आरटीई के तहत निजी स्कूलों की मनमानी पर नकेल: शिक्षा विभाग का अल्टीमेटम, 13 अप्रैल तक पोर्टल पर डेटा नहीं डाला तो रद्द होगी मान्यता

पटना। बिहार के शिक्षा विभाग ने राज्य के उन निजी विद्यालयों को कड़े शब्दों में चेतावनी दी है जो शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत गरीब बच्चों के नामांकन में कोताही बरत रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा निदेशक विक्रम वीरकर ने शुक्रवार को हुई समीक्षा बैठक में स्पष्ट कर दिया कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए जो भी मान्यता प्राप्त निजी स्कूल 13 अप्रैल तक अपनी सीटों का विवरण पोर्टल पर अपलोड नहीं करेंगे, उनके विरुद्ध विभागीय नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। यह बैठक केवल एक औपचारिक चर्चा नहीं थी, बल्कि निजी स्कूलों के उन संचालकों के लिए ‘डेडलाइन’ तय करने का मंच बनी, जो अब तक पारदर्शिता और जवाबदेही से बचते आ रहे थे।

13 अप्रैल की समय सीमा: क्यों सख्त हुआ विभाग?

​शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई), 2009 की धारा 12(1)(c) के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें कमजोर वर्ग और अलाभकारी समूह के बच्चों के लिए आरक्षित करना अनिवार्य है। विभाग ने पाया है कि कई विद्यालय पोर्टल पर अपनी उपलब्ध सीटों की जानकारी साझा करने में जानबूझकर देरी कर रहे हैं।

​बैठक में विक्रम वीरकर ने निर्देश दिया कि इस प्रक्रिया में किसी भी तरह की सुस्ती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सीटों का डेटा पोर्टल पर आने के बाद ही नामांकन की पारदर्शी लॉटरी प्रक्रिया शुरू हो पाती है। यदि स्कूल डेटा ही नहीं देंगे, तो गरीबों के बच्चों का हक मारा जाएगा। इसीलिए विभाग ने अब ‘एक्शन मोड’ में आते हुए 13 अप्रैल की अंतिम तारीख मुकर्रर कर दी है। इसके बाद न तो कोई बहाना सुना जाएगा और न ही किसी तकनीकी समस्या का हवाला देने का मौका मिलेगा।

प्रस्वीकृति (Recognition) का पेंच: 417 स्कूलों पर लटकी तलवार

​बैठक के दौरान निजी स्कूलों की मान्यता और प्रस्वीकृति की प्रक्रिया पर भी विस्तार से चर्चा हुई। आंकड़ों के मुताबिक, 14 जनवरी से 8 अप्रैल के बीच ऑनलाइन आवेदन करने वाले 1949 विद्यालयों को प्रस्वीकृति प्रदान की जा चुकी है। लेकिन असली समस्या उन 417 स्कूलों की है जिनके आवेदन 90 दिनों से अधिक समय से लंबित पड़े हैं।

​निदेशक ने जिला और प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों को सख्त हिदायत दी कि 30 अप्रैल तक इन सभी पुराने आवेदनों का निष्पादन हर हाल में हो जाना चाहिए।

  • स्थलीय जांच अनिवार्य: शिक्षा अधिकारियों को आदेश दिया गया है कि वे केवल कागजों के आधार पर अनुशंसा न करें।
  • भौतिक सत्यापन: स्कूलों के अभिलेखों की स्थलीय जांच (Physical Verification) के बाद ही आवेदन आगे बढ़ाए जाएंगे।
  • मानकों से समझौता नहीं: यदि कोई स्कूल मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो उसकी प्रस्वीकृति रद्द की जाएगी, लेकिन बेवजह किसी आवेदन को लंबित रखना भी अधिकारियों की कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा करेगा।

नामांकन का आंकड़ा: आवंटित 64 हजार, स्कूल पहुँचे 56 हजार

​आरटीई के तहत बच्चों के भविष्य को लेकर विभाग ने जो आंकड़ा पेश किया है, वह काफी चिंताजनक है। रैंडमाइजेंशन (लॉटरी) के माध्यम से राज्यभर में 64,759 बच्चों को विद्यालय आवंटित किए गए थे। इनमें से अब तक 56,573 बच्चों का ही नामांकन हो सका है।

​बाकी बचे 8,186 बच्चे अब भी स्कूलों की दहलीज पर खड़े हैं। निदेशक ने इन 8 हजार से अधिक बच्चों का नामांकन न होने पर गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने स्कूलों को चेतावनी दी कि:

  1. दूरी का बहाना बंद करें: स्कूल यह कहकर नामांकन नहीं टाल सकते कि बच्चा घर से बहुत दूर रहता है।
  2. केवल दस्तावेजी कमी मान्य: नामांकन तभी अस्वीकार किया जा सकता है जब दस्तावेजों में कोई बड़ी विसंगति हो।
  3. अभिभावक की सहमति: यदि अभिभावक खुद लिखित में आवेदन दें कि वे नामांकन नहीं कराना चाहते, तभी सीट खाली मानी जाएगी।

