
- उप विकास आयुक्त प्रदीप सिंह ने सबौर प्रखण्ड का विस्तृत वार्षिक निरीक्षण कर प्रशासनिक व्यवस्था और विकास योजनाओं की धरातलीय प्रगति का जायजा लिया।
- कार्यालय संचालन और अभिलेखों के संधारण पर डीडीसी ने संतोष व्यक्त किया, निरीक्षण के दौरान सभी अधिकारी और कर्मचारी अपनी ड्यूटी पर उपस्थित पाए गए।
- वित्त आयोग की योजनाओं और मनरेगा के कार्यों में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए, तकनीकी संसाधनों के सुदृढ़ीकरण पर विशेष जोर दिया गया।
- कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में छात्राओं के साथ सीधा संवाद किया गया, सुरक्षा के लिए चाहरदीवारी और शारीरिक विकास के लिए खेल सामग्री की कमी को दूर करने का आश्वासन मिला।
- वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट्स (WPU) की क्रियाशीलता को लेकर कड़ा रुख अपनाया गया, प्रखण्ड के सभी केंद्रों की वर्तमान स्थिति पर तत्काल रिपोर्ट तलब की गई।
भागलपुर।
प्रशासनिक गलियारों में हलचल: वार्षिक निरीक्षण के बहाने सुशासन की परख
किसी भी प्रखण्ड की कार्यक्षमता उसकी फाइलों की गति और अधिकारियों की सक्रियता से आंकी जाती है। बुधवार को भागलपुर के उप विकास आयुक्त प्रदीप सिंह जब सबौर प्रखण्ड कार्यालय पहुँचे, तो उनका उद्देश्य केवल कागजों को उलटना नहीं था, बल्कि प्रखण्ड की प्रशासनिक मशीनरी को और अधिक चुस्त-दुरुस्त बनाना था। यह वार्षिक निरीक्षण एक तरह से सबौर प्रखण्ड का ‘रिपोर्ट कार्ड’ तैयार करने जैसा रहा। डीडीसी ने प्रखण्ड की समग्र प्रशासनिक व्यवस्था से लेकर विभिन्न जन-कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक का सूक्ष्म अवलोकन किया। प्रखण्ड कार्यालय में कदम रखते ही उन्होंने उपस्थिति पंजी (अटेंडेंस रजिस्टर) की जांच की। अक्सर यह देखा जाता है कि निरीक्षण के समय कर्मी गायब मिलते हैं, लेकिन सबौर में सुखद स्थिति रही कि सभी अधिकारी और कर्मचारी अपनी सीटों पर मुस्तैद मिले। यह अनुशासन प्रखण्ड विकास पदाधिकारी के नेतृत्व की एक सकारात्मक तस्वीर पेश करता है।
अभिलेखों की सुव्यवस्था और कार्यालयी शुचिता
निरीक्षण के दौरान फाइलों और रजिस्टरों के रख-रखाव पर डीडीसी का विशेष ध्यान रहा। उन्होंने प्रखण्ड कृषि पदाधिकारी, पशु चिकित्सा पदाधिकारी, सहकारिता पदाधिकारी और पंचायत राज पदाधिकारी के कार्यालयों का भ्रमण किया। विभिन्न अभिलेखों और पंजियों को अद्यतन (अपडेटेड) पाया गया, जिसे डीडीसी ने संतोषजनक करार दिया। उन्होंने कहा कि सुव्यवस्थित फाइलें न केवल पारदर्शिता को बढ़ाती हैं, बल्कि आम जनता के कार्यों के निष्पादन में लगने वाले समय को भी कम करती हैं। तकनीकी सहायकों और कनीय अभियंताओं को निर्देश दिया गया कि वे योजनाओं की मापी और कागजी कार्रवाई को समय पर पूरा करें ताकि भुगतान की प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब न हो। प्रखण्ड में कार्यरत्त सांख्यिकी पदाधिकारी और अन्य तकनीकी कर्मियों को डेटा एंट्री में तेजी लाने का निर्देश दिया गया।
विकास योजनाओं का ‘पोस्टमार्टम’: गुणवत्ता पर कोई समझौता नहीं
प्रशासनिक चर्चा के बाद डीडीसी ने वित्त आयोग से संचालित योजनाओं की गहराई से समीक्षा की। पंचायतों में चल रही गलियों, नालियों और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण कार्यों में प्रयुक्त सामग्री की गुणवत्ता पर उन्होंने कड़ा रुख अपनाया। व्यय की स्थिति का आकलन करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकारी राशि का एक-एक पैसा जनता की सुविधा के लिए सही ढंग से खर्च होना चाहिए। उन्होंने तकनीकी संसाधनों के सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि भविष्य में योजनाओं का क्रियान्वयन और भी प्रभावी और आधुनिक तरीके से किया जा सके। प्रखण्ड में चल रही मनरेगा योजनाओं और आरटीपीएस (RTPS) कार्यालय की कार्यप्रणाली को भी जांचा गया। आरटीपीएस काउंटर पर आने वाले आम नागरिकों को ससमय सेवाएं मिलें, इसे सुनिश्चित करने के लिए कर्मियों को सेवा भाव से कार्य करने की नसीहत दी गई।
