लगभग 1800 छात्र-छात्राएं शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। प्रत्येक विद्यालय में करीब 600 विद्यार्थियों की पढ़ाई और आवास की व्यवस्था है।

इन क्षेत्रों का चयन इसलिए किया गया क्योंकि यहां आदिवासी आबादी अपेक्षाकृत अधिक है। राज्य सरकार का मानना है कि शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके जरिए आदिवासी समुदाय के बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है और उनके सामाजिक तथा आर्थिक विकास को गति दी जा सकती है।

अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति कल्याण विभाग के मंत्री लखेंद्र पासवान ने कहा कि केंद्र सरकार से सीबीएसई पाठ्यक्रम लागू करने की अनुमति प्राप्त हो चुकी है। इसके बाद अब विद्यालयों में शैक्षणिक ढांचे को उसी अनुरूप विकसित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में इन विद्यालयों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया जाएगा ताकि छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा मिल सके।

मंत्री ने बताया कि विद्यालयों में डिजिटल लैब की स्थापना की जाएगी। इसके माध्यम से छात्रों को आधुनिक तकनीक और डिजिटल शिक्षा से जोड़ा जाएगा। वर्तमान समय में शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक की भूमिका लगातार बढ़ रही है और ऐसे में आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को भी डिजिटल संसाधनों तक पहुंच प्रदान करना आवश्यक है।

इसके अलावा विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम के शिक्षकों की नियुक्ति की भी योजना बनाई गई है। सरकार का मानना है कि अंग्रेजी भाषा का ज्ञान छात्रों के शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए उन्हें प्रारंभिक स्तर से ही बेहतर भाषा कौशल विकसित करने का अवसर दिया जाएगा।

कंप्यूटर शिक्षा को भी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जाएगा। छात्रों को आधुनिक कंप्यूटर तकनीक, डिजिटल उपकरणों और सूचना प्रौद्योगिकी की जानकारी दी जाएगी ताकि वे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकें। इससे ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी शहरी क्षेत्रों के छात्रों के समान अवसर प्राप्त होंगे।

2011 की जनगणना के अनुसार बिहार के 24 जिलों में आदिवासी समुदाय की आबादी निवास करती है। राज्य में कुल आदिवासी जनसंख्या लगभग 13.36 लाख है। इनमें जमुई, कैमूर और पश्चिम चंपारण जैसे जिलों में आदिवासी समुदाय की संख्या अधिक है। सरकार का मानना है कि इन क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर बेहतर होने से सामाजिक विकास को नई दिशा मिलेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि सीबीएसई पाठ्यक्रम लागू होने से छात्रों को राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं की बेहतर तैयारी करने में मदद मिलेगी। वर्तमान समय में मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट, इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा जेईई और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश के लिए सीबीएसई आधारित पाठ्यक्रम काफी उपयोगी माना जाता है।

अब तक ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के कई छात्र संसाधनों की कमी के कारण इन परीक्षाओं में प्रतिस्पर्धा करने में कठिनाई महसूस करते थे। लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद उन्हें भी देशभर के छात्रों के समान शैक्षणिक वातावरण मिलेगा। इससे उच्च शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में उनके अवसर बढ़ने की उम्मीद है।

सरकार केवल शैक्षणिक सुधार तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि विद्यालयों की सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत बनाने पर जोर दे रही है। पिछले वर्षों में कुछ घटनाओं के बाद यह महसूस किया गया कि आवासीय विद्यालयों में छात्रों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसी कारण अब सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

विद्यालय परिसरों में निगरानी व्यवस्था, छात्र-छात्राओं की सुरक्षा, आवासीय सुविधाओं की गुणवत्ता और प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत करने के लिए विशेष योजनाएं तैयार की जा रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि छात्रों को सुरक्षित और सकारात्मक शैक्षणिक वातावरण उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों का विस्तार और आधुनिकीकरण आदिवासी समुदाय के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि इन विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक संसाधन और कुशल शिक्षक उपलब्ध कराए जाते हैं तो आने वाले वर्षों में यहां से बड़ी संख्या में छात्र राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल कर सकते हैं।

सरकार की इस पहल को सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय तक शिक्षा से वंचित रहे समुदायों को अब आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार आ सके।

कुल मिलाकर एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों में सीबीएसई पाठ्यक्रम लागू करने का निर्णय बिहार के आदिवासी छात्रों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलने वाला कदम माना जा रहा है। डिजिटल लैब, कंप्यूटर शिक्षा, अंग्रेजी माध्यम के शिक्षक और आधुनिक शैक्षणिक संसाधनों के माध्यम से इन विद्यालयों को राष्ट्रीय स्तर की शिक्षा संस्थाओं के रूप में विकसित करने की तैयारी की जा रही है। आने वाले समय में यह पहल आदिवासी समुदाय के बच्चों को शिक्षा, रोजगार और प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में बेहतर अवसर प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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