बिहार में हुए राज्यसभा चुनाव 2026 में सियासी तस्वीर पूरी तरह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के पक्ष में नजर आई। एनडीए ने सभी पांच सीटों पर जीत दर्ज कर क्लीन स्वीप किया। लेकिन इस जीत के पीछे महागठबंधन (महागठबंधन) के चार विधायकों की गैरहाजिरी भी एक बड़ा कारण बनी, जिसने चुनावी गणित को प्रभावित किया।
महागठबंधन के जिन चार विधायकों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, उनमें कांग्रेस के सुरेंद्र कुशवाहा, मनोहर प्रसाद सिंह, मनोज विश्वास और राजद के फैसल रहमान शामिल हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद इन विधायकों या उनके करीबी सूत्रों ने वोट नहीं देने की अलग-अलग वजहें सामने रखीं।
उम्मीदवार चयन से नाराजगी बनी बड़ी वजह
वाल्मीकिनगर से कांग्रेस विधायक सुरेंद्र कुशवाहा ने मतदान से दूरी बनाए रखने की वजह उम्मीदवार चयन को बताया। उनके करीबी सूत्रों के मुताबिक, वे महागठबंधन द्वारा घोषित उम्मीदवार से संतुष्ट नहीं थे। उनका मानना था कि क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए किसी अन्य चेहरे को मौका दिया जाना चाहिए था। इसी असंतोष के चलते उन्होंने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
सामाजिक समीकरणों की अनदेखी का आरोप
मनिहारी से कांग्रेस विधायक मनोहर प्रसाद सिंह ने खुलकर कहा कि महागठबंधन ने उम्मीदवार चयन में सामाजिक संतुलन का ध्यान नहीं रखा। उनके अनुसार, दलित, पिछड़ा या अल्पसंख्यक वर्ग से किसी को उम्मीदवार नहीं बनाया गया, जिससे वे नाराज थे। इसी कारण उन्होंने मतदान का बहिष्कार किया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे पार्टी नहीं छोड़ रहे हैं।
पार्टी में सम्मान की कमी का मुद्दा
फारबिसगंज के कांग्रेस विधायक मनोज विश्वास ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि जब पार्टी अपने ही विधायकों को पर्याप्त महत्व नहीं देती, तो ऐसे में मतदान का कोई औचित्य नहीं रह जाता। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर कई मुद्दे हैं, जिन्हें समय आने पर सामने रखा जाएगा।
पारिवारिक कारण से गैरहाजिर रहे राजद विधायक
वहीं, राजद विधायक फैसल रहमान मतदान में शामिल नहीं हो सके। पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, वे अपनी बीमार मां के इलाज के लिए दिल्ली में मौजूद थे। उनकी मां पिछले कुछ समय से अस्वस्थ हैं, जिसके चलते वे चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले पाए।
एनडीए को मिला सीधा फायदा
महागठबंधन के चार विधायकों की गैरमौजूदगी का सीधा लाभ एनडीए को मिला। वोटों का समीकरण कमजोर पड़ने से विपक्ष मजबूत चुनौती नहीं दे सका और एनडीए ने सभी सीटों पर आसानी से जीत दर्ज कर ली।
राजनीतिक संदेश क्या है?
इस पूरे घटनाक्रम ने महागठबंधन के भीतर असंतोष और समन्वय की कमी को उजागर कर दिया है। उम्मीदवार चयन से लेकर आंतरिक संवाद तक कई ऐसे सवाल खड़े हुए हैं, जो आने वाले चुनावों में गठबंधन के लिए चुनौती बन सकते हैं।
अब देखना होगा कि महागठबंधन इस असंतोष को कैसे संभालता है और भविष्य की रणनीति में क्या बदलाव करता है।


