
नई दिल्ली/गाजियाबाद। देश की राजधानी में बढ़ते साइबर अपराधों के ग्राफ के बीच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने एक ऐसी मछली को जाल में फँसाया है, जिसने बैंकिंग प्रणाली की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रक्षक ही जब भक्षक बन जाए, तो आम आदमी की गाढ़ी कमाई की सुरक्षा राम भरोसे रह जाती है। इसी कड़ी में क्राइम ब्रांच ने एक संगठित साइबर ठगी गिरोह के सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी ‘इनसाइडर’ (भीतरी मददगार) को बेनकाब किया है। गिरफ्तार आरोपी की पहचान गाजियाबाद निवासी इरशाद के रूप में हुई है, जो आरबीएल बैंक (RBL Bank) में रिलेशनशिप मैनेजर के प्रतिष्ठित पद पर तैनात था। आरोप है कि इरशाद अपनी बैंकिंग शक्तियों और पद का दुरुपयोग कर साइबर अपराधियों के लिए फर्जी बैंक खाते खुलवाने का मुख्य जरिया बना हुआ था। यह गिरफ्तारी बैंकिंग जगत में छिपे उन काली भेड़ों की ओर इशारा करती है जो चंद रुपयों के लालच में अपराधियों को डिजिटल तिजोरी की चाबियाँ सौंप रहे हैं। सोमवार, 13 अप्रैल 2026 को पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, यह कार्रवाई दिल्ली के द्वारका साइबर थाने में दर्ज एक जटिल ठगी मामले की जांच के दौरान अमल में लाई गई है।
द्वारका साइबर थाने की शिकायत से खुला राज
इस पूरे मामले की पटकथा दिल्ली के द्वारका इलाके में रहने वाले एक पीड़ित की शिकायत के साथ शुरू हुई थी। पीड़ित ने पुलिस को बताया था कि उसके भारतीय स्टेट बैंक (SBI) खाते से रहस्यमयी तरीके से 88,000 रुपये की निकासी कर ली गई। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि पीड़ित के पास न तो कोई ओटीपी (OTP) आया और न ही उसने अपनी बैंकिंग जानकारी किसी के साथ साझा की थी। बिना ओटीपी के पैसे कटने की इस घटना ने साइबर पुलिस के कान खड़े कर दिए, क्योंकि यह किसी साधारण फिशिंग का मामला नहीं बल्कि तकनीकी रूप से अधिक उन्नत सेंधमारी थी।
जांच के दौरान जब क्राइम ब्रांच की टेक्निकल टीम ने पैसों के डिजिटल पदचिह्नों (Digital Footprints) का पीछा किया, तो पता चला कि यह राशि एसबीआई से निकलने के बाद आरबीएल बैंक के एक संदिग्ध चालू खाते (Current Account) में स्थानांतरित की गई थी। इस खाते का नाम ‘लॉरी ट्रेड एक्जिम’ (Lorry Trade Exim) दर्ज था। जैसे ही पुलिस ने इस खाते की गहराई से पड़ताल शुरू की, बैंकिंग व्यवस्था के भीतर छिपे भ्रष्टाचार की परतें एक-एक कर खुलने लगीं। यह खाता न केवल फर्जी था, बल्कि इसे खोलने के लिए इस्तेमाल किए गए दस्तावेज भी पूरी तरह जाली पाए गए।
रिलेशनशिप मैनेजर की भूमिका: रक्षक बना भक्षक
साइबर अपराधियों को सबसे ज्यादा जरूरत ऐसे बैंक खातों की होती है जहाँ ठगी की रकम को ‘पार्क’ किया जा सके और पुलिस की नजरों से बचाकर उसे कैश में बदला जा सके। इन्हें तकनीकी भाषा में ‘म्यूल अकाउंट्स’ कहा जाता है। गाजियाबाद का रहने वाला इरशाद इसी जरूरत को पूरा कर रहा था। आरबीएल बैंक में रिलेशनशिप मैनेजर होने के नाते उसके पास नए खाते खोलने और केवाईसी (KYC) दस्तावेजों के सत्यापन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी थी।
पुलिस की जांच में यह खुलासा हुआ कि इरशाद ने अपने पद का नाजायज फायदा उठाते हुए जाली आधार कार्ड, पैन कार्ड और फर्जी व्यावसायिक दस्तावेजों के आधार पर ‘लॉरी ट्रेड एक्जिम’ जैसे कई खाते खुलवाए। एक बैंक अधिकारी होने के कारण उस पर किसी को संदेह नहीं होता था और वह विभागीय जांच की प्रक्रियाओं को धता बताकर इन खातों को सक्रिय कर देता था। अपराधियों द्वारा दी गई मोटी कमीशन के लालच में उसने बैंक की सुरक्षा नीतियों के साथ समझौता किया और साइबर ठगों के लिए एक ‘सुरक्षित प्रवेश द्वार’ तैयार कर दिया।
कैसे काम करता था यह पूरा सिंडिकेट?
