पटना, 24 अगस्त। बिहार के मढ़ौरा रेल इंजन कारखाने ने एक नया इतिहास रच दिया है। अफ्रीकी देश गिनी की पटरियों पर भारतीय ‘मेक इन इंडिया’ के शक्तिशाली रेल इंजन दौड़ने के लिए तैयार हैं। कारखाने से तैयार चार इंजनों की पहली खेप शनिवार को गिनी के लिए रवाना हुई। इन नीले रंग के इंजनों का नाम रखा गया है ‘कोमो’।
3 हजार करोड़ का निर्यात समझौता
इस साल मई-जून में गिनी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा के दौरान 140 लोकोमोटिव इंजनों के निर्यात का 3 हजार करोड़ रुपये का समझौता हुआ था। अब सिर्फ दो महीने बाद ही पहली खेप रवाना हो रही है।
4500 हॉर्स पावर की क्षमता
- फिलहाल निर्यात किए जा रहे इंजन की क्षमता 4500 हॉर्स पावर है।
- भविष्य में यहां 6000 हॉर्स पावर वाले इंजन भी बनाए जाएंगे।
- सभी इंजन पूरी तरह एयरकंडीशन कैब, अत्याधुनिक ब्रेक सिस्टम और इवेंट रिकॉर्डर जैसे खास उपकरणों से लैस हैं।
बिहार की धरती पर बना वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब
- मढ़ौरा रेल कारखाना 200 एकड़ में फैला है, जहां औसतन हर दो दिन में एक इंजन तैयार होता है।
- 2018 से अब तक यहां 700 इंजन बनाए जा चुके हैं और 250 से ज्यादा का मेंटेनेंस हुआ है।
- इस प्लांट में 1528 कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें 99% बिहार से हैं। खास बात यह है कि बड़ी संख्या में महिलाएं भी वेल्डिंग, असेंबली और टेस्टिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में लगी हैं।
- कर्मियों की औसत उम्र सिर्फ 24 वर्ष है।
बिहार को 900 करोड़ की जीएसटी
यह कारखाना बिहार में निजी निवेश का सबसे बड़ा उदाहरण है।
- रेल मंत्रालय की हिस्सेदारी: 24%
- अमेरिकी कंपनी वेबटेक की हिस्सेदारी: 76%
- अब तक निवेश: 800 करोड़ रुपये
- आगामी वर्षों में संभावित निवेश: 3000 करोड़ रुपये
- बिहार सरकार को हर साल 900 करोड़ रुपये का जीएसटी राजस्व।
आर्थिक गतिविधियों में तेजी
कारखाना शुरू होने के बाद इलाके में होटल, रेस्त्रां, बैंक, स्कूल और अन्य सुविधाएं तेजी से विकसित हुई हैं। आसपास की स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ मिल रहा है।
मील का पत्थर
वाराणसी रेल कारखाने से पिछले 50 सालों में जहां सिर्फ 15–20 इंजन निर्यात हुए हैं, वहीं मढ़ौरा कारखाने से अकेले गिनी के लिए 140 इंजन का निर्यात किया जा रहा है। यह बिहार को रेलवे निर्माण के वैश्विक नक्शे पर नई पहचान दिला रहा है।


