बिहार की सत्ता का ‘महाक्लाइमेक्स’: विदाई की दहलीज पर क्यों उखड़े नीतीश कुमार? दिल्ली से पटना तक मचे सियासी घमासान के भीतर की पूरी कहानी

पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों वह सब कुछ घटित हो रहा है जो किसी थ्रिलर फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। एक तरफ राज्य में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली नई सरकार के गठन की तैयारियां अंतिम चरण में हैं, वहीं दूसरी तरफ वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नाराजगी ने पूरे घटनाक्रम में एक नया और अनपेक्षित मोड़ ला दिया है। सोमवार, 13 अप्रैल 2026 की रात पटना के सियासी तापमान ने तमाम रिकॉर्ड तोड़ दिए। दिल्ली से पटना वापस लौटे नीतीश कुमार के तेवर इस समय काफी तीखे नजर आ रहे हैं और इसकी वजह केवल पद छोड़ना नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर चल रही वह ‘अदृश्य बिसात’ है जिसने उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाई है। चर्चा है कि जिस सहजता के साथ ‘पावर ट्रांसफर’ की उम्मीद की जा रही थी, वहां अब कड़वाहट और शर्तों का दौर शुरू हो गया है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली में शपथ लेने के तुरंत बाद नीतीश कुमार को बिहार लौटना पड़ा और भाजपा को अपनी बैठकें रद्द करनी पड़ीं? इस पूरे विवाद के केंद्र में राज्यसभा का नामांकन, एक अंतरराष्ट्रीय शूटर का मुख्यमंत्री पद के लिए उछला नाम और एक ‘भरोसेमंद’ मंत्री की कथित गद्दारी शामिल है।

हरिवंश का नामांकन: जहाँ से शुरू हुई नाराजगी की पटकथा

​नीतीश कुमार की नाराजगी की पहली और सबसे प्रमुख जड़ दिल्ली में ही जम गई थी। जानकारी के अनुसार, जिस दिन नीतीश कुमार ने राज्यसभा सांसद के रूप में शपथ ली, उसी दिन भाजपा ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने नीतीश कुमार को हैरान कर दिया। भाजपा ने हरिवंश को न केवल राज्यसभा के लिए नामांकित किया, बल्कि उनका शपथ ग्रहण भी उसी दिन करवा दिया गया। नीतीश कुमार के लिए यह घटनाक्रम किसी झटके से कम नहीं था।

​नीतीश कुमार का मानना था कि हरिवंश के मामले में उन्हें विश्वास में लिया जाना चाहिए था या कम से कम इसकी टाइमिंग को लेकर गठबंधन के भीतर चर्चा होनी चाहिए थी। हरिवंश और नीतीश कुमार के रिश्तों में आई हालिया दूरियों के बीच भाजपा का यह ‘फास्ट मूव’ नीतीश कुमार को नागवार गुजरा। उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि भाजपा अब उन्हें दरकिनार कर सीधे अपने फैसले ले रही है। यही वह क्षण था जब नीतीश कुमार ने दिल्ली से तुरंत वापस पटना लौटने का फैसला किया और गठबंधन के भविष्य को लेकर अपनी शर्तों को कड़ा कर दिया।

श्रेयसी सिंह का नाम: मुख्यमंत्री की रेस में नया ‘धमाका’

​नीतीश कुमार की नाराजगी की आग में घी डालने का काम भाजपा के खेमे से उछले एक नए नाम ने किया। अचानक चर्चा शुरू हो गई कि अंतरराष्ट्रीय शूटर और जमुई से विधायक श्रेयसी सिंह को बिहार का अगला मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। श्रेयसी सिंह बिहार के कद्दावर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे दिवंगत दिग्विजय सिंह की बेटी हैं। वे कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं और वर्तमान में दो बार की विधायक हैं।

​श्रेयसी सिंह का नाम चर्चा में आना नीतीश कुमार के लिए असहज करने वाला था। इसकी बड़ी वजह यह थी कि श्रेयसी सिंह के पिता दिग्विजय सिंह और नीतीश कुमार के बीच के राजनीतिक मतभेद जगजाहिर रहे हैं। इसके बावजूद श्रेयसी सिंह का नाम भाजपा के गलियारों में तेजी से चलने लगा। नीतीश कुमार को संदेह हुआ कि यह केवल भाजपा की रणनीति नहीं है, बल्कि उनके अपने ही एक बेहद करीबी मंत्री ने परदे के पीछे रहकर भाजपा को यह सुझाव दिया है। सूत्रों का दावा है कि नीतीश कुमार उस मंत्री की पहचान कर चुके हैं और अब नई सरकार के गठन से पहले उस मंत्री की विदाई लगभग तय मानी जा रही है। एक ‘विजनरी’ नेता के रूप में नीतीश कुमार को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि उनकी नाक के नीचे उनके अपने लोग ही उनके प्रतिद्वंद्वियों के वारिसों को प्रमोट कर रहे हैं।

नीतीश की शर्त: ‘पहले नेता चुनो, फिर इस्तीफा दूंगा’

