खबर के मुख्य बिंदु (Highlights):
- बड़ा आंकड़ा: पिछले 4 वर्षों में बिहार की 18.15 लाख से अधिक महिलाओं को मिला सीधे बैंक खाते (DBT) में लाभ।
- आर्थिक सुरक्षा: पहली संतान पर ₹5,000 और दूसरी संतान कन्या होने पर ₹6,000 की सहायता राशि।
- पंजीकरण: अब तक 22.69 लाख महिलाओं ने कराया नामांकन, शेष को लाभ पहुँचाने की प्रक्रिया तेज।
- मकसद: गर्भावस्था के दौरान पोषण, प्रसव पूर्व जांच और शिशु टीकाकरण को बढ़ावा देना।
पटना: बिहार में गर्भवती और धात्री महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण के लिए केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री मातृ वन्दना योजना (PMMVY) एक लाइफलाइन साबित हो रही है। समाज कल्याण विभाग से प्राप्त ताज़ा आंकड़ों के अनुसार, पिछले चार वर्षों में बिहार की लाखों महिलाओं ने इस योजना के माध्यम से अपनी और अपने शिशुओं की सेहत को सुरक्षित किया है। यह योजना न केवल आर्थिक मदद दे रही है, बल्कि समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक नजरिया भी विकसित कर रही है।
4 साल का रिपोर्ट कार्ड: 18 लाख महिलाओं के खिले चेहरे
विभाग द्वारा जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि योजना का दायरा साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है।
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वित्तीय वर्ष |
लाभार्थियों की संख्या |
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2022-23 |
6,36,688 |
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2023-24 |
1,45,832 |
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2024-25 |
7,18,670 |
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2025-26 (जनवरी तक) |
3,14,510 |
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कुल (DBT के माध्यम से) |
18,15,680 |
किसे और कितनी मिलती है सहायता राशि?
योजना का लाभ दो अलग-अलग श्रेणियों में दिया जाता है, जिसका विवरण नीचे दिया गया है:
1. पहली संतान होने पर (कुल ₹5,000):
- पहली किस्त (₹3,000): गर्भावस्था के पंजीकरण और कम से कम एक प्रसव पूर्व जांच (ANC) के बाद।
- दूसरी किस्त (₹2,000): बच्चे के जन्म पंजीकरण और 14 सप्ताह तक का प्राथमिक टीकाकरण चक्र पूरा होने पर।
2. दूसरी संतान ‘कन्या’ होने पर:
- यदि दूसरा शिशु एक लड़की है, तो सरकार ₹6,000 की एकमुश्त राशि प्रदान करती है। इसका उद्देश्य कन्या जन्म को प्रोत्साहित करना है।
क्यों जरूरी है यह योजना?
गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अक्सर काम छोड़ना पड़ता है, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है। मिशन शक्ति के तहत लागू यह योजना:
- मजदूरी हानि की आंशिक भरपाई करती है।
- समय पर प्रसव पूर्व जांच सुनिश्चित करती है।
- संस्थागत प्रसव (अस्पताल में जन्म) को बढ़ावा देती है।
VOB का नजरिया: पोषण और सशक्तिकरण की ओर बढ़ता बिहार
18 लाख से अधिक महिलाओं तक डीबीटी के जरिए पैसा पहुँचना एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन नामांकन और वास्तविक लाभ के बीच करीब 4 लाख महिलाओं का अंतर अभी भी बना हुआ है। ‘द वॉयस ऑफ बिहार’ उम्मीद करता है कि विभाग इन लंबित आवेदनों को भी जल्द निपटाएगा ताकि कोई भी पात्र महिला इस ‘संजीवनी’ से वंचित न रहे।