वेस्ट प्रोसेसिंग यूनिट्स (WPU) पर विशेष निर्देश
स्वच्छ भारत मिशन के तहत कचरा प्रबंधन आज की बड़ी जरूरत है। डीडीसी ने सबौर प्रखण्ड में स्थापित सभी डब्ल्यूपीयू (WPU) की क्रियाशीलता की गहन जांच की। उन्होंने पाया कि कुछ केंद्रों पर सुधार की गुंजाइश है। इसके लिए उन्होंने संबंधित पदाधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सभी यूनिट्स की वर्तमान स्थिति, उनमें हो रहे कचरा प्रसंस्करण की मात्रा और वहां आने वाली समस्याओं पर एक विस्तृत प्रतिवेदन शीघ्र उपलब्ध कराएं। डीडीसी का विजन स्पष्ट है कि सरकारी संपत्तियों का निर्माण केवल आंकड़ों के लिए नहीं, बल्कि जनता को स्वच्छ वातावरण देने के लिए होना चाहिए। उन्होंने डब्ल्यूपीयू के सफल संचालन के लिए स्थानीय निकायों के साथ समन्वय बढ़ाने का भी सुझाव दिया।
कस्तूरबा विद्यालय की बेटियों से संवाद: सुरक्षा और स्वास्थ्य की चिंता
निरीक्षण का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय का दौरा रहा। यहाँ डीडीसी ने प्रशासनिक प्रोटोकॉल से हटकर छात्राओं के साथ एक बड़े भाई और अभिभावक की तरह संवाद किया। सभी नामांकित छात्राएं कक्षा में उपस्थित मिलीं, जो शैक्षणिक सत्र की सफलता को दर्शाता है। छात्राओं ने अपनी शैक्षणिक गतिविधियों और दैनिक दिनचर्या के बारे में बेबाकी से जानकारी दी। बातचीत के दौरान छात्राओं ने खेल सामग्री की आवश्यकता जताई, जिस पर डीडीसी ने तत्काल संज्ञान लिया। उन्हें लगा कि मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास के लिए खेलकूद अनिवार्य है।
सबसे गंभीर समस्या विद्यालय परिसर में चाहरदीवारी (Boundary Wall) का न होना पाई गई। बिना बाउंड्री के छात्राओं की सुरक्षा एक बड़ा प्रश्न है। डीडीसी ने इसे अत्यंत गंभीरता से लेते हुए जिला शिक्षा पदाधिकारी को निर्देशित किया कि वे इस संबंध में एक विधिवत और तकनीकी रूप से सुदृढ़ प्रस्ताव तैयार कर जल्द भेजें। उन्होंने स्पष्ट किया कि छात्राओं की सुरक्षा और सुविधा में कोई भी कोताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके साथ ही बाल विकास परियोजना कार्यालय (CDPO) और व्यापार मंडल का भी निरीक्षण किया गया, जहाँ साफ-सफाई और अभिलेख संधारण को लेकर आवश्यक सुधार के निर्देश दिए गए। व्यापार मंडल में अनाज के भंडारण की स्थिति और किसानों को मिलने वाली सुविधाओं पर भी चर्चा हुई।
प्रशासनिक समन्वय और भविष्य की राह
इस वार्षिक निरीक्षण में जिला परिषद के अधिकारी, जिला शिक्षा पदाधिकारी और जिला कार्यक्रम पदाधिकारी (ICDS) सहित कई वरीय पदाधिकारियों की मौजूदगी ने यह सुनिश्चित किया कि समस्याओं का समाधान ‘ऑन द स्पॉट’ हो सके। उप विकास आयुक्त प्रदीप सिंह ने कहा कि उनका प्रयास प्रखण्ड स्तर पर जवाबदेही को मजबूत करना है। सबौर प्रखण्ड में प्रशासनिक व्यवस्था संतोषजनक है, लेकिन योजनाओं की गुणवत्ता और कस्तूरबा विद्यालय जैसी बुनियादी सुविधाओं में अभी और सुधार की आवश्यकता है। उन्होंने प्रखण्ड विकास पदाधिकारी को निर्देश दिया कि वे नियमित रूप से ग्राम पंचायतों का दौरा करें और विकास कार्यों की स्वयं मॉनिटरिंग करें।
निष्कर्ष: जवाबदेही से ही बदलेगी व्यवस्था
प्रदीप सिंह के इस विस्तृत निरीक्षण ने सबौर प्रखण्ड के अधिकारियों और कर्मचारियों के भीतर एक नई ऊर्जा और जिम्मेदारी का अहसास कराया है। उपस्थिति पंजी से लेकर कस्तूरबा स्कूल की दीवार तक—डीडीसी की नजर हर उस बिंदु पर रही जो एक नागरिक के जीवन को प्रभावित करता है। वार्षिक निरीक्षण की यह प्रक्रिया केवल त्रुटियां निकालने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था को सुदृढ़ करने की एक रचनात्मक कोशिश है। यदि अधिकारी इसी तरह धरातल पर उतरकर योजनाओं की निगरानी करेंगे, तो निश्चित रूप से सरकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक सम्मानपूर्वक पहुँचेगा। सबौर प्रखण्ड का यह संतोषजनक रिपोर्ट कार्ड भागलपुर जिले के लिए एक सकारात्मक उदाहरण है, जिसे अन्य प्रखण्डों को भी अपनाना चाहिए।