​नाराजगी का असर यह हुआ कि सोमवार को होने वाली भाजपा विधायक दल की महत्वपूर्ण बैठक को अचानक रद्द करना पड़ा। नीतीश कुमार ने स्पष्ट रूप से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को अपना संदेश भिजवा दिया है कि वे अपनी शर्तों पर ही इस्तीफा देंगे। नीतीश कुमार ने अब एक नई प्रक्रिया की मांग की है। उनकी शर्त है कि पहले भाजपा अपने विधायक दल का नेता आधिकारिक रूप से चुन ले और इसकी सूचना उन्हें दी जाए।

​इसके बाद, नीतीश कुमार अपनी अध्यक्षता में कैबिनेट की एक आखिरी बैठक करेंगे, जिसमें नए मुख्यमंत्री के नाम का औपचारिक एलान किया जाएगा। इसी बैठक के बाद नीतीश कुमार राजभवन जाएंगे और अपना त्यागपत्र सौंपेंगे। यानी नीतीश कुमार अब ‘ब्लाइंड’ इस्तीफा देने के मूड में नहीं हैं। वे चाहते हैं कि सत्ता का हस्तांतरण पूरी तरह से उनकी देखरेख में और तय नियमों के तहत हो। उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि जब तक भाजपा अपने मुख्यमंत्री के नाम पर अंतिम मुहर नहीं लगाती, वे मुख्यमंत्री आवास खाली नहीं करेंगे।

सम्राट चौधरी पर सहमति: नाराजगी के बीच निकला रास्ता

​तमाम नाराजगी और खींचतान के बावजूद, सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार ने आखिरकार एक नाम पर अपनी सहमति दे दी है। वह नाम है सम्राट चौधरी का। सम्राट चौधरी वर्तमान में बिहार भाजपा के सबसे मुखर चेहरे हैं और उपमुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार के साथ काम कर चुके हैं। नीतीश कुमार ने भाजपा से कह दिया है कि यदि सम्राट चौधरी को कमान सौंपी जाती है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी।

​सम्राट चौधरी के नाम पर नीतीश कुमार की ‘हां’ के पीछे कई राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं। पहला यह कि सम्राट चौधरी के पास प्रशासनिक अनुभव है और दूसरा यह कि वे ओबीसी (OBC) समुदाय से आते हैं, जिससे सामाजिक संतुलन बना रहेगा। नीतीश कुमार को लगता है कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में उनकी शुरू की गई विकास योजनाओं को निरंतरता मिल सकती है। भाजपा के भीतर भी सम्राट चौधरी के नाम पर व्यापक सहमति बनती दिख रही है, क्योंकि वे लालू यादव के वोट बैंक में सेंध लगाने की क्षमता रखते हैं।

एक युग का अंत और नए ‘पावर गेम’ की शुरुआत

​बिहार की राजनीति में यह समय केवल एक व्यक्ति के हटने और दूसरे के आने का नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक दर्शन के बदलने का समय है। नीतीश कुमार अपनी विदाई को यादगार और गरिमापूर्ण बनाना चाहते थे, लेकिन श्रेयसी सिंह और हरिवंश जैसे प्रकरणों ने उनके अंतिम दिनों के स्वाद को कसैला कर दिया है। पटना के 1 अणे मार्ग से लेकर भाजपा कार्यालय तक, हर चेहरे पर तनाव साफ देखा जा सकता है।

​अब सबकी नजरें मंगलवार की दोपहर पर टिकी हैं, जब पर्यवेक्षक के रूप में शिवराज सिंह चौहान पटना पहुँचेंगे। नीतीश कुमार की नाराजगी को शांत करना और सम्राट चौधरी के नाम पर सबकी मुहर लगवाना शिवराज सिंह चौहान के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। बिहार की जनता इस समय सांसें थामकर देख रही है कि जिस सुशासन की नींव नीतीश कुमार ने रखी थी, उसे नया नेतृत्व किस तरह आगे बढ़ाता है। नाराजगी और समझौतों के बीच 15 अप्रैल को होने वाला शपथ ग्रहण समारोह बिहार के लिए एक नई सुबह लेकर आएगा, लेकिन नीतीश कुमार के ये आखिरी कड़े फैसले यह साबित कर रहे हैं कि वे ‘इस्तीफा’ देने के बाद भी बिहार की राजनीति में अपनी धमक बनाए रखेंगे।

​भाजपा ने नीतीश कुमार की मांगों को स्वीकार करते हुए अपने कदम पीछे खींचे हैं ताकि गठबंधन में कोई बड़ी दरार न आए। अब यह तय है कि कैबिनेट की बैठक में सम्राट चौधरी के नाम का प्रस्ताव खुद नीतीश कुमार या उनकी कैबिनेट का कोई वरिष्ठ सदस्य रखेगा। इसके साथ ही बिहार में ‘नीतीश अध्याय’ का समापन एक नई और अनिश्चित राजनीतिक यात्रा की ओर मुड़ जाएगा। श्रेयसी सिंह का नाम भले ही इस बार रेस से बाहर हो जाए, लेकिन इस घटना ने यह दिखा दिया है कि भाजपा के भीतर अब नए और युवा चेहरों को लेकर मंथन शुरू हो चुका है, जो भविष्य में किसी भी बड़े उलटफेर का संकेत है।

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