बिहार का ‘मैनचेस्टर’ आज सुनसान: मढ़ौरा की मिलों का पतन और पलायन की कहानी

सारण जिले का मढ़ौरा इलाका कभी बिहार के औद्योगिक मानचित्र पर चमकता सितारा था। ‘बिहार का मैनचेस्टर’ कहे जाने वाला यह कस्बा फैक्ट्रियों की चिमनियों और तीनों शिफ्ट में काम करने वाले हजारों मजदूरों की आवाजाही से गुलजार रहता था।

औद्योगिक गौरव का सुनहरा दौर

मढ़ौरा का औद्योगिक इतिहास ब्रिटिश काल से जुड़ा है।

  • 1904 में कानपुर शुगर वर्क्स लिमिटेड की स्थापना हुई, जो बिहार की पहली चीनी मिल थी।
  • 1929 में सी एंड ई मोर्टन लिमिटेड द्वारा मॉर्टन चॉकलेट फैक्ट्री लगाई गई, जिसकी मिठाइयाँ भारतीय सेना और एयर इंडिया तक सप्लाई होती थीं।
  • इसके अलावा, सारण डिस्टलरी और सारण इंजीनियरिंग वर्क्स जैसी इकाइयों ने इलाके को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

इन फैक्ट्रियों से हजारों प्रत्यक्ष और लाखों अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होते थे, जिससे मढ़ौरा बिहार का औद्योगिक हब बन गया।

उद्योगों का पतन

1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती सालों में श्रम विवाद, सरकारी नीतियों की कमी और प्रबंधन समस्याओं के कारण अधिकांश फैक्ट्रियां बंद हो गईं।

  • कानपुर शुगर मिल 1997 में बंद हुई।
  • मॉर्टन फैक्ट्री लगभग 25 साल पहले बंद हो गई और जमीन प्राइवेट हाथों में चली गई।
  • सारण डिस्टलरी और इंजीनियरिंग वर्क्स भी अब अस्तित्व खो चुके हैं।

आज इन स्थानों पर सिर्फ जर्जर इमारतें, टूटी चिमनियां और लोहे की चोरी के निशान बचे हैं।

राजनीतिक वादे और निराशा

बंद फैक्ट्रियों को पुनर्जीवित करने के लिए कई सालों से राजनीतिक वादे होते रहे।

  • पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लालू प्रसाद यादव और राजीव प्रताप रूडी सहित कई नेताओं ने फैक्ट्रियां शुरू करने का वादा किया।
  • हाल के वर्षों में अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी मढ़ौरा और अन्य मिलों को पुनर्जीवित करने का भरोसा दिया।
  • नवंबर 2025 में NDA सरकार ने 9 बंद मिलों को पुनर्जीवित करने की योजना मंजूर की, जिसमें मढ़ौरा शामिल है।

नई उम्मीद: डीजल लोकोमोटिव फैक्ट्री

पुरानी इकाइयों के पतन के बीच डीजल लोकोमोटिव फैक्ट्री ने मढ़ौरा में नई पहचान बनाई। यह परियोजना 2018 में जनरल इलेक्ट्रिक (अब वाबटेक) और भारतीय रेलवे के संयुक्त उपक्रम के तहत शुरू हुई।

हालांकि फैक्ट्री में स्थानीय लोगों को ज्यादा रोजगार नहीं मिला, लेकिन यह प्रोजेक्ट मढ़ौरा को औद्योगिक मानचित्र पर जीवित रख रहा है।

स्थानीय लोगों की पीड़ा

स्थानीय निवासी प्रभास कुमार कहते हैं—

“फैक्ट्रियां बंद होने से मजदूर और किसान दोनों की जिंदगी उजड़ गई। हजारों परिवार पलायन कर गए हैं। चीनी मिल के खंडहरों में लोहा चोरी जारी है। राजनीतिक वादे सिर्फ चुनावी भाषण तक सीमित रहते हैं।”

भविष्य की उम्मीद

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा—

“चीनी मिल के बारे में सरकार ने निर्णय लिया है। हम 25 नई चीनी मिल खोलेंगे। मढ़ौरा चीनी मिल को एक साल में पूरी प्रक्रिया करके वापस खोलेंगे।”

स्थानीय लोग अब ठोस कदम और स्थानीय रोजगार सुनिश्चित करने की उम्मीद में हैं। यदि योजना सफल होती है, तो मढ़ौरा फिर से बिहार के औद्योगिक हब के रूप में उभर सकता है।


 

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