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दो सौ साल पुराने पटना कलक्ट्रेट भवन को गिराने का रास्ता साफ, सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी

ByShailesh Kumar

May 14, 2022

बिहार की राजधानी पटना में स्थित दो सौ साल पुराने कलेक्ट्रेट भवन को गिराने का रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम को शुक्रवार को भवन गिराने को मंजूरी यह कहते हुए दे दी कि हर औपनिवेशिक इमारत को संरक्षित करने की आवश्यकता नहीं है। इस भवन को कभी अंग्रेज अफीम और नमक के भंडारण के लिए गोदाम के रूप में इस्तेमाल करते थे।

बिहार सरकार पुराने कलक्ट्रेट भवन को गिराकर नया बनवाना चाहती है। इसे लेकर इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (INTACH) पटना चैप्टर ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी। इसमें दावा किया गया था कि इमारत शहर की संस्कृति और विरासत का एक अनिवार्य हिस्सा है। इसे ध्वस्त करने के बजाय संरक्षित किया जाना चाहिए। राज्य सरकार ने 31 जुलाई 2019 को जीर्ण-शीर्ण ढांचे को गिराने का आदेश दिया था। इसके बाद अदालत ने सितंबर 2020 में बिहार सरकार के आदेश को स्टे कर दिया था।

न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायाधीश सूर्य कांत की पीठ ने कहा कि इमारत को बनाए रखने के लिए याचिकाकर्ता के तर्क से प्रभावित नहीं हैं। हमारे पास औपनिवेशिक युग से बड़ी संख्या में इमारतें हैं। कुछ ब्रिटिश युग, डच युग और यहां तक ​​कि फ्रांसीसी युग के भी हैं। कुछ इमारतों का ऐतिहासिक महत्व हो सकता है, जिन्हें संरक्षित किया जा सकता है लेकिन सभी इमारतें को संरक्षित करना जरूरी नहीं है।

बिहार सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने कहा कि इमारत जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और लोगों के लिए गंभीर खतरा भी है। कहा कि बिहार शहरी कला और विरासत आयोग ने भी 4 जून 2020 को कलक्ट्रेट भवन को ध्वस्त करने की मंजूरी दी थी। 1972 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने बिहार में एक सर्वेक्षण करके 72 ऐसी इमारतों की पहचान की थी जिनका ऐतिहासिक महत्व है और उन्हें स्मारक का टैग दिया जा सकता है। उस सूची में कलक्ट्रेट भवन शामिल नहीं था।

पीठ ने कहा कि इस इमारत में क्या विरासत हो सकती है। हमें जो तस्वीरें दी गई हैं, उससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि इसकी छत कई जगह गिर चुकी है। यहां तक ​​कि एएसआई ने भी कहा है कि इसका कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं है। यह एक गोदाम था, जिसका इस्तेमाल अंग्रेजों ने नमक और अफीम रखने के लिए किया जाता था।

अदालत ने ऐसे उदाहरण दिए जिन्हें अंग्रेजों ने जेल बना दिया था और स्वतंत्रता सेनानियों को रखा गया था। ऐसी भवनों का ऐतिहासिक मूल्य है और इन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है। लेकिन कलक्ट्रेट भवन लोगों की सुरक्षा के लिए खतरा हैं।

INTACH के वकील रोशन संथालिया ने कोर्ट को बताया कि इमारत इतनी असुरक्षित नहीं है जितना कि राज्य ने अनुमान लगाया था। इमारत इतनी खराब स्थिति में नहीं है। भवन का तटस्थ मूल्यांकन किया जाना चाहिए। राज्य के हलफनामे पर जवाब देने के लिए समय भी मांगा। कोर्ट ने मामले को लंबित रखने से इनकार कर दिया और इसे खारिज करने का आदेश दिया।

इससे पहले पटना उच्च न्यायालय ने भी 1 सितंबर 2020 को INTACH की याचिका को खारिज कर दिया था। इसमें कहा गया था कि रिकॉर्ड में कुछ भी ऐसा नहीं है जिससे माना जाए कि इमारत ऐतिहासिक भवन है।  INTACH की याचिका में कहा गया है कि पटना कलक्ट्रेट कॉम्प्लेक्स बनाने वाली इमारतें डच और ब्रिटिश युग के एकमात्र अवशेष हैं और वे कला, वास्तुकला, संस्कृति और परंपरा में पटना के विकास की याद दिलाते हैं। दावा किया गया था कि कलक्ट्रेट का निर्माण 18 वीं शताब्दी की शुरुआत में डचों द्वारा किया गया था। स्वतंत्रता के बाद इमारत में सरकारी कार्यालय थे।  INTACH ने दावा किया कि वास्तविक और पेशेवर प्रयासों की सहायता से इन इमारतों को संरक्षित किया जा सकता है।