​विक्रम वीरकर ने साफ कहा कि निजी स्कूल इन बच्चों को शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते। यदि स्कूल स्तर पर नामांकन लंबित रहा, तो इसकी जवाबदेही स्कूल प्रबंधन की होगी।

पैसों का हिसाब: 200 करोड़ का भुगतान और ‘शत-प्रतिशत’ वाले जिले

​अक्सर निजी स्कूलों की शिकायत रहती है कि सरकार उन्हें आरटीई के तहत नामांकित बच्चों की फीस प्रतिपूर्ति (Reimbursement) समय पर नहीं देती। बैठक में इस मिथक को भी आंकड़ों के साथ तोड़ा गया। विभाग ने बताया कि शैक्षणिक सत्र 2019-20 से 2023-24 तक के लिए अब तक 200.71 करोड़ रुपये की राशि सीधे डीबीटी (DBT) के माध्यम से स्कूलों के खातों में भेजी जा चुकी है।

जिलों की प्रगति रिपोर्ट:

  • अव्वल जिले: अरवल, पूर्वी चम्पारण, रोहतास, सहरसा और शेखपुरा ने अपने यहाँ के स्कूलों को शत-प्रतिशत राशि हस्तांतरित कर दी है।
  • पिछड़े जिले: पटना, नालंदा, सिवान, पश्चिम चम्पारण, बेगूसराय और गोपालगंज के कुछ स्कूलों की जांच रिपोर्ट अब भी लंबित है।
  • कड़ी कार्रवाई: इन जिलों के जिलाधिकारियों को पत्र भेजकर जल्द से जल्द जांच प्रतिवेदन भेजने का निर्देश दिया गया है ताकि शेष राशि का भुगतान किया जा सके।

तकनीकी बाधाओं का डिजिटल समाधान

​बैठक में निजी स्कूलों के प्रतिनिधियों ने एक व्यावहारिक समस्या उठाई। उन्होंने बताया कि कई स्कूलों ने बच्चों का भौतिक नामांकन तो ले लिया है, लेकिन तकनीकी जानकारी की कमी के कारण वे पोर्टल पर ‘लंबित’ दिखाई दे रहे हैं।

​इस समस्या को हल करने के लिए प्राथमिक शिक्षा निदेशक ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के सहयोग से एक मार्गदर्शक वीडियो (Guideline Video) तैयार करने का निर्देश दिया है। इस वीडियो के माध्यम से स्कूल संचालकों को यह सिखाया जाएगा कि पोर्टल पर सीटों की संख्या कैसे भरनी है और नामांकन की प्रक्रिया को डिजिटल रूप से कैसे पूरा करना है। यह वीडियो जल्द ही सभी स्कूलों को प्रसारित किया जाएगा ताकि ‘तकनीकी अज्ञानता’ का बहाना खत्म हो सके।

निष्कर्ष: शिक्षा के अधिकार को जमीन पर उतारने की चुनौती

​पटना की इस समीक्षा बैठक ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार का शिक्षा विभाग अब केवल दिशा-निर्देश जारी करने तक सीमित नहीं रहेगा। 200 करोड़ रुपये का भुगतान करना यह दर्शाता है कि सरकार अपना वादा निभा रही है, और अब बारी निजी स्कूलों की है कि वे अपनी सामाजिक और कानूनी जिम्मेदारी को समझें।

​आरटीई कानून केवल एक संवैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह बिहार के उस अंतिम पायदान पर खड़े बच्चे के लिए सपना देखने की खिड़की है, जिसके पास निजी स्कूलों की महंगी फीस भरने की सामर्थ्य नहीं है। विक्रम वीरकर की अध्यक्षता में हुई इस बैठक ने साफ संदेश दिया है कि जो स्कूल गरीबों के बच्चों के लिए अपने दरवाजे बंद रखेंगे, शिक्षा विभाग उनके स्कूल के दरवाजे पर ताला लगाने से भी पीछे नहीं हटेगा। 13 अप्रैल की तारीख नज़दीक है, और अब देखना यह होगा कि राज्य के कितने निजी स्कूल शिक्षा के इस महायज्ञ में ईमानदारी से अपनी आहुति देते हैं।

बैठक में मौजूद प्रमुख अधिकारी:

  • विक्रम वीरकर: निदेशक, प्राथमिक शिक्षा।
  • उर्मिला कुमारी: उप निदेशक, प्राथमिक शिक्षा।
  • दिनेश कुमार: उप निदेशक, जनसंपर्क।
  • प्रतिनिधि: समाज कल्याण विभाग और दिव्यांगजन सशक्तिकरण निदेशालय।
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