क्राइम ब्रांच की तफ्तीश में यह बात सामने आई है कि यह कोई छिटपुट वारदात नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित आपराधिक ढांचा था। यह सिंडिकेट तीन मुख्य स्तरों पर काम करता था:
- प्रथम स्तर (ठग): ये वे अपराधी होते हैं जो लोगों को लिंक भेजकर या तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर पैसे चुराते हैं। द्वारका वाले मामले में इन्होंने बिना ओटीपी के सेंधमारी की थी।
- द्वितीय स्तर (मैनेजर/इनसाइडर): यहाँ इरशाद जैसे सफेदपोशों की भूमिका शुरू होती थी। ये अपराधियों को ऐसे खाते मुहैया कराते थे जो किसी वास्तविक व्यक्ति से जुड़े न हों। इससे पुलिस जब खाते की जांच करती, तो वह केवल कागजी कंपनियों और फर्जी पतों तक ही सीमित रह जाती।
- तृतीय स्तर (मनी लॉन्ड्रिंग): एक बार पैसा ‘लॉरी ट्रेड एक्जिम’ जैसे खातों में आने के बाद, इसे तुरंत अलग-अलग छोटे खातों में बाँट दिया जाता था या एटीएम के जरिए निकाल लिया जाता था।
इरशाद न केवल खाते खोलता था, बल्कि वह इन खातों पर होने वाले संदिग्ध लेन-देन की रिपोर्टिंग को भी दबा देता था, ताकि बैंक के इंटरनल फ्रॉड विभाग की नजर इन पर न पड़े। उसके मोबाइल फोन की जांच में कई ऐसे अपराधियों के संपर्क मिले हैं, जो लंबे समय से दिल्ली-एनसीआर में साइबर ठगी की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।
जाली दस्तावेजों का मायाजाल और बैंक की सुरक्षा में चूक
गिरफ्तार आरोपी इरशाद ने पूछताछ में स्वीकार किया है कि वह जानता था कि जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल वह खाता खोलने के लिए कर रहा है, वे जाली हैं। उसने व्यावसायिक फर्मों के नाम पर करंट अकाउंट खोलने के लिए फर्जी रेंट एग्रीमेंट और जीएसटी (GST) प्रमाणपत्रों का सहारा लिया। बैंक की आंतरिक ऑडिटिंग प्रणाली को चकमा देने के लिए वह इन दस्तावेजों को खुद ही सत्यापित (Attest) कर देता था।
क्राइम ब्रांच के अधिकारियों का मानना है कि बैंक की ओर से भी इसमें बड़ी चूक हुई है। रिलेशनशिप मैनेजर को इतनी अधिक शक्तियाँ देना कि वह अकेले ही खाते को पूर्णतः सक्रिय कर दे, सुरक्षा व्यवस्था की एक बड़ी खामी है। पुलिस अब आरबीएल बैंक के अन्य अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या इरशाद को बैंक के भीतर किसी और का भी मौन समर्थन प्राप्त था। ‘लॉरी ट्रेड एक्जिम’ के नाम से संचालित खाते के जरिए अब तक लाखों रुपयों के लेन-देन के प्रमाण मिल चुके हैं, जो इस ठगी की विशालता को दर्शाते हैं।
साइबर ठगी के नए तरीके: बिना ओटीपी के खाली हो रहे खाते
द्वारका की इस घटना ने एक नई चिंता को जन्म दिया है—बिना ओटीपी के पैसे की निकासी। पुलिस विशेषज्ञों का कहना है कि अपराधी अब ‘सिम स्वैप’ (Sim Swap) या ‘सेशन हाइजैकिंग’ जैसे तरीकों का उपयोग कर रहे हैं। इसमें वे पीड़ित के मोबाइल का पूरा कंट्रोल अपने हाथ में ले लेते हैं और बैंक की वेबसाइट पर सीधे एक्सेस प्राप्त कर लेते हैं। चूंकि बैंक मैनेजर जैसे लोग उनके साथ मिले होते हैं, इसलिए वे इन खातों से पैसे निकालने की प्रक्रिया को और भी आसान बना देते हैं।
इरशाद की गिरफ्तारी से दिल्ली पुलिस को उम्मीद है कि वे उस मुख्य गिरोह तक पहुँच पाएंगे जिसने द्वारका के पीड़ित के खाते में सेंध लगाई थी। फिलहाल, आरोपी इरशाद को रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है। उसके बैंक खातों और अचल संपत्तियों की भी जांच शुरू कर दी गई है ताकि यह पता लगाया जा सके कि उसने इस काली कमाई से कितनी संपत्ति अर्जित की है।
आम नागरिकों के लिए पुलिस की कड़ी चेतावनी
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने इस मामले के बाद बैंक ग्राहकों के लिए विशेष परामर्श जारी किया है। अधिकारियों का कहना है कि केवल अनजान लिंक से बचना ही काफी नहीं है, बल्कि अपनी बैंकिंग गतिविधियों पर नियमित नजर रखना भी अनिवार्य है। यदि आपके खाते से कोई भी संदिग्ध लेन-देन होता है, तो बिना देरी किए 1930 पर कॉल करें या नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।
इरशाद जैसे बैंक मैनेजरों की संलिप्तता यह बताती है कि अपराधियों की पहुँच अब बैंक के भीतर के केबिनों तक हो चुकी है। इसलिए, किसी भी बैंक अधिकारी को अपनी निजी जानकारी या पिन साझा न करें, चाहे वह कितना भी भरोसेमंद क्यों न लगे। यह मामला बैंकिंग संस्थानों के लिए भी एक ‘वेक-अप कॉल’ है कि वे अपने कर्मचारियों की गतिविधियों और खाता खोलने की प्रक्रिया पर अधिक सख्त निगरानी तंत्र विकसित करें।
क्राइम ब्रांच अब उन सभी खातों को सीज करने की प्रक्रिया में है जो इरशाद द्वारा संदिग्ध तरीके से खोले गए थे। आने वाले दिनों में इस मामले में कई और बड़ी गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में सुरक्षा के साथ यह खिलवाड़ न केवल वित्तीय नुकसान है, बल्कि देश के बैंकिंग ढांचे पर आम जनता के भरोसे को तोड़ने वाला कृत्य भी है। पुलिस इस मामले में ‘लॉरी ट्रेड एक्जिम’ के असली मालिकों और उन ठगों के बीच के कड़ी को जोड़ने में जुटी है, जिन्होंने 88,000 रुपये की इस सेंधमारी की शुरुआत की थी।


